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संशय में हसरतों का ताना-बाना!

May 22, 2013 15:22 IST

    घर वालों ने खुशी-खुशी लखनऊ पढने भेजा था, लेकिन दिल्ली के निर्भया कांड और उसके बाद लगातार सामने आ रही ऐसी कई घटनाओं ने मुझे परेशान कर दिया है। मुझे लेकर चिंतित मेरी मम्मी अक्सर मेरे पास आ जाती हैं। अगर कभी वे नहीं आ पातीं, तो एक दिन में कई-कई बार कॉल करके मेरी खैरियत पूछती रहती हैं। लखनऊ में पढाई कर रही शाहिस्ता परवीन कहती हैं सिर्फ लखनऊ ही नहीं, अब तो आलम यह है कि जब मैं अपने शहर भोपाल में रहती हूं, तो वहां भी अकेले निकलने में डर लगता है। यह अकेले शाहिस्ता का ही मामला नहीं है। दरअसल, आज देश की राजधानी दिल्ली ही नहीं, तकरीबन हर शहर में इस तरह की असुरक्षा का माहौल है। पढाई से ज्यादा उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता सता रही है। इसी का यह असर है कि पैरेंट्स अपने बच्चों, खासकर बेटियों को किसी दूसरे शहर में पढने भेजने में भी हिचकिचाने लगे हैं।

    दिल्ली यूनिवर्सिटी में बीकॉम फ‌र्स्ट इयर की छात्रा पवनजोत कौर कहती हैं कि निर्भया कांड के बाद जिस तरह से जनभावनाएं उमडी थीं, लगा था सख्त कदम उठाए जाएंगे और कुछ न कुछ पॉजिटिव जरूर होगा। लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ। हर जगह निर्भया जैसी घटनाएं हो रही हैं। हम डर रहे हैं। उम्मीद कर रहे हैं, कभी तो सबेरा होगा और कॉलेज परिसर सेफ होंगे, जिससे हम अपने करियर पर पूरा ध्यान दे सकें।

    डीयू में केरल से एजुकेशन लेने आईं अमल अब्दुल मजीद बताती हैं, बहुत सोच-समझ कर यहां आकर स्टडी करने का डिसीजन लिया था। लेकिन अब कभी-कभी इस पर फिर से सोचना पड जाता है। घर का माहौल यहां के माहौल से ज्यादा अच्छा था। हर जगह के लोगों का माइंड सेट अलग होता है। क्राइम सभी जगह हो रहे हैं। देर शाम निकलने से पहले कई बार सोचना पडता है। यह बंधन नहीं तो और क्या है? केरल में मेरी मां मुझे लेकर परेशान रहती थीं, उन्होंने अब मेरे साथ ही रहने का निर्णय कर लिया है।

    इस बारे में डीयू की छात्रा नितिषा कहती हैं कि पैरेंट्स को बच्चों की चिंता तो हमेशा ही रहती है, लेकिन इधर तो यह चिंता और भी बढ गई हैं। पहले जहां मैं शाम को भी अकेली कोचिंग चली जाती थी या फ्रेंड्स के साथ इंज्वाय कर लेती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो शाम छोडिए, दिन में भी पैरेंट्स अकेले बाहर नहीं जाने देते। जाना ही होता है तो मेट्रो या फिर अपने ही वेहिकल से बाहर भेजते हैं।

    बैग में रखती हूं स्प्रे

    बिहार की मूल निवासी श्वेता कुछ कर दिखाने का अरमान लिए नोएडा पढने आई हैं। वे मानती हैं कि आज जिस तरह की हरकतें हो रही हैं, उससे बहुत सी लडकियों ने अपने आपको कॉलेज कैंपस, सोसायटी तक ही सीमित कर लिया है। ऐसा लगता है, जैसे हम आजाद देश के गुलाम नागरिक हो गए हैं। हमेशा डर लगता है कि बाहर जाने पर कहीं कुछ गलत न हो जाए। दिल में एक ऐसा डर समा गया है जो निकलता ही नहीं है। हम कैद हैं। मैं बहुत डर गई हूं, इसीलिए सिक्योरिटी के लिए बैग में हमेशा एक स्पेशल स्प्रे रखती हूं।

    ब्वॉयज भी हैं शर्मसार

    ऐसा नहीं है कि उक्त घटना का असर सिर्फ ग‌र्ल्स पर ही पडा है। दिसंबर की घटना ने लडकों को भी शर्मसार कर दिया है। यही कारण है कि शर्म और गुस्से से भरे मेल-फीमेल स्टूडेंट्स ऐसी घटनाओं के विरोध में दिल्ली सहित देश के दूसरे शहरों में लगातार शांतिपूर्ण धरने और प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे धरनों-अनशन में सक्त्रिय भागीदारी करने वाले शुभम कहते हैं कि हमारे सारे दोस्तों ने कसम ली है कि हम हर हाल में लडकियों की हेल्प करेंगे। हम उन्हें मोटिवेट भी करेंगे कि अगर कोई उनके साथ बदसलूकी करता है, तो उसका डटकर सामना करें।

    सताती है घर की चिंता

    उत्तराखंड से दिल्ली पढने आए आनंद को भी इस तरह की घटनाओं ने काफी डरा दिया है। खुद की तो इतनी चिंता नहीं है, लेकिन घर में बहनें तो हैं। वे सही समय पर घर तो सुरक्षित आ जाएंगी। यही सब सोचता रहता हूं। पढाई में मन नहीं लग रहा है। लगे भी कैसे? आधा ध्यान तो घर पर ही रहता है। वे मेरी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर हैं। हमेशा परेशान रहता हूं।

    फिक्र बढी पैरेंट्स की

    ग‌र्ल्स और महिलाओं के साथ बढती बदसलूकी की घटनाओं ने पैरेंट्स की चिंता भी काफी बढा दी है। लखनऊ के लोकेश कुमार रस्तोगी कहते हैं कि मेरी कोई बेटी नहीं है, मगर भाई की बेटियां हैं। उनके लिए परेशान रहते हैं। नोएडा की अनुपमा भारद्वाज का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली कांड के बाद सभी अभिभावकों की चिंता बढ गई है। भले ही उनकी बेटी अनुष्का अभी 10वीं में है, लेकिन जब भी वह घर से बाहर रहती है, उन्हें उसकी चिंता सताती रहती है। अक्सर फोन करके उसके बारे में जानकारी लेती रहती हूं। अगर कभी उसके मोबाइल के नेटवर्क में दिक्कत आती है, तो उनकी जान सांसत में आ जाती है। मन में डर के चलते ही उन्होंने बेटी को गर्मियों में दिल्ली से क्त्रैश कोर्स करने से मना कर दिया है।

    फरीदाबाद की हाउस वाइफ संगीता भी अपनी बेटी को लेकर अब ज्यादा परेशान रहने लगी हैं। उनकी बेटी बीएससी कर रही है। मन में संशय के चलते कॉलेज जाने के बाद दिन में कई बार उसे फोन करके उसकी खैर-खबर लेती रहती हैं। संगीता कहती हैं कि लोगों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है, तभी देश में लडकियों को आगे बढने का बेहतर माहौल मिल सकेगा।

    कॉन्फिडेंस लाने की कोशिश


    निर्भया कांड के बाद दिल्ली और देश में सामने आये गुस्से को महसूस करते हुए यूनिवर्सिटीज और अन्य शिक्षा संस्थान पहले से कहीं अधिक सतर्कता बरतते हुए स्टूडेंट्स के बीच नये सिरे से विश्वास बहाल करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए अपने स्तर पर कदम उठाने के अलावा वे पुलिस से भी ज्यादा सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं। इस बारे में दिल्ली के एसआरसीसी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार का मानना है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने और बाहर से पढने आने वाले छात्रों को सुरक्षा का अहसास कराने के लिए पुलिस को भी और सख्त रुख अपनाना होगा, जिससे स्टूडेंट्स का आत्मविश्वास वापस आए।

    टीचर भी पैरेंट्स हैं

    जवान बच्चों से मां-बाप उम्मीद करते हैं कि वे अब उनकी चिंताओं को कम करेंगे, लेकिन स्टूडेंट्स के साथ हो रही दर्दनाक घटनाओं ने पेरेंट्स को ताउम्र परेशानियों से घेर दिया है। वे हर पल अपने बच्चों की फिक्त्र में ही रहते हैं। पहले वे बच्चों से उनके हालचाल दिन में एक-दो बार फोन कर के लिया करते थे। अब तो दिन में आठ-दस बार फोन करते हैं। इस बारे में खुद श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स की एसोसिएट प्रोफेसर स्मिता शर्मा मानती हैं कि अध्यापक होने के साथ-साथ मैं एक मां भी हूं। शाम को भी अपने बेटे को कहीं बाहर भेजने की बात होती है तो अवाइड ही करती हूं। हर दम उसकी चिंता घेरे रहती है। ऐसा इसलिए है कि हम आज के इस माहौल में असुरक्षित महसूस करते हैं।

    बेहतर हो ट्रांसपोर्ट सिस्टम

    डीयू में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर एच.एन. तिवारी का कहना है कि लडकियों के साथ आपत्तिजनक हरकतों को रोकने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है। इस दिशा में सबसे पहले पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर करें। आखिर निर्भया के साथ जो कुछ हुआ, उसके लिए कहीं न कहीं हमारी खस्ताहाल ट्रांसपोर्ट व्यवस्था भी जिम्मेदार थी। आखिर क्यों निर्भया को देर रात प्राइवेट वाहन में लिफ्ट लेनी पडी? अगर उस वक्त सार्वजनिक परिवहन बस मौजूद होती तो इस दुखद घटना से बचा जा सकता था।

    सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग

    कई शैक्षिक संस्थानों ने असुरक्षा के वर्तमान माहौल को दूर करने के लिए कई कदम उठाये हैं। इस बारे में फरीदाबाद स्थित पंडित जवाहर लाल नेहरू महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. संतोष कुमारी का कहना है कि छात्राओं की सुरक्षा के लिए कॉलेज प्रबंधन ने 12 सदस्यीय कमेटी बनाई है, जो समय-समय पर उनके साथ बैठक करती है और उनकी समस्याओं पर विचार करती है। इसके अलावा, कॉलेज में आत्मसुरक्षा का प्रशिक्षण भी छात्राओं को दिया जा रहा है। स्टूडेंट्स को भी देश-समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी समझाई जा रही है, ताकि वे एक अच्छे नागरिक बनें और इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए आगे आएं। ऐसे ही प्रयास अन्य शहरों से भी सामने आ रहे हैं।

    कैंपस से बाहर जाने पर पाबंदी

    इंस्टीट्यूट्स स्टूडेंट्स की सुरक्षा के मद्देनजर कई और कदम उठा रहे हैं। इस बारे में नोएडा स्थित सत्यम फैशन इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर डीपी सिंह का कहना है कि वैसे तो उनके कैंपस में छात्राओं की सुरक्षा का ख्याल पहले से ही रखा जाता रहा है, लेकिन वर्तमान हालात को देखते हुए अब उनके कैंपस से बाहर जाने पर रोक लगा दी गई है और आने-जाने का टाइम टेबल बना दिया गया है। विशेष परिस्थितियों में विशेष इंतजाम के साथ ही छात्राओं को बाहर जाने की अनुमति दी जाती है। हमारा कैंपस भी 24 घंटे गा‌र्ड्स की सुरक्षा निगरानी में होता है।

    उम्मीदों के शहर से उम्मीदें

    देश की राजधानी और एजुकेशन व जॉब का हब होने के कारण युवाओं को दिल्ली-एनसीआर से बहुत उम्मीदें होती हैं। इस घटना से ये उम्मीदें कुछ धूमिल पडने लगी थीं, लेकिन उत्साही युवाओं को उम्मीद है कि जल्द ही असुरक्षा का यह धुंधलका छंट जायेगा। उत्तर प्रदेश से दिल्ली आकर इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे अग्रज चौहान के पिता योगेश चौहान का मानना है कि दिल्ली अवसरों से भरपूर है। यहां काफी अच्छे इंस्टीट्यूट तो हैं ही, साथ ही जॉब्स की भी कोई कमी नहीं है। इसकी यह साख बरकरार रहे, इसके लिए अहम है कि यहां की कानून व्यवस्था बेहतर की जाए। कुछ ऐसा ही उन सभी शहरों में करने की जरूरत है जहां से इस तरह की खबरें अधिक सामने आ रही हैं।

    स्पेशल क्लासेज-काउंसलिंग

    स्टूडेंट्स अपने आपको कॉलेज कैंपस में तो सुरक्षित मानते हैं, लेकिन उसके बाहर उनकी सुरक्षा का क्या होगा? यह प्रश्न उन्हें हमेशा सताता रहता है। दिल्ली सहित सभी जगहों के टीचर मानते हैं कि परिसर के बाहर स्थिति बदल जाती है। डीयू में प्रोफेसर डॉ.अनिल कुमार कहते हैं कॉलेज कैंपस में छेडछाड जैसी वारदातें संभव नहीं हैं, लेकिन कैंपस के बाहर इस तरह की हरकतों से छात्राएं सावधान रहें, इसके लिए क्लास लेवल पर हम उनकी काउंसलिंग करते हैं। साथ ही समय-समय पर स्पेशल क्लासेज भी चलाते हैं। उनसे पर्सनली भी बात करते हैं। इसमें महिला प्रोफेसरों का रोल सराहनीय है। इस कार्यक्रम के अच्छे नतीजे भी सामने आ रहे हैं। इस बारे में अरविंदो कॉलेज के प्रोफेसर और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के सेक्रेटरी एस.डी.सिद्दीकी कहते हैं कि डीयू में छात्र पूरी तरह सुरक्षित रहें और केवल पढाई में ही अपना मन लगाएं, यही हमारा प्रयास है।

    कायम रहे उत्साह

    निर्भया और अन्य के साथ हुई विडंबनापूर्ण घटनाओं की पुनरावृत्ति आगे न हो, इसके लिए सभी को मिल-जुलकर प्रयास करना होगा। समाज में व्याप्त विकार को दूर करने के अलावा युवाओं को भी भावनात्मक रूप से मजबूत बनने की जरूरत है। पैरेंट्स भी उन्हें महिलाओं-बेटियों का सम्मान करना सिखाएं।

    -दिल्ली से डॉ. योगेश व पीयूष द्विवेदी, नोएडा से रचना वर्मा, फरीदाबाद से अनिल बेताब, लखनऊ से दीपा श्रीवास्तव और पटना से डॉ. राजीव रंजन शुक्ला के इनपुट के साथ.

     

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