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The Hindu in Hindi: भारत में ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली

IAS उम्मीदवारों को IAS परीक्षा के लिए उस विषय का अध्ययन करना चाहिए जो देश के जन-नागरिकों को प्रभावित करता है। सरकार देश में कमजोर ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली पर अवश्य ध्यान देना चाहिए और यह टॉपिक IAS की तैयारी के दौरान IAS उम्मीदवारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

Sep 12, 2017 18:14 IST
The Hindu for IAS Exam: Rural Health System in India

इस लेख में हमने ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था के वर्तमान परिदृश्य का विश्लेषण किया है। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य के विभिन्न संकेतकों पर कैसे कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली का बड़ा प्रभाव पड़ता है, आईएएस परीक्षा के लिए ऐसे विषय बहुत महत्वपूर्ण है और इसे IAS मुख्य परीक्षा से पहले अवश्य कवर किया जाना चाहिए।

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गोरखपुर में बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज की हालिया घटना ने भारत की ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोर व्यवस्था का खुलासा किया है। गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज जिसमें 70 से ज्यादा बच्चे केवल 3 से 4 दिनों के कम समय में अकास्मिक मृत्यु के उपरांत स्पॉटलाइट में आया । यह घटना केवल गोरखपुर के स्वास्थ्य प्रणाली की स्थिति के बारे में नहीं बताती है बल्कि यह आसपास के कई जिलों और यहां तक कि पड़ोसी राज्यों में कमजोर चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति को भी निर्दिष्ट करती है जहां बड़ी संख्या में आम लोगों के लिए अंतिम उपाय के रुप में बीमार मरीजों को ऐसी उच्चतम अस्पतालों में भेजा जाता है।

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भारत की सर्वोच्च लेखापरीक्षा संस्था, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने वर्ष 2016 मार्च में समाप्त हुए के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रजनन और बाल स्वास्थ्य पर अपनी रिपोर्ट में देश के चिकित्सा स्वास्थ्य प्रणाली के कई बेकार पहलूओं के बारे में कहा है। भले ही वित्तीय प्रशासन पर लेखापरीक्षा के आपत्तियों को नजरअंदाज किया जाए लेकिन कई राज्यों में आवंटित धन को अवशोषित न कर पाने की असमर्थता, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में कर्मचारियों की कमी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और जिला अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की कमी, टूटी-फूटी उपकरण और रिक्त डॉक्टर की रिक्तियों की तस्वीर उभर कर आई है।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रजनन और बाल स्वास्थ्य (आरसीएच) पर कैग (CAG) की रिपोर्ट

वित्तीय प्रबंधन: रिपोर्ट आरसीएच कार्यक्रम के असंतोषजनक वित्तीय प्रबंधन को निर्दिष्ट करती है जिसके तहत हर साल राज्य स्वास्थ्य सोसायटी के समक्ष अव्ययित शेष राशि होती है। 27 राज्यों में वर्ष 2011-12 में न खर्च की गई राशि 7,375 करोड़ रुपये से बढ़कर 2015-16 में 9,550 करोड़ रुपये हो गई।

भौतिक बुनियादी ढांचे: 28 राज्यों/संघ शासित प्रदेशों में उप-केंद्र (एससी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की उपलब्धता में लगभग 24% -38% की कमी देखी गई है। पांच राज्यों (बिहार, झारखंड, सिक्किम, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल) में यह कमी 50% से अधिक थी।

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मानव संसाधन की उपलब्धता: लगभग सभी चयनित सुविधाओं में डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी देखी गई है। 27 राज्यों के चयनित सीएचसी में विशेषज्ञों की औसत कमी 77% - 87% के बीच थी। इसके अलावा अपेक्षित 2,360 के एवज में केवल 1,303 नर्स तैनात किए गए थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ राज्यों में चिकित्सकीय उपकरणों का उपयोग डॉक्टरों की अनुपलब्धता और जनशक्ति की कमी की वजह से नहीं हो पायी है। कैग ने सिफारिश की है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों की स्वीकृत पदों को भरने के लिए राज्यों के साथ मिलकर काम करना चाहिए।

चिकित्सा उपकरणों और दवाइयों की उपलब्धता: रिपोर्ट में इस बात पर भी ध्यान दिया गया है कि 29 राज्यों/संघ शासित प्रदेशों में चयनित स्वास्थ्य सुविधाओं में आरसीएच सेवाओं जैसे कि श्रमिक तालिकाओं, सामान्य डिलीवरी किट, आपातकालीन प्रसूति देखभाल उपकरण और एक्स-रे की सुविधा के लिए आवश्यक मूल उपकरण नहीं हैं। 8 राज्यों में आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं थीं इसके अलावा 14 राज्यों में उनके निर्धारित गुणवत्ता जांच सुनिश्चित किए बिना रोगियों को दवाएं जारी की जा रही थीं।

स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता: देश भर में जिला अस्पताल, सीएचसी और पीएचसी में देखभाल की गुणवत्ता में सुधार के लिए 2013 में राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन कार्यक्रम (एनक्यूएपी) स्थापित किया गया था। लेखापरीक्षा परिणाम बताता हैं कि एनक्यूएपी के कार्यान्वयन के लिए संस्थागत रूपरेखा या तो लागू हीं नहीं थीं या प्रभावी नहीं थीं। इसके अलावा रिपोर्ट ने स्वास्थ्य सुविधाओं के आंतरिक और बाह्य मूल्यांकनों की कमी संख्या, अपर्याप्त रिपोर्टिंग और मुख्य निष्पादन संकेतकों का मूल्यांकन नहीं किया।

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प्रजनन और बाल स्वास्थ्य सेवाओं और परिणाम: जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) गरीब गर्भवती महिलाओं के बीच संस्थागत वितरण को बढ़ावा देने के लिए एक सुरक्षित मातृत्व हस्तक्षेप है। कैग ने प्रोत्साहन राशि का भुगतान न करने या लाभार्थियों को देरी से भुगतान के संदर्भ में जेएसवाई के कार्यान्वयन में कमियों की जानकारी दी थी।

सरकार ने एक उन्नत ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली के लिए मॉडल को अंतिम रूप दे दिया है और वर्ष 2007 और 2012 में भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों को जारी किया था जिसमें स्वास्थ्य उप-केंद्रों की सुविधा शामिल है। सरकार ने वर्ष 2020 तक के लिए महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य लक्ष्यों की स्थापना की है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत विभिन्न लक्ष्यों के लिए वित्तीय परिव्यय को तय करने की प्रक्रिया शामिल है जिनमें शिशु मृत्यु दर हाल के अनुमान 40 की तुलना में कमी के साथ प्रति 1,000 जीवित जन्मों के लिए 30। 2020 तक इस तरह के स्वास्थ्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सरकार को निरंतर निवेश और निगरानी की आवश्यकता होती है और यह सुनिश्चित करना है कि 3 किलोमीटर की त्रिज्या के भीतर आवश्यक चिकित्सा और नर्सिंग संसाधनों के साथ स्वास्थ्य सुविधा के लिए निर्धारित मानक प्राथमिकता से हासिल किया जा रहा है।

राज्यों में संक्रामक बीमारियों को फैलने से रोकने के अलावा इसके खेदजनक शिशु और मातृ प्रसूता मृत्यु दर में तेजी से कमी लाने के लिए देश में प्रजनन और बाल स्वास्थ्य देखभाल को स्केल करने के लिए सरकार से इस तरह की प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण है। बाजार-आधारित तंत्र की परिसीमनों की पहचान करना सरकार के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि नीति आयोग ने 2020 के लिए अपने एक्शन एजेंडे में स्वास्थ्य जैसे शुद्ध सार्वजनिक लाभ प्रदान करने को बताया है। हमें लागत नियंत्रण के साथ एक एकल भुगतानकर्ता प्रणाली में जाने की जरूरत है जो कि निजी और सार्वजनिक सुविधाओं से स्वास्थ्य देखभाल की एक कुशल सामरिक खरीद को संभव बनाता है। ग्रामीण स्वास्थ्य के लिए डॉक्टरों, निदान और दवाओं तक पहुंच में इक्विटी लाना राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए प्राथमिकता होना चाहिए।

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