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बैंकिंग क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं का अनुपात कम क्यों है?

Oct 4, 2018 11:49 IST
    Ratio of women working in Indian Banking Industry
    Ratio of women working in Indian Banking Industry

    हाल ही में किये गये सर्वेक्षण में सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के बैंकों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की सही तस्वीर सामने आई है। सर्वेक्षण के अनुसार महिलाएं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में काम करने वाले कुल कर्मचारियों की संख्या का केवल 3 प्रतिशत ही बनाती हैं और उनमें से ज्यादातर महिलाएं क्लेरिकल कैडर में जॉब कर रही है। हालांकि निजी बैंकों के मामले में यह तस्वीर थोड़ी संतोषजनक है। लेकिन समग्र परिदृश्य में अरुंधति भट्टाचार्य, चंदा कोचर, उषा अनंतसुब्रमण्यम, शिखा शर्मा जैसी कुछ ही महिलाएं बैंकिंग इंडस्ट्री में शीर्ष पर पहुची है। लेकिन यह गौर करने वाली बात है की भारत में महिला बैंकर की संख्या इतनी कम क्यों हैं? आइये हम इसके संभावित कारणों पर विचार करे।

    बैंकिंग क्षेत्र में महिलाएं कम क्यों हैं?

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    हालांकि हाल के दिनों में हमने कुछ महिलओं को  देश के विभिन्न सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, अमेरिकी फेडरल रिजर्व जैसे संस्थानों के शीर्ष पर देखा है। लेकिन समग्र परिदृश्य में महिलाओं की स्थिति बहुत उज्जवल नहीं है। इसके कई कारण हैं और यहाँ हम कुछ संभावित कारणों को सूचीबद्ध करने की कोशिश करेंगे:

    बैंकों की निराशाजनक मानव संसाधन नीति: यह विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बारे में सच है क्योंकि एचआर विभाग कर्मचारी कल्याण  की उचित नीतियों को लागू करने में न तो अनुभवी और न ही प्रभावी है। एचआर विभाग महिलओं के स्थानान्तरण पालिसी को लेकर ज्यादा सजग नहीं है। यह विशेष रूप से महिला अधिकारियों और क्लर्कों के लिए बहुत बड़ी समस्या है। नियम होने के बावजूद, ज्यादातर मामलों में महिलओं को अपने परिवार या पति के साथ पोस्टिंग नहीं मिलती या बहुत दिक्कत से मिलती है। इस वजह से कई महिलओं को जॉब जारी रखने में दिक्कत आती है।

    महिलाओं की समस्याओं के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं: बैंक विशेष रूप से महिलाओं की समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। महिलओं को पारिवारिक जीवन और काम के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। हलाकि कुछ बैंक जैसे एसबीआई और आईसीआईसीआई ने महिलओं के लिए वर्क फ्रॉम जैसे सुविधाए शुरू की है।

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    अव्यवस्थित हस्तांतरण नीति: बैंक नौकरियों का यह एक नकारात्मक पहलू है। आप यह नहीं जानते हैं कि आप कब और कहा स्थानांतरित होने वाले है। आपका अक्सर स्थानान्तरण कर दिया जाता है  खासकर यदि आप एक अधिकारी के रूप में काम कर रहे हैं इससे महिला कर्मचारियों के लिए संतुलन बनाना कठिन हो जाता है क्योंकि उन्हें नौकरी से अलग कई अन्य चीजों का ध्यान भी रखना होता है। कई बार महिलओं को  अच्छे पारिवारिक जीवन के लिए पदोन्नति के अवसर छोड़ने पड़ते है।

    फ्लेक्सिबल काम के घंटे और घर से काम करने के लिए कोई विकल्प नहीं: प्रतिभा को बनाए रखने और उन्मूलन को रोकने के लिए बैंकों के लिए यह एक अच्छा विकल्प है। बैंक को इस तरह की नीतियों को कार्यान्वित करने में लचीला होना चाहिए।

    हालाकि सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंकों अब महिलाओं के सामने आने वाले विभिन्न मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं और भविष्य में प्रतिभा को बनाए रखने के लिए नीतियों को लागू कर रहे हैं। शायद इसका ही परिणाम है जो अरुंधति भट्टाचार्य, चंदा कोचर, शिखा शर्मा, उषा अनंतसुब्रमण्यम, उषा थोराट,  श्यामला गोपीनाथ जैसे दिग्गज महिला बैंकर ने भारत में नहीं बल्कि विश्व में बैंकिंग इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनायीं है। उम्मीद की जाती है कि ये दिग्गज महिला बैंकरस बैंकिंग में काम करने वाली महिलओं की देखभाल करेगी जिससे आगे भी महिलाये बैंकिंग इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सक्षम हो । इसका  सबसे अच्छा उदहारण आईसीआईसीआई बैंक है, श्रीमती चंदा कोच्हर  की अगुवाई में बैंक में महिलओं को घर से काम करने  का विकल्प देने की नीति लागू कर दी है इस तरह  एसबीआई ने श्रीमती भट्टाचार्य के निर्देशानुसार  महिला कर्मचारियों को बच्चों की शिक्षा और अपने इन-लास की देखभाल के लिए दो साल की छुट्टी देने को घोषणा की है। तस्वीर बदल रही है और युवा पीढ़ी को इस तथ्य को समझने की जरूरत है कि बैंकिंग केवल पुरुष डोमेन नहीं है और नजदीकी भविष्य में, यह महिला कर्मचारियों को  अधिक से अधिक अवसर प्रदान करेगा। यह उम्मीद की जा सकती है महिला कर्मचारियों के लिए नयी  एचआर पॉलिसी निश्चित रूप से बैंक नियमो की की किताबों में जल्द ही अपना जगह बना लेगी।

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