सपनों को पंख लगा सकते हैं गांधी

कल यानी 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती है, इसलिए इस बार के गुरु मंत्र में किसी विषय के बजाय बापू के सिद्धांतों के आलोक में युवाओं के मार्गदर्शन के लिए कुछ खास सामग्री दी जा रही है। इस विशेष कड़ी में जाने-माने समाजशास्त्री और दिल्ली स्थित जेएनयू के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम स्थित ग्लोबल स्टडीज प्रोग्राम के कोऑर्डिनेटर प्रो. आनंद कुमार महात्मा गांधी के आदर्शो पर युवाओं को दे रहे हैं विशेष गुरु मंत्र..
Created On: Oct 1, 2008 03:54 IST

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शो के संबंध में हमें इस बात का ध्यान रखने की जरूरत है कि गांधीजी की विरासत के तीन पक्ष हैं। पहला, हमारे इतिहास में गांधीजी की भूमिका, दूसरा, वर्तमान जीवन में गांधीजी की प्रासंगिकता और तीसरा, हमारे देश और दुनिया के बेहतर भविष्य के लिए गांधीजी के दिखाए रास्ते का महत्व।

गांधी के सूत्र हैं गुरु मंत्र

गांधीजी ने भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति के बडे दोषों के खिलाफ जो रचनात्मक कार्यक्रम और सत्याग्रही आंदोलन चलाए, उनकी समकालीन प्रासंगिकता से इनकार नहीं किया जा सकता। सुखी और सफल जीवन के लिए चिंतित स्टूडेंट्स यदि गांधी द्वारा दिए गए उपयोगी सूत्रों, जैसे-सत्य, अहिंसा, लालच पर विजय, कठिन परिश्रम आदि अपनाएं, तो उन्हें सफलता जरूर मिलेगी।

असफलताओं से सफलता

आमतौर पर विद्यार्थियों के सामने गांधीजी को एक लगभग असंभव आदर्शो को जीने वाले महामानव के रूप में पेश किया जाता रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि गांधी का जीवन असफलताओं के बीच से सफलता की ओर जाने वाले महापुरुष की महागाथा है। बचपन से अधेड अवस्था तक वे भी किसी औसत मनुष्य की तरह ही मामूली कमजोरियों से पीडित रहे, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे सत्यनिष्ठा और अन्यायों से जूझने के लिए आत्मबल की साधना की। उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में पश्चिमी सभ्यता को बेहद आकर्षक पाया और उच्च शिक्षा के लिए आज के विद्यार्थियों की तरह घर से जिद करके इंग्लैंड गए। छात्र जीवन के दौरान फैशनेबल तरीके से बाल कटवाए, कपडे सिलवाए और डांस सीखने की कोशिश की। लेकिन एक सजग विद्यार्थी की भांति उन्होंने अपनी कमजोरियों को भी पहचाना। हालांकि, वे आत्ममंथन के जरिए उचित और अनुचित का विवेक भी विकसित करते रहे। इसी प्रकार आज अच्छी आमदनी वाली नौकरी की जद्दोजहद में जुटे युवकों की तरह गांधी पोरबंदर और मुंबई में मिल रहे अवसरों के बावजूद दक्षिण अफ्रीका में बेहतर आमदनी की तलाश में गए और वहां करीब 20 वर्ष तक अप्रवासी भारतीय के रूप में काम भी किया।

गांधी के सिद्धांतों में है समाधान का मार्ग

आज के युवा को अपने निजी और सामाजिक जीवन में तरह-तरह की चुनौतियों का सामना करना पडता है। इन चुनौतियों के समाधान हेतु वह कोई फॉर्मूला चाहता है। हालांकि, चौतरफा अवसरवाद और भ्रष्टाचार को देखकर युवाओं को लगता है कि सत्य और कठोर परिश्रम अपने आप में सफलता के लिए अपर्याप्त हैं। ऐसे में गांधी अपने कर्तव्यों के प्रति सजगता और भोग की बजाय सादगी में संतोष और आनंद का रास्ता दिखाते हैं। युवकों को यह समझना और जानना चाहिए कि स्वार्थ और भोग को महत्ता देने वाला जीवन समाज से ही नहीं, बल्कि हमें अपने माता-पिता, भाई-बहनों तक से दूर कर देता है। दूसरी तरफ, यदि हम अपने क‌र्त्तव्यों के प्रति सजग रहें और सादगी को जीवन-यात्रा का आधार बनाएं, तो चरित्रहीनता, स्वार्थ और भ्रष्टाचार जैसे खतरे अपने आप हमारा पीछा छोड देंगे। गांधीजी ने हमारे स्वराज को ग्राम स्वराज और सर्वोदय सिद्धांत पर आधारित करने के लिए सुझाव दिया था। दूसरी तरफ धर्मनिरपेक्षता और धर्मो की परस्पर होड के दो पाटों के बीच में हमारी राष्ट्रीय एकता लगातार पिसती जा रही है। ऐसे में गांधी के दिखाए सर्व-धर्म-समभाव के मार्ग पर चलना कहीं अधिक प्रासंगिक लगता है। इसी तरह जनतांत्रिक व्यवस्था के 60 वर्ष बीतने के बावजूद जन पर तंत्र की जकड बढती ही जा रही है। साधारण नागरिक, सरकारी बाबू, पुलिस, नेता और न्यायाधीश को अपना सेवक मानने का साहस नहीं कर सकता। गांधी ने हमें सत्याग्रही समाज बनाने का मंत्र दिया था, जिसमें न्याय के लिए अकेले व्यक्ति की आवाज भी पूरी व्यवस्था पर अंकुश के लिए पर्याप्त मानी जानी चाहिए। आज की नई पीढी यदि सरकारी ताने-बाने में घटती आजादी और बढती मनमानी का समाधान चाहती है, तो गांधी मार्ग उसकी मंजिल के लिए प्रासंगिक है। तीसरा संदर्भ विश्व के पर्यावरण संकट का है। गांधीजी ने आज से सौ साल पहले 1909  में हिंद स्वराज नामक क्रांतिकारी पुस्तक प्रस्तुत करके हमें इन खतरों के प्रति सजग किया था।

दुनिया के लिए अनुकरणीय

आज विश्व के सर्वोच्च मंच संयुक्त राष्ट्र संघ का भी यह मानना है कि दुनिया को प्रदूषण और हिंसा के दोमुंहे महासंकट से बचाने के लिए गांधी के सूत्र ही अनुकरणीय हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष से गांधीजी के जन्मदिवस अर्थात 2 अक्टूबर को विश्व स्तर पर अहिंसा दिवस मनाने की शुरुआत की है। कहा जा सकता है कि गांधी के सिद्धांतों को पूरी दुनिया में न सिर्फ मान्यता दी जा रही है, बल्कि उसे अपनाया भी जा रहा है। यह हमारे लिए गौरव की बात है। लेकिन यह गौरव तब और बढ जाएगा, जब हम खुद गांधीजी के सिद्धांतों और आदर्शो को पॉजिटिव  अप्रोच के साथ अपने जीवन और काम-काज में अपनाएंगे। दुनिया ने तो गांधी को मार्गदर्शक मानने की शुरुआत कर दी है, अब यह देश की नई पीढी को तय करना होगा कि वह गांधी को अपना गुरु बनाए या नहीं।

मुन्नाभाई से होंगे कहीं आगे

गांधीजी की हत्या के लगभग आधी शताब्दी बाद एक मनोरंजक फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई आई। इसमें गांधी के कुछ आदर्शो को व्यावहारिक रूप में दिखाने की कोशिश की गई। गांधी स्वयं कहते हैं कि उनका रास्ता इतना आसान नहीं है ! लेकिन बापू के दिखाए रास्ते पर एक-एक पग बढाते हुए आप मुन्नाभाई से कहीं आगे निकल सकते हैं।

जेएनयू के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम स्थित ग्लोबल स्टडीज  प्रोग्राम के कोऑर्डिनेटर प्रो. आनंद कुमार से मुनमुन प्रसाद श्रीवास्तव की बातचीत पर आधारित

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