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भारत का भूगोल

General Knowledge for Competitive Exams

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सिंधु नदी प्रणाली

सिंधु नदी प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी नदी घाटियों में से एक है जो 11, 65,000 वर्ग किलोमीटर (भारत में यह 321, 289 वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्रों की  यात्रा करती  है और इसकी  कुल लंबाई 2,880 किमी (भारत में 1,114 किमी) है । इंडस को सिंधु के रूप में भी  जाना जाता है। यह तिब्बत में कैलाश पर्वत  श्रंखला से बोखार-चू नामक ग्लेशियर (4164 मीटर) के पास तिब्बती क्षेत्र में से निकलती है ।

सिंधु नदी के साथ जुडी नदी घाटी परियोजनाएं

सिंधु नदी के साथ जुडी महत्वपूर्ण नदी घाटी परियोजनाए है - भाखड़ा नांगल, इंदिरा गांधी परियोजना, पोंग परियोजना, चमेरा परियोजना, थीन परियोजना, नाथपा झाकड़ी परियोजना, सलाल, बगलिहार परियोजना, दुलहस्ती परियोजना, तुलबुल परियोजना, और उड़ी परियोजना।

भारत में प्राकृतिक वनस्पति

प्राकृतिक वनस्पति का मतलब है वह वनस्पति जो मनुष्य द्वारा विकसित नहीं की गयी है । यह मनुष्यों से मदद की जरूरत नहीं है और जो कुछ भी पोषक तत्व इन्हें चाहिए, प्राकृतिक वातावरण से ले लेते है। जमीन की ऊंचाई और वनस्पति की विशेषता के बीच एक करीबी रिश्ता है। ऊंचाई में परिवर्तन के साथ जलवायु परिवर्तन होता है और जिसके कारण प्राकृतिक वनस्पति का स्वरुप बदलता है।

भारतीय में वन्यजीव अभयारण्य और राष्ट्रीय पार्क

भारतीय उप-महाद्वीप न केवल अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है बल्कि यहाँ पर वनस्पतियों और जीवों की विविध प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं| इसलिए भारत में वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों का निर्माण लुप्तप्राय पक्षियों और जानवरों के संरक्षण के लिए बड़ी संख्या में किया गया है, ताकि इन पक्षियों और जानवरों के विलोपन को रोका जा सके|

भारत में बायोस्फीयर रिज़र्व: मानदंड और अंतर्राष्‍ट्रीय स्थिति

बायोस्फीयर रिजर्व, प्राकृतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करता है जिनका विस्तार स्थलीय या तटीय / समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों या इनके मिश्रण वाले बड़े क्षेत्र में होता है| उदाहरण के रूप में: जैव-भौगोलिक क्षेत्र/प्रांत।

भारतीय वन्यजीवों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित मानव पर्यावरण सम्मेलन के समझौते के तहत विश्व वन्य कोष (WWF) की मदद से 1973 में बाघ परियोजना की शुरूआत भारत में की गयी। भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून और केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अनुसार 1973-74 के दौरान भारत में केवल 9 बाघ आरक्षित क्षेत्र थे, जबकि जनवरी 2013 तक बाघ आरक्षित क्षेत्रों की संख्या बढ़कर 41 हो गयी है।

रेड डाटा बुक की रिपोर्ट और भारत में लुप्तप्राय जानवर

आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में आनुवंशिक विविधता के पदाधिकारियों और पारिस्थितिकी प्रणालियों के निर्माण ब्लॉकों का, उनके संरक्षण की स्थिति पर और वितरण के लिए वैश्विक स्तर से स्थानीय तक जैव विविधता के संरक्षण के बारे में सूचित निर्णय करने के लिए जानकारी के लिए आधार प्रदान करता है ।

भूमि संसाधन

भूमि एक सीमित संसाधन है जिस पे शहरीकरण, बुनियादी सुविधाओं, भोजन में वृद्धि, दूध, फाइबर और ईंधन के उत्पादन और पारिस्थितिकी तंत्र के प्रवाधान से प्रतिस्पर्धा दबाव के अधीन है। लेकिन यह भी एक कम होता हुआ स्रोत है। यह एक वैश्विक समस्या है। रहने, भोजन और बायोमास बढ़ने के लिए दुनिया भर में क्षेत्रों की मांगे बढ़ रही है और जलवायु परिवर्तन के कारन भूमि की मांग, उपलब्धता और गिरावट पर असर होने की संभावना है।

भारत की मिट्टी की रूपरेखा

मिट्टी सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है। गेहूं, चावल और मोटे अनाज, दलहन, तिलहन, पेय पदार्थ, सब्जिया और फल आदि सब मिट्टी से प्राप्त होते हैं। इसके अलावा खाद्य लकड़ी, फाइबर, रबर, जड़ी बूटियों और औषधीय पौधे भी मिट्टी से प्राप्त किये जाते हैं।

भारत में वन अनुसंधान संस्थान

वन अनुसंधान संस्थान भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद का एक संस्थान है और भारत में वानिकी अनुसंधान के क्षेत्र में एक प्रमुख संस्थान है। यह उत्तराखंड में देहरादून में स्थित है और अपने समय का सबसे पुराने संस्थानों में से एक है । 1991 में यह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा एक डीम्ड विश्वविद्यालय घोषित किया गया था । यह 1906 में इंपीरियल वन अनुसंधान संस्थान के रूप में स्थापित हुआ था, वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) देहरादून भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) के तहत एक प्रमुख संस्थान है।

ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली

ब्रह्मपुत्र दुनिया में सबसे बड़ी नदी घाटियों में से एक है जो मानसरोवर झील के पास कैलाश पर्वत श्रेणी के चमयुंगडुंग  ग्लेशियर से  शुरू होती  है  यहाँ से यह दक्षिणी तिब्बत के सूखे  और सपाट क्षेत्र में लम्बाई में लगभग 1,200 किलोमीटर की दूरी के लिए पूर्व की ओर बहती है जहां इसे संग्पो जिसका अर्थ है 'शोधक' के रूप में जानी जाती  है ।  तिब्बत में नदी राँगो संग्पो इसकी   दाहिनी किनारे की  प्रमुख सहायक नदी है। यह नमचा बरवा (7755 मीटर) के पास मध्य हिमालय में एक गहरी खाई बनाने के बाद एक उपद्रवी  और गतिशील नदी के रूप में उभर कर आती  हैं।

प्रायद्वीपीय नदी जो पश्चिम की ओर बहती हैं

महत्वपूर्ण प्रायद्वीपीय नदियां जो पश्चिम की ओर बहती है उनके नाम इस प्रकार हैं - शत्रुनुजी, भद्रा, कालिंदी, बैदती, शरावती, भरथपुजः, पेरियार और पंबा । जो नदियां अरब सागर की ओर बहती है उनका जलमार्ग लघु होता है। यह नदियां गुजरात, कर्नाटक, महारास्त्र राज्यों से होकर निकलती हैं।

प्रायद्वीपीय भारत की नदी घाटी परियोजनाए

पृथ्वी पर जीवन के सभी रूपों के निर्वाह के लिए जल आवश्यक है। दुनिया भर में यह समान रूप से वितरित नहीं किया गया है और यहां तक कि एक ही स्थान पर इसकी उपलब्धता साल भर की तुलना में एक समान नहीं है । नदी घाटी परियोजनाओं का निर्माण एक साथ कई उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए और नदी घाटियों के साथ जुडी विभिन्न समस्याओं से निपटने के लिए एक समन्वित तरीके से किया गया है ।

भारत की प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली

प्रायद्वीपीय जल निकासी व्यवस्था हिमालय की जल निकासी व्यवस्था से पुरानी है । इस व्यापक, मोटे तौर पर वर्गीकृत उथली घाटियों और नदियों की परिपक्वता से स्पष्ट है।पश्चमी घाट जो की पश्चमी तट के पास है , प्रायद्वीपीय नदियों के पानी को बांटने का कार्य करती हैं जिससे यह पानी एक ओर तो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बंट जाता है| नर्मदा और तापी को छोडकर अधिकांश प्रमुख प्रायद्वीपीय नदिया पश्चिम से पूर्व की और प्रवाह करती है।

भारत में झीलें

एक बड़ी पानी का भाग  जो भूमि से घिरा हुआ है उसे  झील कहा जाता है। अधिकांश  झीलें  स्थायी होती  हैं जबकि कुछ झीलों में बरसात के मौसम के दौरान पानी होता  हैं। झीले  ग्लेशियर और बर्फ की चादरो, पवन, नदी की गतिविधि से और मानव गतिविधियों से बनती  हैं।  पृथ्वी पर 500,000 झीलों में  103,000 घन किलोमीटर के बराबर के पानी की मात्रा के  भंडार को जमा किया हुआ हैं । दुनिया की  अधिकांश  पानी की  झीले उत्तरी अमेरिका (25%) , अफ्रीका (30%) और एशिया ( 20%) में पाइ  जाती  हैं।

पूर्व की ओर (बंगाल की खाड़ी) की नदी परियोजनाए

भारत में बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं को कृषि के लिए सिंचाई, उद्योगों के लिए बिजली और बाढ़ नियंत्रण की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शुरू किया  गया । जवाहर लाल नेहरू ने बांधों को "आधुनिक भारत का मंदिर' कहा है, इस तथ्य से उस समय में बांधों के महत्व का अनुमान लगाया जा सकता है । भारत की आर्थिक योजनाओं में बांध निर्माण को एक उच्च प्राथमिकता दी गई है ।

जल प्रबंधन

परिभाषित पानी नीतियों और नियमों के तहत योजना बनाना, विकास, वितरण और जल संसाधनों का इष्टतम उपयोग करने को जल प्रबंधन कहते है। जल चक्र, वाष्पीकरण और वर्षा के माध्यम से हाइड्रोलॉजिकल प्रणालियों को बनाये रखते है जिससे नदियां और झीलें बनती है और सहारा देते हैं कई तरह के जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों को। झीलों स्थलीय और जलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों के बीच मध्यवर्ती रूपेँ हैं और उनमे शामिल है वह पौधे और जानवर की प्रजातियां हैं जो कि अत्यधिक नमी पर निर्भर हैं।

गंगा नदी की नदी घाटी परियोजनाए

भारत में बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं को कृषि के लिए सिंचाई, उद्योगों के लिए बिजली और बाढ़ नियंत्रण की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शुरू किया गया । जवाहर लाल  नेहरू ने  बांधों को " आधुनिक भारत का मंदिर' कहा है, इस तथ्य से उस समय में बांधों के महत्व का अनुमान लगाया जा सकता है ।

भारत में मानव विकास सूचकांक

मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) एक समग्र सांख्यिकी मानव विकास (जीवन प्रत्याशा, शिक्षा, और आय सूचकांकों) को बताता है| यह अर्थशास्त्री महबूब -उल -हक द्वारा बनाया गया था, 1990 में अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन द्वारा अनुगमन किया, और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा प्रकाशित किया गया।

पूर्व की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय नदी

प्रायद्वीपीय नदिया हिमालयी नदियों से काफी पुरानी है । उनकी सहायक नदियों के साथ-साथ पूर्व की ओर बहने वाली नदियों की एक बड़ी संख्या हैं। वहाँ छोटी नदियों भी है जो बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, हालांकि छोटी है पर ये अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। सुबर्णरेखा, बैतरणी, ब्राह्मणी, वमसधरा, पेन्नार, पलार और वैगई महत्वपूर्ण नदियां हैं।

मानव भूगोल के विरोधाभास

विकास सामाजिक विज्ञान की बहुत ही जटिल अवधारणाओं में से है, क्योंकि यह एक मूल अवधारणा है और एक बार इसे हासिल कर ली जाए तो यह समाज के सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण समस्याओं को संबोधित करेगा| हालांकि, यह एक से अधिक तरीकों से जीवन की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार में लाया लेकिन क्षेत्रीय असमानता, सामाजिक असमानता, भेदभाव, अभाव, लोगों के विस्थापन, मानव अधिकारों के दुरुपयोग और मानवीय मूल्यों और पर्यावरणीय दुर्दशा में भी वृद्धि हुई है|

मानव विकास

बड़ा या अधिक उन्नत बनने के लिए विकास एक गुणात्मक और मात्रात्मक प्रक्रिया का संयोजन है| 'प्रगति' और 'विकास' नए शब्द नहीं हैं, लेकिन समय की अवधि के साथ परिवर्तन के संदर्भ में देखें जाते हैं| विकास एक मात्रात्मक और मूल्य तटस्थ है जिसका मतलब है कि यह एक सकारात्मक या नकारात्मक परिवर्तन हो सकता है जबकि प्रगति का एक गुणात्मक परिवर्तन हमेशा सकारात्मक मूल्य है|

जल निकास के स्वरूप

एक जल निकासी स्वरूप को परिभाषित वाटरशेड की छाया में ही किया जा सकता है जैसे की एक धारा अपवाह, प्रवाह के माध्यम से, और भूमिगत जल प्रवाह जो विभाजित हो जाती हैं स्थलाकृतिक बाधाओं की वजह से । वाटरशेड जैसे सभी सहायक नदियां जो किसी स्थान पर धारा चैनल के साथ बहती है । एक क्षेत्र में नालियों की एक ज्यामितीय व्यवस्था को जल निकासी ढाँचा कहा जाता है। एक क्षेत्र में जल निकासी के पैटर्न को नियंत्रित करने में कारन शामिल हैं वह है स्थलाकृति, ढाल, संरचनात्मक नियंत्रण, और चट्टानों की प्रकृति, विवर्तनिक गतिविधियों, पानी की आपूर्ति, और सबसे ऊपर उस क्षेत्र का भूवैज्ञानिक इतिहास।

भारतीय की जल निकास प्रणाली

भारत की जल निकास प्रणाली में बड़ी संख्या मे कई छोटी और बड़ी नदियां हैं। यह तीन प्रमुख भौगोलिक और प्रकृति और वर्षा की विशेषताओं इकाइयों की विकासवादी प्रक्रिया का नतीजा है।

नदी के पानी की उपयोगिता

भारत की नदियों  में प्रति वर्ष भारी मात्रा में पानी आता है लेकिन यह असामान्य तौर पर दोनों, समय और विस्तार में वितरित किया जाता है । कुछ बारहमासी नदिय साल भर पानी ले जाती है जबकि कुछ गैर - बारहमासी नदियों में शुष्क मौसम के दौरान बहुत कम पानी होता है। बरसात के मौसम के दौरान पानी बाढ़ में बर्बाद हो जात है और समुद्र में नीचे बह जाता है। इसी तरह जब देश के एक हिस्से में एक बाढ़ आती है तो अन्य क्षेत्रो में  सूखा पड जाता है।

गंगा नदी प्रणाली

गंगा नदी भारतीय सांस्कृतिक महत्व की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण नदी है। यह गंगोत्री से गौमुख ग्लेशियर के पास ( 3,900 मीटर)  उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले  से निकलती  है। यहाँ पर  ये भागीरथी के नाम से  जानी  जाती  है। यह  छोटे  हिमालय के  मध्य और संकीर्ण घाटियों  के माध्यम से कट जाती है  । देवप्रयाग में भागीरथी, अलकनंदा से मिलती है और फिर उसके बाद यह गंगा के रूप में जानी  जाती  है। अलकनंदा का स्रोत  बद्रीनाथ के ऊपर सतोपंथ हिमनद में  है । अलकनंदा धौली गंगा और विष्णु गंगा, जो जोशीमठ या विष्णु प्रयाग में मिलते होते हैं। अलकनंदा की अन्य सहायक नदिया  जैसे पिंडर,  कर्णप्रयाग में जुड़ जाती है  जबकि  मंदाकिनी या काली गंगा,  रुद्र प्रयाग में जुड़ जाती है ।  गंगा हरिद्वार से मैदान में प्रवेश करती है ।

उत्तर- पूर्वी भारत में ब्रह्मपुत्र नदी घाटी की परियोजनाए

पूर्वोत्तर भारत  देश  की भूमि स्वर्ग भूमि है और वहां पर प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध है और यहाँ की गहरी नदी घाटीया  मेगा बांधों के निर्माण के लिए उपयुक्त है  इसलिए,  पूर्वोत्तर भारत  देश  के  क्षेत्र को  अक्सर ' भविष्य भारत का पावर हाउस ' के रूप में नामित किया गया है । भारत में बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के निर्माण के पीछे मूल मकसद कृषि के लिए सिंचाई , उद्योगों के लिए बिजली  और बाढ़ नियंत्रण  आदि  की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करना करना  है ।

भारतीय प्रायद्वीपीय पठार

गंगा व यमुना के दक्षिण उभरता हुआ विशाल भूखंड भारत का प्रायद्वीपीय पठार कहलाता है। जिसका आकर मोटे तौर पर त्रिभुजाकार है। इसका आधार गंगा की घाटी है तथा शीर्ष सुदूर दक्षिण कन्याकुमारी में स्थित है। दक्कन का पठार एक लावा पठार का उदाहरण है।जो ज्वालामुखी उद्गार की अंतिम चरण में निःसृत लावा के फैलने से बना है। यह प्राचीन गोंडवाना प्लेट का हिस्सा जो कालांतर में अलग होकर वर्तमान रूप को प्राप्त किया है।

एल निनो का सिद्धांत

पूर्वी प्रशांत महासागर में पेरू तट से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर सामान्य दिनों में पेरू की ठंडी जलधारा बहती है। कालांतर में इसमें बदलाव हो जाता है।ठंडी के बदले उष्ण जलधारा का आविर्भाव हो जाता है जिसके कारण जलवायु में प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है जिसको एलनिनो कहा जाता है। इसमें समुद्री सतह का तापमान बहुत बड़ी भूमिका निभाता है जिसका प्रभाव पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है।

भारतीय जनसंख्या की संरचना

एक समूह के भीतर लोगों की विस्तृत व्यक्तिगत विशेषताये जैसे की लिंग, आयु, वैवाहिक स्थिति, शिक्षा, व्यवसाय, और घर के मुखिया के साथ रिश्ते आदि के आधार पर किया गए   वितरण को   जनसंख्या संरचना कहा जाता है। जनसंख्या को दो भागों में बांटा गया हैं - ग्रामीण और शहरी, आकार और बस्तियों के कब्जे के आधार पर । ग्रामीण आबादी को छोटे आकार के ग्रामीण इलाकों में फैली हुइ बस्तियों के आधार पर ।

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