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अनुसंधान को बढ़ावा देने की आवश्यकता

लंबे समय से यूनिवर्सिटीज की रैंकिंग में आइआइटीज का दबदबा रहा है.

Nov 14, 2013 11:33 IST
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रैंकिंग ने बढाया कॉन्फिडेंस

लंबे समय से यूनिवर्सिटीज की रैंकिंग में आइआइटीज का दबदबा रहा है। इस बार पीयू ने उन्हें पीछे छोडकर सब को चौंका दिया है। इसका कारण यह कतई नहीं है कि आइआइटीज की परफॉर्मेस बिगड गई है या उनके स्तर में कमी आ गई है। पंजाब यूनिवर्सिटी भी लंबे अर्से से देश की बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में से रही है और टॉप रैंकिंग में आने की क्षमता भी रखती है।

टैलेन्ट्स की खान है

यहां से देश के दो प्रधानमंत्री (डॉ. मनमोहन सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल), एक राष्ट्रपति (डॉ. शंकर दयाल शर्मा), नोबेल प्राइज विनर डॉ. हरगोबिंद खुराना, ऐस्ट्रोनॉट कल्पना चावला समेत कई यूनियन मिनिस्टर्स, सीइओज, पुलिस अफसर और टॉप ब्यूरोक्रैट्स और आर्मी पर्सनल निकले हैं, यानी यहां के स्टूडेंट्स और फैकल्टी में भी पोटेंशियल है, लेकिन इस वर्ष रैंकिंग आने का कारण केवल यह है कि पहली बार सलीके से और प्रमाण सहित व‌र्ल्ड रैंकिंग के लिए डाटा उपलब्ध करवाया गया। इसलिए इस बात पर ध्यान देना होगा कि हम डाटा सही ढंग से और प्रमाण के साथ समय पर रैंकिंग तय करने वाली टाइम्स या क्यूएस एजेंसी को भिजवाएं। इस बार भी हमने क्यूएस एजेंसी को डाटा नहीं भेजा था। इसी कारण उसकी रैंकिंग में हमारा स्थान दिखाई नहीं देता। इस रैंकिंग ने हमारे कॉन्फिडेंस को बूस्ट-अप किया है और अब हम न केवल हमेशा सही तरीके से रैंकिंग्स के लिए अप्लाई करेंगे, बल्कि अपनी पोजिशन को सुधारने के लिए हमेशा कोशिश करते रहेंगे।

डोंट बी सैटिस्फाइड

मैं इस रैंकिंग से संतुष्ट नहीं हूं। अगर जनसंख्या के आधार पर हमारी तुलना चीन से की जाती है, तो हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि चीन की दो यूनिवर्सिटीज विश्व की पहली 50 यूनिवर्सिटीज में गिनी जाती हैं, तो क्या भारतीय समाज नहीं चाहेगा कि उनकी यूनिवर्सिटीज भी इस श्रेणी में आएं। हमारे देश की इकोनॉमी से विश्व की अनेक इकोनॉमीज जुडी हुई हैं। हम अन्य देशों से मुकाबला तभी कर पाएंगे, जब हमारी शिक्षा का स्तर उनके बराबर का होगा। इसलिए हमारे पास बेहतर ग्रेजुएट्स प्रोड्यूस करने के अलावा कोई चारा नहीं है और उसके लिए जरूरी है कि हम अपने एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस का स्तर बढाएं।

रिसर्च वर्क पर फोकस


इस बार भी रैंकिंग के दौरान रेफरेंस में हमारा स्कोर काफी अच्छा रहा, लेकिन रिसर्च में कम। इसलिए अब फोकस रिसर्च पर करना है। इसके लिए ज्यादा फैकल्टी भी चाहिए, टाइम भी और इंफ्रास्ट्रक्चर भी। फिलहाल फैकल्टी को एक्स्ट्रा लेक्चर्स देने पडते हैं और रिसर्च पर वे कम टाइम डिवोट कर पाते हैं, इसलिए उन्हें पर्याप्त समय देने के लिए वैकेंसीज को भरना होगा।

देखें पॉजिटिव ड्रीम्स

मैं एक ड्रीमर हूं और हमेशा सकारात्मक सपने ही देखता हूं। मेरा मानना है कि पॉजिटिव सोच रखने वाले ही सक्सेस होते हैं। हर स्टूडेंट में अपनी काबिलियत होती है। उसे अपनी स्ट्रेंथ को पहचानना चाहिए और उसी को आगे डेवलप करना चाहिए। इस काम में फैकल्टी भी मदद कर सकती है। वे स्टूडेंट्स की काउंसलिंग कर उन्हें पर्सनल अटेंशन देकर उनकी स्किल्स को निखार सकते हैं। यह तभी होगा, जब क्लास में स्टूडेंट्स की संख्या कम होगी और इसके लिए यूनिवर्सिटीज में पडी अनेक वैकेंसीज को भरा जाए।

एक्सपीरियंस का फायदा


मैं चाहता हूं कि सेंट्रल गवर्नमेंट की तरह ही पंजाब यूनिवर्सिटी में भी रिटायरमेंट एज 65 वर्ष कर दी जाए। हमारे यहां बडी संख्या में रिटायर्ड फैकल्टी काम कर रही है। उनके लंबे अनुभव का फायदा स्टूडेंट्स उठा पाते हैं। ये अनुभवी लोग यंग फैकल्टी को भी अच्छी गाइडेंस देते हैं।

 

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