स्नो साइंटिस्ट

Jan 9, 2014 13:56 IST

    पिछले कुछ दशकों में क्लाइमेंट चेंज की वजह से ग्लेशियर पिघलने लगे हैं और पहाडों से बर्फ की चत्रनें सरकने लगी हैं। इन घटनाओं के पूर्वानुमान, बर्फ से संबंधित स्टडी के लिए ग्लेशियोलॉजिस्ट और ऐवलैंच एक्सपर्ट की डिमांड दुनिया के साथ-साथ भारत में भी बढने लगी है। कैसे बन सकते हैं स्नो साइंटिस्ट या बर्फ के वैज्ञानिक, आइए जानते हैं?

    ग्लोबल वार्रि्मग की वजह से जहां मौसम का मिजाज बदलने लगा है, वहींग्लेशियर भी पिघलने और सरकने लगे हैं। यही वजह है कि आज बर्फ और ग्लेशियर के मिजाज को समझने के लिए ग्लेशियोलॉजिस्ट और ऐवलैंच एक्सपर्ट की जरूरत महसूस की जाने लगी है। दरअसल, ग्लेशियोलॉजिस्ट आइस के फॉर्मेशन के साथ-साथ ग्लेशियर, आइस शिट्स, पोलर आइस कैप आदि के प्रभाव और क्लाइमेंट पर होने वाले उसके असर के बारे में अध्ययन करते हैं। ऐवलैंच की वार्रि्नग समय-समय पर स्नो ऐंड ऐवलैंच स्टडी एस्टैब्लिशमेंट (एसएएसई) द्वारा दी जाती है, जो डिफेंस रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) का एक हिस्सा है। हाल के वर्र्षो में पहाड से सरकती चत्रनों की वजह से दुर्घटनाएं बढने लगी हैं। ऐसे में बर्फ से जुडी स्टडी काफी महत्वपूर्ण हो गई है।

    एसएएसई में वैज्ञानिकों की एक टीम है, जो स्नो से रिलेटेड स्टडी करती है। साथ ही, स्नो बिहेवियर, भविष्यवाणी और ऐवलैंच को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। जानकारों की मानें, तो भारत में बडे पैमाने पर स्नो रिसर्चर की जरूरत है। कई ऐसे एरिया हैं, जहां की मैपिंग की जानी बाकी है। इनका कार्य फील्ड और लैब दोनों में होता है।

    नेचर ऑफ वर्क ऐवलैंच और ग्लेशियोलॉजिस्ट स्नो से रिलेटेड स्टडी करते हैं। ग्लेशियोलॉजिस्ट ग्लेशियर के बारे में अध्ययन करते हैं, जो आइस, वाटर, सेडिमेंट्स आदि से बना होता है। वे इस बारे में जानने की कोशिश करते हैं कि क्लाइमेंट चेंज की वजह से ग्लेशियर पिघल रहा है या फिर बढ रहा है। इसके बाद वे ग्लेशियर के जुडे डाटा का वैज्ञानिक तकनीक से एनालिसिस करते हैं और पता लगाते हैं कि बर्फ के पिघलने के क्या कारण हो सकते हैं। ग्लेशियोलॉजिस्ट की फिजिकल फिटनेस अच्छी होने के साथ-साथ माउंटेनिंग के प्रति जबरदस्त पैशन होना जरूरी है। उन्हें 4000 मीटर की ऊंचाई पर भी लंबे समय तक काम करना पड सकता है। इसके अलावा, सर्वेइंग, साइट्स की पहचान, मैपिंग, लॉगिंग और सैंपलिंग जैसे कार्य भी करने होते हैं। हालांकि यह चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए अच्छी एकेडमिक क्वालिफिकेशन के साथ-साथ नेचुरल प्रॉसेस की अच्छी समझ बेहद जरूरी है। आमतौर पर ऐवलैंच (पहाड से बर्फ की सरकती हुई चत्रनें) एक्सपर्ट स्नो को समझने और एनालाइज करने के साथ-साथ इसके बिहेवियर और प्रॉपर्टीज के संबंध में स्टडी करते हैं। इससे उन्हें ऐवलैंच के बारे में भविष्यवाणी करने में मदद मिलती है। साथ ही इससे होने वाले नुकसान को रोकने के लिए स्ट्रक्चर तैयार करने का कार्य भी करते हैं।

    क्वालिफिकेशन 12वींमें साइंस की स्टडी करने वाले स्टूडेंट्स इस फील्ड में करियर बना सकते हैं। बीएससी और एमएससी मैथ या फिजिक्स से कर लेते हैं, तो इस फील्ड में आगे बढना आसान हो जाता है। इसके अलावा, फिजिकल/ बायोलॉजिकल/ केमिकल, अर्थ साइंस, एनवॉयरनमेंटल साइंस की डिग्री रखने वाले स्टूडेंट्स भी इस फील्ड में करियर बना सकते हैं। अगर पीएचडी कर लेते हैं, तो काफी आगे तक जा सकते हैं। आप तीन रूट्स से स्नो रिसर्चर बन सकते हैं। पहला, एकेडमिशियन के तौर पर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट में काम कर सकते हैं। हो सकता है यहां सैलरी बहुत अच्छी न हो, लेकिन आपको अपने इंट्रेस्ट की फील्ड में काम करने का मौका मिल जाएगा। दूसरा, ऐवलैंच लैब में काम करते हुए आप स्नो रिसर्चर बन सकते हैं। यहां स्टेट-ऑफ-आर्ट-टेक्नोलॉजीज के साथ काम करने के अलावा, यहां अच्छी सैलरी भी मिलती है। साथ ही, खुद को लेटेस्ट इनोवेशन से अपडेट भी रख सकते हैं। तीसरा, आप सीधे ऐवलैंच एक्सपर्ट के रूप में काम कर सकते हैं। वैसे, ऐवलैंच रिसर्चर के लिए मैथ्स, जियोलॉजी और कंप्यूटर साइंस बैकग्राउंड का होना जरूरी है। हालांकि जो ऐवलैंच-रेसिस्टेंट स्ट्रक्चर के लिए काम करते हैं, वे आमतौर पर सिविल और मैकेनिकल इंजीनियर होते हैं। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियर स्नो स्टडी में इस्तेमाल होने वाले इंस्ट्रूमेंट और डेवलपमेंट के लिए काम करते हैं।

    स्किल्स -रिसर्च और एनालिटिकल स्किल -प्रतिकूल मौसम में कार्य करने की एबिलिटी -माउंटेनियरिंग स्किल्स -फिजिकली फिट रहने की स्किल्स -अच्छी कम्युनिकेशन स्किल -ग्रेट टीम स्पिरिट कहां कर सकते हैं कार्य स्नो साइंटिस्ट, ग्लेशियोलॉजिस्ट और ऐवलैंच एक्सपर्ट के लिए रिसर्च इंस्टीट्यूट्स, पेट्रोलियम ऐंड माइनिंग कंपनीज, जियोलॉजी ऐंड इंजीनियरिंग फर्म, कंसल्टिंग कंपनीज, गवर्नमेंट इंस्टीट्यूशन, एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स आदि में काम करने का भरपूर मौका होता है।

    सैलरी पैकेज स्नो साइंटिस्ट या फिर ग्लेशियोलॉजिस्ट के रूप में करियर की शुरुआत लेवल बी से होती है और शुरुआती सैलरी करीब 40 हजार रुपये प्रतिमाह होती है। अगर परफॉर्र्मेस अच्छा रहता है और सीनियर लेवल पर पहुंचते हैं, तो सैलरी एक लाख रुपये प्रतिमाह से अधिक हो सकती है। इसके अलावा, दूसरी अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं.

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