IAS रमेश घोलपः गरीबी तथा पोलियो के बावजूद बने IAS

Aug 28, 2018 12:23 IST
    IAS रमेश घोलप पोलियो के बावजूद बने IAS
    IAS रमेश घोलप पोलियो के बावजूद बने IAS

    आज हम इस लेख में एक ऐसे शख्स की जीवनी का उल्लेख करने जा रहे हैं जिसने विषम परिस्थितियों के बावजुद IAS जैसी कठिन परीक्षा मे सफलता प्राप्त की। रमेश घोलप बर्शी तालुक के गावँ महगाओं, जिला सोलापुर, महाराष्ट्र के निवासी हैं। उनके पिता गोरख घोलप साईकिल मरम्मत की दुकान चलाते थे जो कि 4 सदस्यीय परिवार के लिए एक मात्र आय का श्रोत थी। उनके पिता गोरख घोलप शराब पीने के आदि थे और अपनी आय का बहुत अधिक हिस्सा शराब पीने में खर्च कर देते थे। शराब की लत की वजह से उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और फिर उनको अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। पिता के अस्वस्थ्य होने के बाद पूरे परिवार का बोझ रमेश और उसकी मां के कंधों पर आ गया। रमेश की मां गांवों में घूम कर चूड़ियाँ बेचने लगीं और रमेशजी जो कि पोलियो की बीमारी से ग्रसित हैं अपनी मां के साथ चूड़ियाँ बेचने में मदद करने लगे। How to write Essay in IAS Exam?

     

     

     

    रमेशजी  का बचपन विकलांगता और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच दब गया था पर इसे इन्होने अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया और इन परिस्थितियों का डट कर सामना किया। गांव के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए अपने चाचा के गावं बर्शी मे रहने लगे । 2005 में रमेश जब 12वीं कक्षा की पढ़ाई कर रहे थे तभी उनके पिता के देहांत हो गया। उसी दौरान उनकी कॉलेज की परीक्षा चल रही थी और रमेशजी के पास बर्शी से महगाओं तक जाने के लिए किराया भी नहीं था। वैसे बर्शी से महगाओं बस का किराया 7 रुपये था पर विकलांगों के लिए सिर्फ 2 रुपये था। रमेश अपने गावँ में रामू के नाम से जाने जाते हैं ओर फिर रामू के पड़ोसियो ने रामू को पैसे से मदद की जिससे वह अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हो पाये । पिता की मृत्यु के चार दिन बाद रामू के कॉलेज में उनकी रसायन शास्त्र(केमिस्ट्री) की परीक्षा थी। अपनी मां के आग्रह करने पर वह रसायन शास्त्र की परीक्षा में शामिल हुए लेकिन उसके बाद उन्होंने अन्य मॉडल परीक्षा छोड़ दी। रमेश शिक्षा की अहमियत को भलि-भाँति जानते थे और यह भी जानते थे कि वह शिक्षा के ज़रिये ही अपने परिवार को गरीबी के चंगुल से बचा सकते है। कक्षा 12वीं की अंतिम परीक्षा के लिए केवल एक महिने का समय शेष था तभी रमेश को अपने एक शिक्षक का पत्र मिला कि उन्हें रसायन विषय में 40 में से 35 अंक प्राप्त हुए हें जिससे प्रसन्न होकर शिक्षक ने उनकी मदद करने की इच्छा जताई थी और 12वीं कक्षा के अंतिम परीक्षा में शामिल होने के लिए प्रोतसाहित भी किया। रमेशजी  12वीं कक्षा के अंतिम परीक्षा में शामिल हुए और 88.5% अंक अर्जित किया।

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    रमेशजी 12वीं कक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने के बावजूद डी.एड (डिप्लोमा इन एजुकेशन) की पढ़ाई करना चाहते थे ताकि उन्हें जल्द से जल्द शिक्षक की नौकरी मिल सके और आर्थिक तंगी से निजात मिले। डी.एड की पढ़ाई के दौरान उन्होंने मुक्त विश्वविद्यालय (ओपन यूनिवर्सिटी) से कला में स्नातक की डिग्री भी हासिल की और फिर वर्ष 2009 में शिक्षक की नौकरी की। भले ही शिक्षक की नौकरी रमेशजी के परिवार के लिए सपने सच साबित होने जैसा था पर वास्तव में रमेशजी का सपना कुछ और ही था। रमेशजी गरीबों की मदद करना चाहते थे और समाज को भ्रष्टाचार जैसे कुरोगों से मुक्त कराना चाहते थे जो कि एक शिक्षक के लिए बहुत ही कठिन कार्य था। रामेशजी अपनी मां और भाई के साथ अपने चाचा के घर में रहते थे और फिर सरकारी योजना- इंदिरा आवास योजना के तहत दो कमरे का घर बनाने में सफल हुए। इंदिरा आवास योजना के तहत रामेशजी अपनी मां को सरकारी दफ्तरों में जाते देख विचलित हो जाते थे क्योंकि रमेशजी के परिवार के पास बीपीएल (गरीबी रेखा के नीचे) कार्ड था जिसकी वजह से उनके काफी प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी।

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    रमेशजी सामाजिक व्यवस्था एवं प्रणाली में मौजूद भ्रष्टाचार से बहुत परेशान थे। सरकारी अस्पताल में तपेदिक रोग (क्षय रोग) के लिए भर्ती पिता को डॉक्टरों द्वारा पर्याप्त ध्यान न मिलने से रमेशजी हताश थे। उन्होंने अपनी मां और अन्य विधवाओं को एक अधिकारी द्वारा छेड़छाड़ एवम घूस मे राशि लेते हुए देखा था जिसके एवज मे उस अधिकारी द्वारा पेंसन की राशि दिलाने के लिए झूठे वायदे किए गए थे। समाज इन्हीं बुराईयों ने रमेशजी को अन्दर से झकझोर कर रख दिया और फिर उन्होंने इन्हीं बुराईयों से लड़ने की ठान ली थी।
    रमेशजी कॉलेज की पढ़ाई के दौरान छात्र संघ के सदस्य भी रहे थे और परिणामस्वरूप कॉलेज के विभिन्न मुद्दों के लिए अनुमोदन प्राप्त करने के लिए अक्सर तहसीलदार के कार्यालय में जाते थे । उन्होंने तहसीलदार को सबसे प्रभावशाली एवं शक्तिशाली सरकारी अधिकारी के रूप में देखा था। रमेशजी ने फैसला किया कि वे तहसीलदार बनेंगे ताकि वह अपने परिवार एवं अन्य असहाय लोगों की सभी समस्याओं का समाधान कर सकें। सितंबर 2009 में उन्होंने अपने सपने की ओर पहला कदम उठाया और अपनी मां द्वारा गांव में स्थित स्वयं सहायता समूह से लिया गया ऋण का उपयोग करते हुए UPSC परीक्षा की तैयारी के लिए अपनी नौकरी से 6 महीने की छुट्टी लेकर पुणे चले गए। उस समय रमेशजी को Maharashtra PSC और UPSC से सम्बंधित उपयुक्त जानकीरी भी नहीं थी फिर पुणे स्थित एक कोचिंग में पढ़ा रहे शिक्षक से मिलकर उन्होंने इसकी पूरी जानकारी प्राप्त की।

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    रमेशजी ने मई 2010 में UPSC परीक्षा के लिए आवेदन किया पर सफल नहीं हुए। इसी दौरान उन्होंने स्थानीय पंचायत चुनावों से लड़ने के लिए अपने गांव महगाओं में कुछ दोस्तों की मदद से एक राजनीतिक दल भी बनाया था। गरीब एवं असहाय को सहायता करने के मकसद से सरपंच के उम्मीदवार के रूप में अपनी मां को चुनाव के लिए तैयार किया पर उनकी माँ श्रीमती विमल घोलप कुछ हीं मतों से चुनाव हार गयीं। रमेशजी 23 अक्टूबर 2010 के चुनाव परिणाम की तिथि को अपने जीवन का सबसे बड़ा मोड़ मानते हैं जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी आत्मकथा इथे थंबने नाही (मैं यहाँ नहीं रुकूंगा) में किया है। चुनाव की हार से दुखी रमेशजी ने अपने जीवन में हार न मानने की ठान ली। व्यवस्था के खिलाफ फिर से लड़ने की ताकत ढूँढ़ने लगा और अपने गांव में यह अहवान कर दिया कि वे गांव छोड़कर जा रहे हैं और वो तब तक नहीं लौटेंगे जब तक वो एक शक्तिशाली अधिकारी नहीं बन जाते। इसी अहवान के साथ रमेशजी ने सबसे पहले अपनी नौकरी छोड़ दी और फिर स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव करियर (एसआईएसी) परीक्षा पास किया जिसके तहत उन्हें छात्र के रूप में रहने के लिए एक छात्रावास और छात्रवृत्ति मिलने लगी। और फिर रमेशजी को कड़ी मेहनतों के बाद UPSC IAS परीक्षा में सफलता मिल हीं गई।

    UPSC IAS परीक्षा 2012 में रमेशजी ने बिना किसी कोचिंग संस्थान ज्वाइन किए ही 287 रैंक हासिल की और फिर 12 मई 2012 को अपने अहवान के अनुसार IAS अधिकारी बनने के बाद अपने गांव लौट आए।

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