जागें अपने अधिकारों के लिए

Jan 23, 2014 17:04 IST

    एक आम इंसान के जीवन का मकसद क्या होना चाहिए? सिर्फ एक अदद नौकरी और अपना सुखी घर-परिवार? हर आदमी की न्यूनतम जरूरत तो यह है ही, लेकिन क्या केवल इतना ही काफी है? एक आजाद देश के नागरिक के रूप में क्या आप महज इतना ही चाहते हैं?

    आजादी के बाद हमने भारत में जनता के शासन का सपना देखा था और इसके लिए बाकायदा संविधान में प्रावधान भी किया। हमारा देश आधिकारिक रूप से गणतंत्र भी है यानी यहां जनता का शासन है! लेकिन व्यावहारिक रूप से क्या आज वैसा ही है, जिसकी हमने कल्पना की थी? जनता के शासन के नाम पर हमारे कथित जन-प्रतिनिधि आम जन से कटकर जिस तरह मनमाना और एक तरह से सामंती रुख अपना रहे हैं, क्या वही गणतंत्र है?

    अगर हां, तो आम जनता को ऐसी आजादी से क्या लाभ, जहां उसे रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों के लिए सरकारी दफ्तरों और बाबुओं से याचना करते हुए चढावा देने को मजबूर होना पडे। जहां की सरकार और नेताओं द्वारा उसकी रत्ती भर परवाह किए बिना महंगाई को बेलगाम बढने के लिए छोड दिया जाए। दंगों, बीमारी और गरीबी का उपहास उडाते हुए अपने ऐशो-आराम पर अनाप-शनाप खर्च कर दिए जाएं..। आखिर ऐसा कब तक चलेगा? हम अपने अधिकारों के लिए कब जागेंगे? कब तक जाति और क्षेत्र के नाम पर इस्तेमाल होते रहेंगे? कब तक सिर्फ अपनी जीविका चलाने-बचाने के लिए कथित सामंती नेताओं के मनमाने फैसलों को सहते रहेंगे? दिल्ली से बदलाव की जो बयार चली है, उसने सोई-सहती जनता को जगाने और व्यवस्था को बदलने के लिए आगे आने को प्रेरित किया है।

    साल की शुरुआत में सामने आई इस जागृति में ढेर सारी उम्मीदें छिपी हैं। हमारे पास दुनिया की सबसे बडी युवा शक्ति है। हम अपनी इस शक्ति को पहचानें और सब कुछ सहते जाने की नियति से उबरें। आज तमाम क्षेत्रों में हमारे युवा दुनिया भर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं, लेकिन अब जरूरत है अपने मूलभूत अधिकारों के बारे में आवाज उठाने का। ऐसा तभी होगा, जब हम राजनीति को कीचड समझकर उससे परहेज करना छोडेंगे। इस गणतंत्र मन से संकल्प लें कि सब मिल कर देश में सही मायने में जनता का शासन स्थापित करेंगे, जो जनता के लिए काम करे, न कि चंद लोग जनता की तरफ से ही आंख मूंद कर सिर्फ अपनी सुख-सुविधा के इंतजाम में लगे रहें..आखिर यह देश हमारा है और हम इसके नागरिक हैं.

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