पूरी करें आस स्पेस मिशन के साथ

स्पेस अनुसंधान में आई तेजी ने एयरोनॉटिकल इंजीनियर्स के लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। आप भी इस क्षेत्र में करियर की ऊंची उड़ान भर सकते हैं। कैसे भरें अपनी उड़ान, बता रहे हैं ब्रजेश..
Created On: Nov 5, 2008 03:46 IST

चंद्र यान-1 के सफल प्रक्षेपण द्वारा चंद्र खिलौने से खेलने की भारतीय मन की सदियों पुरानी इच्छा तो पूरी हुई ही, दुनिया ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी भारत की योग्यता का लोहा माना। इस अभियान की सफलता में एयरो स्पेस इंजीनियर्स की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत के एयरोनॉटिकल इंजीनियर अब अपने अगले स्पेस मिशन के सपने को साकार करने में जुट गए हैं। कुछ वर्ष पहले तक बहुत कम लोग एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के बारे में जानते थे, लेकिन कल्पना चावला और भारत के मिसाइलमैन तथा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की लोकप्रियता ने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को युवाओं के बीच खासा पॉपुलर कर दिया है। और हो भी क्यों न! आखिर भारतीय युवाओं का रोल मॉडल बन चुकी इन दोनों शख्सियतों के सपनों में रंग भरने का काम एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग ने ही तो किया। आज अब्दुल कलाम और कल्पना चावला से प्रेरित बहुत से युवा मैनेजमेंट और आईटी की राह छोड एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में करियर बना रहे हैं।

क्या है एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग एक ऐसा फील्ड है, जिसमें एयरोनॉटिक्स और स्पेस साइंस दोनों का अध्ययन किया जाता है। चुनौतियों से भरपूर इस क्षेत्र में काम करते हुए आपको एविएशन, अंतरिक्ष और रक्षा से संबंधित अनुसंधान और नई टेक्नोलॉजी के विकास का अवसर मिलता है। एयरोनॉटिकल  इंजीनियर के रूप में आप निम्नलिखित क्षेत्रों में विशेषज्ञता हासिल कर सकते हैं, जैसे-स्ट्रक्चरल डिजाइन, नेविगेशनल गाइडेंस ऐंड कंट्रोल सिस्टम, इंस्टू्रमेंटेशन ऐंड कम्युनिकेशन या प्रोडक्शन मेथॅड,  मिलिट्री एयर क्राफ्ट, पैसेंजर प्लेन, हेलीकॉप्टर, सेटेलाइट, रॉकेट इत्यादि।

योग्यता और कोर्स

एयरोनॉटिकल इंजीनियर बनने के लिए आपके पास बीई/बीटेक (एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग) अथवा कम से कम एयरोनॉटिक्स में डिप्लोमा होना चाहिए। विभिन्न कॉलेजों और आईआईटी द्वारा एयरोनॉटिक्स में डिग्री और पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री करवाई जाती है, जबकि कई पॉलिटेक्निक्स द्वारा एविएशन में डिप्लोमा कोर्स कराए जाते हैं। फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथमेटिक्स विषयों के साथ बारहवीं या उसके समकक्ष परीक्षा पास करने वाला कोई भी व्यक्ति बीई/बीटेक में प्रवेश प्राप्त कर सकता है। यदि आईआईटी में प्रवेश लेना चाहते हैं, तो आपको आईआईटी-जेईई परीक्षा पास करनी होगी। देश में कुछ संस्थान एविएशन में पोस्ट ग्रेजुएट (एमटेक) और डॉक्टोरल प्रोग्राम (पीएचडी) भी कराते हैं।

प्रवेश का आधार

ग्रेजुएट कोर्सो (बीई/बीटेक) में प्रवेश मेरिट के आधार पर होता है। आईआईटी में प्रवेश के लिए बारहवीं कक्षा (पीसीएम) में प्राप्त अंक एवं संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) में प्राप्त अंकों के आधार पर मेरिट बनाई जाती है। अन्य संस्थान अपनी अलग प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते हैं। इसके अतिरिक्त राज्य स्तरीय और राष्ट्रीय स्तर (जैसे-एआईईईई) पर अन्य प्रवेश परीक्षाएं भी आयोजित की जाती हैं। अधिकतर संस्थान जेईई में प्राप्त स्कोर के आधार पर ही छात्रों को प्रवेश देते हैं। इसके अलावा डिस्टेंस लर्निग से इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के इच्छुक डिप्लोमा होल्डर्स या वर्किग व्यक्तियों के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स द्वारा असोसिएट मेंबरशिप ऑफ द इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स नामक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। यह परीक्षा एयरोनॉटिकल सोसायटी ऑफ इंडिया (एएसआई) द्वारा आयोजित की जाती है।

कोर्स की अवधि

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का बीई/ बीटेक कोर्स चार साल का होता है, जबकि डिप्लोमा कोर्स की अवधि दो-तीन साल होती है।

विदेश में शिक्षा

अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में भी एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में अंडरग्रेजुएट लेवॅल कोर्स कराया जाता है। इन संस्थानों में अरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी, एम्ब्री-रिडल एयरोनॉटिकल यूनिवर्सिटी, मिशिगन  स्टेट यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त यहां एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का कोर्स भी कराया जाता है। अंडरग्रेजुएट लेवॅल पर एडमिशन लेने के इच्छुक छात्रों को एसएटी  (सैट) और टीओईएफएल (टॉफेल) पास करना आवश्यक है, जबकि ग्रेजुएट लेवॅल पर एडमिशन  लेने के लिए आपको जीआरई या टॉफेल उत्तीर्ण करना होगा।

करियर संभावनाएं

एयरोनॉटिकल इंजीनियर को इंजीनियरिंग के सबसे एडवांस ब्रांच में काम करना होता है। एयरोनॉटिकल  इंजीनियरिंग के अंतर्गत स्पेस और सेटेलाइट रिसर्च, डिजाइनिंग और डेवलॅपमेंट पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इस कोर्स को करने के बाद नेशनल, इंटरनेशनल, पब्लिक और प्राइवेट एयरलाइंस सर्विसेज और एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में आकर्षक सैलॅरी पैकेज पर जॉब प्राप्त हो सकती है। नई नौकरी ज्वाइन करने पर आपको गे्रजुएट इंजीनियर ट्रेनी या जूनियर इंजीनियर के तौर पर काम करना होगा। बाद में आपकी परफॉर्मेस एकेडमिक बैकग्राउंड और रुचि को ध्यान में रखते हुए एयरक्राफ्ट मेंटिनेंस/ओवर हॉल या सपोर्ट सेक्शन में ट्रेनिंग के लिए भेजा जाता है। ट्रेनिंग पूरा होने के बाद असिस्टेंट एयर क्राफ्ट इंजीनियर या असिस्टेंट टेक्निकल ऑफिसर के पद पर नियुक्ति दी जाती है। प्रमोशन के लिए विभागीय परीक्षाएं ली जाती हैं। इन परीक्षाओं को पास करते हुए आप एडमिनिस्ट्रेटिव या एग्जीक्यूटिव पोजीशन तक पहुंच सकते हैं या कंसल्टेंट बन सकते हैं। अगर आप किसी सरकारी संस्थान में काम करते हैं, तो गवर्नमेंट पे स्केल के आधार पर आपकी सैलॅरी निर्धारित होगी, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में काम करने वालों को कंपनी मैनेजमेंट द्वारा निर्धारित वेतन मिलता है। एयरोनॉटिकल इंजीनियर को शुरुआत में गवर्नमेंट/पब्लिक सेक्टर जैसे कि एचएएल, एनएएल आदि में लगभग 8,000 से 10,000 रुपये मिलते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें अन्य भत्ते भी मिलते हैं। जबकि प्राइवेट सेक्टर में उनकी सैलॅरी लगभग 8,000-15,000 रुपये प्रतिमाह (भत्ते अतिरिक्त) तक होती है। ऐसे इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स जिनके पास मैनेजमेंट की डिग्री भी हो, उनकी सैलॅरी की शुरुआत 10,000-40,000 रुपये तक से होती है। एयरलाइंस में काम करने वाले प्रोफेशनल्स को प‌र्क्स के अलावा परिवार के साथ मुफ्त यात्रा की सुविधा भी दी जाती है। अगर आपको दुनिया की जानी-मानी अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा में काम करने का मौका मिलता है, तो शुरुआती सैलॅरी एक लाख डॉलर से डेढ लाख डॉलर तक हो सकती है। वैसे भारतीय संस्थान इसरो, डीआरडीओ आदि संस्थानों में भी अट्रैक्टिव सैलॅरी ऑफर की जाती है।

प्रमुख संस्थान

एकेडमी ऑफ एयरोस्पेस ऐंड एविएशन, स्वदेश भवन, 2, प्रेस कॉम्प्लेक्स, ए.बी. रोड, इंदौर (मध्य प्रदेश)

गुरुग्राम इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी, लक्ष्मण विहार, एमएल कॉम्प्लेक्स, धन्वापुर रोड, अपोजिट सेक्टर-4, गुडगांव-122001 (हरियाणा)

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग, देहरादून सी-139, सेक्टर-3 निकट युनाइटेड फूड प्रोग्राम बिल्डिंग, करियप्पा मार्ग, डिफेंस कॉलोनी, देहरादून -248001 (उत्तराखंड)

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पटना एयरपोर्ट, पटना (बिहार)

इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग, 1/2 कैनाल रोड, बल्लूपुर देहरादून,(उत्तराखंड)

पीएएमई कॉलेज, पटियाला, पंजाब

पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ

स्कूल ऑफ एविएशन साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी, दिल्ली फ्लाइंग क्लब, सफदरगंज एयरपोर्ट, नई दिल्ली

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के अंतर्गत स्पेस और सेटेलाइट रिसर्च, डिजाइनिंग और डेवलॅपमेंट  पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाता है।

कोर्स के बाद नेशनल, इंटरनेशनल, पब्लिक और प्राइवेट एयरलाइंस सर्विसेज और एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में आकर्षक सैलॅरी पैकेज पर जॉब प्राप्त हो सकती है।

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का बीई/बीटेक कोर्स चार साल का होता है, जबकि डिप्लोमा कोर्स की अवधि केवल दो से तीन साल होती है।

बारहवीं (पीसीएम) पास युवा आईआईटी-जेईई परीक्षा के माध्यम से आईआईटी में प्रवेश ले सकते हैं।

कलाम ने दिलाया नाम

भारत के मिसाइल प्रोग्राम के जनक एपीजे अब्दुल कलाम को बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि और पृथ्वी को विकसित करने का श्रेय प्राप्त है। उन्होंने 1957 में डिपार्टमेंट ऑफ एयरोस्पेस इंजीनियरिंग से एयरोनॉटिकल  इंजीनियरिंग में डीएमआईटी कोर्स किया। खास बात यह है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दी गई अपनी महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए उन्हें देश का राष्ट्रपति भी चुना गया।

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