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हौसले की सीख

Jul 16, 2018 19:28 IST
    FIFA World Cup Final: Morale can move Mountains
    FIFA World Cup Final: Morale can move Mountains

    अरुण श्रीवास्तव
    काउंसलर

    फीफा वल्र्ड कप में जिस टीम ने हर किसी को चौंकाया, वह निश्चित रूप से क्रोएशिया ही है। हालांकि इस टीम का फाइनल तक का सफर उतना आसान नहीं रहा। उसे नॉकआउट दौर के अपने सभी मुकाबलों में अतिरिक्त समय का सहारा लेना पड़ा। फीफा रैंकिंग में 20वें नंबर की यह टीम यहां तक पहुंची, तो सिर्फ इसीलिए कि उसके कोच ज्लांटिको डालिक से लेकर कप्तान लुका माड्रिक के साथ पूरी टीम ने हौसले का साथ कभी नहीं छोड़ा। जुनून और हौसले के साथ जीत किस तरह आसान हो जाती है, बता रहे हैं अरुण श्रीवास्तव...

    उसकी उम्र सिर्फ 27 साल है। कहा जा सकता है कि वह बाकी सभी सहभागियों में सबसे युवा (एक देश के रूप में) है। यही उसके हौसले का राज भी है। जी हां, यूरोप का छोटा-सा देश क्रोएशिया यूगोस्लाविया से 1991 में आजाद हुआ था। एड्रियाटिक सागर के किनारे महज 56 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाले इस देश की इकोनॉमी इंडस्ट्री, एग्रीकल्चर और टूरिज्म (दुनिया के 20 सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में शामिल) पर निर्भर है। 1950 में उरुग्वे के फाइनल खेलने के 68 साल बाद क्रोएशिया के रूप में कोई इतना छोटा देश विश्वकप के फाइनल में पहुंचा। दरअसल, इस युवा देश के हर खिलाड़ी में कुछ कर गुजरने का जज्बा था।

    जब इंग्लैंड को रुलाया

    दिग्गज टीमों के नॉकआउट राउंड से आगे न बढ़ पाने के बाद दुनियाभर की उम्मीदें इंग्लैंड पर टिकी थीं, जिसने इस विश्वकप की शुरुआत से ही दमदार खेल दिखाया था, पर सेमीफाइनल में क्रोएशिया से हारने के बाद इस टीम का सफर रोते हुए खत्म हुआ। इसके कोच गेरेथ साउथगेट बेहद चालाक रणनीतिकार माने जाते रहे, लेकिन क्रोएशिया के हौसले के आगे उनकी कोई रणनीति नहीं चली। बेशक 1990 के बाद पहली बार इंग्लिश टीम अंतिम चार में पहुंची थी, पर जैसा कि इसके कप्तान हैरी केन ने कहा, क्रोएशिया जैसी छोटी टीम से हार को हम लंबे समय तक नहीं भुला सकेंगे। जब आप काफी आगे तक पहुंच जाते हैं, तो ऐसी हार का दर्द कहीं अधिक होता है।

    कोच हुए अशांत

    जुनून और हौसले की राह में कोई बाधा आगे बढ़ने से नहीं रोक पाती। इस बात को साबित किया क्रोएशिया के कोच ज्लाटिको डालिक ने। आमतौर पर डालिक बेहद शांत दिखते हैं, लेकिन वे अपनी टीम के साथ  कुछ और ही सोच कर आए थे। इसका नमूना नाइजीरिया के खिलाफ पहले ही मैच में तब दिख गया था, जब स्थानापन्न बनने से इन्कार करने वाले अपनी टीम के खिलाड़ी नोकोला कालिनिक को टीम से बाहर करते हुए उन्होंने वापस स्वदेश भेज दिया था।

    छोटे देश का बड़ा कप्तान

    इस विश्वकप में जिसके सबसे ज्यादा चर्चे हुए, वे हैं क्रोएशिया के कप्तान लुका माड्रिक। 32 वर्षीय माड्रिक बचपन से ही युद्ध जैसे हालात में पले-बढ़े। शरणार्थी के रूप में ज्यादातर बचपन और किशोर जीवन बिताने के बावजूद उन्होंने फुटबॉलर बनने का जुनून कभी नहीं छोड़ा। शारीरिक रूप से कमजोर होने और इस वजह से कोच द्वारा फुटबॉल के लिए सक्षम न बताए जाने को शर्मीले लुका ने चुनौती के रूप में लिया और आखिर एक दिन खुद को सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर के रूप में स्थापित करके दिखा दिया। विश्वकप के रूप में दुनिया को अपनी और अपने देश की प्रतिभा दिखाने का मौका मिलते ही उन्होंने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में हर मुश्किल से मुकाबला करते हुए यहां तक का सफर किया और अपनी टीम को भी लगातार प्रेरित रखा।

    क्या हम भी सीखेंगे?

    हमारे देश में शहर से लेकर गांव तक हर जगह फुटबॉल खेली जाती है। एक समय पश्चिम बंगाल के मोहन बागान, मोहम्मडन स्पोर्टिंग और गोवा के चर्चिल ब्रदर्स के खेल का रोमांच छाया रहता था। डूरंड कप जैसे सबसे पुराने टूर्नामेंट भी हमारे यहां होते रहे हैं। स्कूल, कॉलेज, संस्थानों तक की फुटबॉल टीमें रही हैं। इस बार दस हजार भारतीय (दुनिया में किसी मुल्क से सबसे ज्यादा) टिकट खरीद कर रूस में आयोजित विश्वकप देखने गए थे, इससे देश में फुटबॉल के प्रति प्रेम किस कदर है, इसे समझा जा सकता है। इसके बावजूद हर फुटबॉल प्रेमी के मन में आज एक ही सवाल है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश होने के बावजूद हमारा देश इस विश्वकप में क्यों नहीं था? क्या हमारे यहां संसाधनों की कमी है या प्रोत्साहन की? या फिर खिलाड़ियों से लेकर सरकार और नियामकों की इच्छाशक्ति की? भारत में फुटबॉल के प्रति क्रेज को देखते हुए एक समय फीफा के पूर्व प्रमुख सैप ब्लैटर ने कहा था कि भारत फुटबॉल जगत का सोया हुआ शेर है। जब ब्लैटर को हमारे यहां फुटबॉल में इतनी संभावनाएं दिख गई थीं, तो फुटबॉल के नियामकों को क्यों नहीं दिखती। आखिर वे किस बात का इंतजार कर रहे हैं? आखिर यह शेर किस तरह और कब जागेगा?

    जब जागी थीं उम्मीदें

    अभी ज्यादा दिन नहीं हुए। पिछले ही साल जब भारत में अंडर-17 वल्र्ड कप आयोजित हुआ था, तो उसके एक साल पहले से माहौल बनना शुरू हो गया था। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फुटबॉल में रुचि लेने और इसमें आगे आने के लिए देशभर का आह्वान किया था। सरकार के खुलकर आगे आने से लगा था कि शायद देश में फुटबॉल की तकदीर भी बदलेगी और यह क्रिकेट को टक्कर देता नजर आएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सबकुछ पहले जैसा, कहा जाए तो पहले से भी बदतर हो गया। आखिर यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जहां क्रिकेट का वनडे या टी-20 मैच होने पर मैदानों में तिल रखने की जगह नहीं होती, वहीं देश की फुटबॉल टीम के कप्तान को दर्शकों से मैच देखने मैदान में आने की अपील करनी पड़े।

    बेशक इंडियन सुपर लीग से देश में फुटबॉल का काफी प्रचार हुआ है, लेकिन देश में फुटबॉल को आगे बढ़ाने और विश्वस्तर पर पहचान दिलाने के लिए सरकार और संबंधित संस्थानों द्वारा सच्चे मन से काफी कुछ किया जाना बाकी है। हमें सिर्फ इस बात से संतोष नहीं कर लेना चाहिए कि 2014 में तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी टीम की रैंकिंग जहां 170वीं थी, वह आज 97 हो गई है। हमें यह भी देखना चाहिए कि आज सिर्फ क्रोएशिया ही नहीं, महज साढ़े तीन लाख की आबादी वाले आइसलैंड ने भी न सिर्फ विश्वकप खेलने के लिए क्वालिफाई किया, बल्कि अर्जेंटीना जैसी धाकड़ और पूर्व विश्व चैंपियन टीम को भी 1-1 की बराबरी पर रोककर सबको चौंका दिया था।

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