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छात्रों में तनाव के मुख्य कारक तथा इनके निवारण के कुछ खास उपाय

अकादमिक सफलता के उच्च स्तर पर सफलता को प्राप्त करने के लिए छात्रों पर शिक्षा का दबाव उनकी आनंदोल्लास को खत्म करता जा रहा है और उन्हें दिन प्रति दिन चिंता और निराशा की ओर ले जाता है जिस कारण कई छात्र अपने करियर को लेकर काफी डिप्रेशन में आ जाते हैं. यहाँ हम छात्रों के बीच तनाव पैदा करने वाले विभिन्न कारकों के बारे में चर्चा करेंगे तथा साथ ही साथ हम प्रत्येक कारक के विभिन्न पहलुओं और इसे रोकने के तरीकों पर भी बात करेंगे.

May 9, 2018 10:08 IST
Stress among high school students and tips to deal with it

सभी कक्षाओं के एग्जाम लगभग समाप्त हो चुके हैं तथा अब परिणाम की प्रतीक्षा का समय भी दिन प्रति दिन बीतता जा रहा है. अर्थात परिणाम के घोषित होते ही छात्रों को एक और तनाव का सामना करना पड़ता है जब उन्हें अगले पाठ्यक्रम में चुने जाने वाले विषय या स्ट्रीम का चयन करना होता है. दरअसल इन बातों पर तनाव होना छात्रों के लिए एक प्राकृतिक प्रवृति है.

अकादमिक सफलता के उच्च स्तर पर सफलता को प्राप्त करने के लिए छात्रों पर शिक्षा का दबाव उनकी आनंदोल्लास को खत्म करता जा रहा है और उन्हें दिन प्रति दिन चिंता और निराशा की ओर ले जाता है जिस कारण कई छात्र अपने करियर को लेकर काफी डिप्रेशन में आ जाते हैं.

जब एक छात्र इस प्रकार के तनाव में होता है तो इससे उनके अकादमिक शिक्षा पर भी काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं. जिससे उनके ग्रेडस पर तो प्रभाव पड़ता ही है साथ ही साथ स्वास्थ को लेकर भी परेशान रहने लगते हैं.

इसलिए छात्रों तथा अभिभावकों को सबसे पहले यह जानना बहुत ज़रूरी है कि ऐसे कौन-कौन से मुख्य कारक हैं जिस कारण छात्र अक्सर तनाव में आ जाते हैं तथा इसके निवारण के लिए छात्रों तथा अभिभावकों को क्या करना चाहिए:

तनाव के लक्षण:

छात्रों की नियमित गतिविधियों में होने वाली कई बदलावों का पता लगाकर तनाव को पहचाना जा सकता है. हालाकी कई बार कुछ छात्रों को पता होता है कि वह अपने अकादमिक शिक्षा को लेकर काफी तनाव में हैं लेकिन इस वषय पर न वह अपने माता-पिता से चर्चा करते हैं और नाहीं किसी और से इस विषय में कोई मदद लेते हैं. वहीँ दूसरी ओर कुछ ऐसे भी छात्र होते हैं जिनके तनाव का कारण उन्हें खुद अच्छी तरह समझ नहीं आता है. अर्थात ऐसी परिस्तिथि में अभिभावकों को चाहिए की वह अपने बच्चों के तनाव के कारण को समझ कर उसका निष्कर्ष निकाल सकें.

छात्रों में होने वाले तनाव के मुख्य संकेत नीचे अंकित है:

1. भूख में परिवर्तन.

2. खेल और कहीं आने जाने में रुचि न होना.

3. सामाजिक अलगाव.

4. चिड़चिड़ापन और अधीरता(Impatience).

5. नींद की समस्याएं.

6. अत्यधिक चिंता और नकारात्मक विचार.

7. परफॉरमेंस में कमी आना

8. सरदर्द

9. दबाव में होने की प्रवृति

10. पूरी तरह से खुद को खाली महसूस करना

11. किसी भी कार्य को पूरा करने में असमर्थता महसूस करना.

 

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अब हम छात्रों के बीच तनाव पैदा करने वाले विभिन्न कारकों के बारे में चर्चा करेंगे तथा साथ ही साथ हम प्रत्येक कारक के विभिन्न पहलुओं और इसे रोकने के तरीकों पर भी बात करेंगे.

1. परीक्षा का दबाव:

अक्सर देखा गया है कि छात्र एग्जाम के प्रेशर में या पढ़ाई के बढ़ते दबाव के कारण डिप्रेशन में आ जाते हैं. आज कल बढ़ते हुवे प्रतियोगिता की होड़ में छात्रों पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है. अर्थात वह अपने अपेक्षा के विपरीत खुद को देखते ही असमर्थ महसूस करने लगते हैं. ऐसे समय में चाहिए की पेरेंट्स छात्रों को पूरा सहयोग करें. उनपर अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ डालनें के बजाय उन्हें समझाएं की कोई प्रतियोगी परीक्षा या किसी विषय को लेकर तनाव लेने की जगह निसंदेह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें.

2. शैक्षिक दबाव: शैक्षिक दबाव का कई बार कारण खुद अभिभावक भी बन जाते हैं क्यूंकि अक्सर छात्रों पर उनके पेरेंट्स द्वारा अच्छे मार्क्स प्राप्त करने का दबाव होता है, जबकि इसकी जगह पेरेंट्स को अपने बच्चे को प्रोत्साहित करना चाहिए की वह केवल पढ़ाई में अपना 100% दें और अच्छी शिक्षा प्राप्त करें एग्जाम के मार्क्स तथा पास या फेल होना जीवन का एक हिस्सा है और इससे सीख लेकर आगे अच्छा करने का प्रयतन करना चाहिए.

3. रूचि के अनुसार आगे न बढ़ना: साथ ही यह भी देखा गया है कि कई बार छात्र अपने रूचि के अनुसार शैक्षिक करियर में आगे नहीं बढ़ पाते हैं जिस कारण उन्हें उनके अपेक्षा के अनुकूल सफलता न मिलने के कारण वह तनाव में आ जाते हैं. ऐसी परिस्तिथि में छात्रों को खुल कर अपनी रूचि अपने पेरेंट्स को समझाना चाहिए, भविष्य में उसके स्कोप्स कितने हैं इस बारे में उनसे चर्चा करनी चाहिए.

साथ ही साथ अभिभावकों को भी यह सलाह है कि वह अपने बच्चे की रूचि के अनुसार ही उनके शैक्षिक करियर को चुने, जिसमें उनका बच्चा अच्छी तरह आगे बढ़ सके.

4. पीयर प्रेशर: अक्सर किशोरावस्था में बच्चे अपने दोस्तों, सहपाठियों को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं. कभी-कभी यह सहकर्मी प्रभाव सकारात्मक होता है जिसमें एक बच्चा खेल से जुड़ी गतिविधियों में अधिक भाग लेने या पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित होता है क्योंकि उसके दोस्त ऐसा कर रहे होते हैं. लेकिन कभी कभी दोस्तों का गलत प्रभाव भी पड़ सकता है जिसकी वजह से बच्चे गलत चीजों का शिकार बन जाते हैं और अगर माता-पिता बच्चों पर ज़बरदस्ती करने की कोशिश करते हैं तो उसका उल्टा असर होता है और बच्चे आक्रामक हो जाते हैं या माता-पिता से अपनी बातें छुपाने लगते हैं. तथा जिस तरन वह तनाव में भी आ जाते हैं. अर्थात यदि आपको ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आपका सहकर्मी या मित्र आपको किसी ऐसे गतिविधियों के लिए प्रेरित कर रहा है जो आपके लिए बिलकुल सही नहीं तो बीना डरे आप अपने मित्र को ऐसी गतिविधियों के लिए मना करना सीखें. तथा साथ ही साथ अभिभावक भी अपने बच्चे को हमेशा यह विश्वास दिलाएँ की आप हमेशा उसके साथ हैं अर्थात आप उसे किसी भी परिस्थिति में आप अकेला नहीं छोड़ेंगे. ऐसा करने से वो अपनी बातों को आपसे नहीं छुपाएगा और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा.

निष्कर्ष: आशा है कि हमारे बताये हुए सुझाव छात्रों को शैक्षिक करियर में आगे बढ़ने में तथा उनके शैक्षिक तनाव को कम करने में मददगार साबित होंगे. छात्र अपनी शैक्षिक उपलब्धियों से खुद को मोटीवेट करें तथा शैक्षिक तनाव के जो नकारात्मक कारण हैं उनसे सीख लेकर खुद को अगली बार और अच्छा करने के लिए  प्रेरित कर आगे बढ़ें.

शुभकामनायें!!

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