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IIMs से MBA : टीचिंग पेडागॉजी | एमबीए के बाद लाइफ

आईआईएम से एमबीए करना कई लोगों का सपना होता है, लेकिन शायद ही किसी को पता होता है कि एमबीए करते समय या एमबीए करने के बाद उन्हें किन किन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है ? यदि आप जानना चाहते हैं कि भारत के टॉप एमबीए कॉलेजों में शामिल होने के बाद आप क्या सीखेंगे? तो आइए इसे प्रोफेसर अनिन्द्य सेन द्वारा जानते हैं.

Nov 16, 2018 19:10 IST

आईआईएम से एमबीए करना कई लोगों का सपना होता है, लेकिन शायद ही किसी को पता होता है कि एमबीए करते समय या एमबीए करने के बाद उन्हें किन किन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, किन स्किल सेट्स का विकास अपने अन्दर करना पड़ता है ? हर किसी को यह जानने की जिज्ञाषा होती है कि भारत के टॉप एमबीए कॉलेजों में शामिल होने के बाद हम क्या सीखेंगे  और सीखने की प्रक्रिया तथा स्टडी पैटर्न क्या होगा ? आइए इस बारे में आईआईएम कलकत्ता के प्रोफेसर अनिन्द्य सेन से जानते हैं.

इन्टरव्यू का सारांश

आईआईएम में टीचिंग पेडागॉजी 

जब छात्र बी-स्कूल आते हैं, तो वे कुछ उम्मीदों और विचारों तथा सपनों के साथ आते हैं. उनके मन में यह जिज्ञाषा होती है कि आईआईएम कलकत्ता जैसे टॉप बी स्कूल में उन्हें क्या सिखाया जायेगा ? जिन्दगी के किस हुनर में उन्हें प्रवीणता हासिल होगी ? लेकिन, यहां ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात यह है कि  विभिन्न बी-स्कूलों में मैनेजमेंट एजुकेशन प्रदान करने के विभिन्न संस्कृति और विभिन्न तरीके हैं. इसलिए, विभिन्न बी-स्कूलों में शिक्षण, अध्यापन और सीखने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है.

अगर 3 या 4 दशकों के मुकाबले हम आज के परिदृश्य में मैनेजमेंट एजुकेशन को देखें तो पाते हैं कि इस क्षेत्र में क्रन्तिकारी परिवर्तन हुए हैं.

60 और 70 के दशक में  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के लिए बड़े पैमाने पर मैनेजर्स को तैयार किया गया था. निश्चित रूप से उस समय कुछ निजी क्षेत्र के बिजनेस भी थे, लेकिन वे बड़े पैमाने पर फेमिली बिजनेस वाली संस्थाएं हीं थीं. उस समय स्किल्ड प्रोफेशनल मैनेजर्स की मांग बहुत कम थी. लेकिन उस समय की तुलना में आजकल मैनेजमेंट एजुकेशन का परिदृश्य काफी बदल गया है. आज, ज्यादातर कंपनियां चाहे वो सार्वजनिक क्षेत्र की हों या निजी क्षेत्र की, ऐसे प्रोफेशनल मैनेजर्स की तलाश में रहती हैं जो उनकी कंपनी या संस्था के ग्रोथ में सहायक हो.

आईआईएम-कलकत्ता जैसे बी स्कूल्स द्वारा उम्मीदवार को स्किल्ड बनाने की तकनीक दो बातों पर निर्भर करती है.

  • बाजार / अर्थव्यवस्था की गतिशील प्रकृति
  • बाजार में प्रचलित कठिन प्रतियोगिता

ये दो कारक बी-स्कूल को उनके छात्रों और उनके द्वारा अनुसरण किए जाने वाले टीचिंग पेडागॉजी,स्किल्स को संशोधित करने, सुधारने और पुन: पेश करने के लिए मजबूर करते हैं. एक मैनेजमेंट ग्रेजुएट्स अथवा मैनेजमेंट स्टूडेंट्स अपने पिछले लॉरल्स के आधार पर राहत महसूस नहीं कर सकते हैं. उन्हें इन्नोवेशन और प्रेजेंस ऑफ माइंड जैसे दो महत्वपूर्ण स्किल्स की जानकारी बी स्कूल्स द्वारा प्रदान की जाती है.

सीधे शब्दों में कहें तो  बी-स्कूल न केवल कुछ विशिष्ट कौशल हासिल करने में छात्रों की मदद करते हैं बल्कि इसकी  बजाय वे उन्हें सही टूल देते हैं जो विभिन्न परिस्थितियों में किसी भी समस्या को हल करते समय अप्लाई किये जा सकते हैं. अगर इसे दूसरे शब्दों में कहें तो उन्हें पुनः किसी चीज के अविष्कार के वनिस्पत उपलब्ध सामग्री का अपने प्रोफेशनल जीवन में सही और समुचित उपयोग करने की टेक्निक सीखनी होती है. उदाहरण के लिए उन्हें पहिया बनाने की नहीं बल्कि इसका उपयोग अपने प्रोफेशनल  जीवन में आने वाली समस्याओं को हल करने के लिए सर्वोत्तम संभव तरीके से करने की कला जानना होता है.

इसी तरह बी-स्कूल विशेष विषयों या स्किल्स को पढ़ाने पर जोर नहीं देते हैं. वे मैनेजमेंट छात्रों को व्यापारिक दुनिया में नवीनतम और आने वाले रुझानों का ट्रैक रखने में मदद करते हैं और इन नए और आगामी रुझानों के प्रभाव और समस्याओं को समझने में उनकी सहायता करते हैं. उदाहरण के लिए, यह एक सामान्य ज्ञान है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जेनेटिक्स जैसे नए डोमेन के उद्भव में हम जिस दुनिया में रहते हैं उसे बदलने की क्षमता है. लेकिन इस तथ्य को जानने के अलावा, एक बिजनेस मैनेजर के लिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या जेनेटिक्स क्यों निकट भविष्य में एक बड़ी बात होगी और इन नए डोमेन के संभावित अनुप्रयोग क्या हैं ?

इसलिए, आईआईएम कलकत्ता जैसे बी-स्कूलों ने अपनी टीचिंग पेडागॉजी में मुख्य रूप से दो बातों को अपनाया है -

  • उनका प्राइम फोकस ऐसे सिद्धांत, बुनियादी विचार और अवधारणाएं जो विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाने वाले शिक्षण प्रारूप के साथ तारतम्य रखते हैं,पर होता है.
  • केस स्टडीज और टूल के अनुप्रयोग आधारित उपयोग पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं. उनका यह दृष्टिकोण वैश्विक स्तर पर बी-स्कूल की सीखने की प्रक्रिया से अधिक जुड़ा हुआ है.

बी स्कूल्स की टीचिंग पेडागॉजी में इन दो दृष्टिकोणों का बहुत महत्व होता है तथा यह उनके सिखाने तथा छात्रों के सीखने की प्रक्रिया को और सम्पूर्ण बनाता है.

एक्सपर्ट के बारे में

प्रोफेसर अनिन्द्य सेन आईआईएम कलकत्ता के इकोनोमिक्स ग्रुप के फैकल्टी हैं. इसके अतिरिक्त उन्होंने आईआईएम कलकत्ता में एकेडमिक एंड डीन – प्रोग्राम इनिसिएटिव का कार्य भार भी संभाला है. वे आईआईएम कलकत्ता में फैकल्टी प्रतिनिधि के रूप में गवर्नर बोर्ड के सदस्य भी रहे हैं. आईआईएम कलकत्ता के अलावा, वह पिछले ढाई साल से आईआईएम रांची से निदेशक प्रभारी के रूप में भी जुड़े हुए हैं.

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