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Super 30 के फाउंडर श्री आनंद कुमार की ज़बानी: क्यों नहीं होना चाहिए असफलता के बाद भी निराश

आज हम इस लेख में आपको बताएंगे कि श्री आनंद कुमार को Super 30 को शुरू करने में कौन-कौन सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अंततः Super 30 की सफलता की नीवं रखी

Mar 6, 2018 16:52 IST
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super 30
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जो भी विद्यार्थी IIT JEE की तैयारी के बारे में सोचते हैं, उनके दिमाग़ में सबसे पहले जो नाम आता है वह है Super 30. कोई भी व्यक्ति Super 30 की सफलता से अनजान नहीं है. प्रत्येक वर्ष यहाँ के 30 विद्यार्थियों में से लगभग 95 प्रतिशत विद्यार्थी IIT JEE की परीक्षा को क्रैक करने में सफल होते हैं.

Super 30 में विद्यार्थियों को IIT JEE की परीक्षा में आने वाले सभी विषयों (Physics, Chemistry और Mathematics) को मुफ्त में पढ़ाया जाता है. यहाँ विद्यार्थियों का रहना और खाना भी बिलकुल फ्री होता है.

आज हम इस लेख में आपको बताएंगे कि श्री आनंद कुमार को Super 30 को शुरू करने में कौन-कौन सी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, किंतु उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अंततः Super 30 की सफलता की नीवं रखी. इस विडियो में हम यह भी जानेंगे कि Super 30 का नाम कैसे पड़ा.

हम सभी जानते है कि किसी भी अच्छे काम की शुरुआत करने में थोड़ा समय ज़रूर लगता है, किंतु जब कोई व्यक्ति उस काम को करने में कड़ी मेहनत करता है, तो सफलता निश्चित ही उसके कदम चूमती है.

इस विडियो के माध्यम से हम जानेंगे कि कैसे किसी व्यक्ति को अपने सपने को पूरा करने के लिए कभी भी हार नहीं माननी चाहिए. बात उस समय कि है जब प्रोफेसर आनंद कुमार (बिहार के प्रसिद्ध गणितज्ञ हैं)के कुछ रिसर्च पेपर्स और आर्टिकल विदेश में प्रकाशित होने के बाद इंग्लैंड के प्रसिद्ध विश्विद्यालय Cambridge University ने उनको पढ़ने के लिए बुलाया था. परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण आनंद कुमार नहीं जा सके. उनके पिता एक डाकघर में क्लर्क की पोस्ट पर काम करते थे.

इस वीडियो में आनंद कुमार ने अपने कॉलेज में हुए पुस्तक विलोचन में आये राजनीतिज्ञ से सहायता मांगने की घटना का भी जिक्र किया है. उन्होंने यह भी बताया कि उनको 1 अक्टूबर, 1994 को Cambridge University को जॉइन करना था, किंतु 23 अगस्त,1994 को हार्ट अटैक के कारण उनके पिता की अकस्मात मृत्यु हो गयी. जिससे आनंद कुमार और उनका परिवार पूरी तरह टूट गया. इसके बाद आनंद कुमार को अनुकम्पा के आधार पर अपने पिता जी की नौकरी भी मिल सकती थी, किंतु उनकी माता जी ने उनको कहा कि अगर आनंद कुमार नौकरी नहीं करना चाहते तो नहीं करें और अपना ध्यान पढ़ाई पर दें.

आर्थिक तंगी के कारण उनकी मां आजीविका के लिए घर में पापड़ बनाती थी और आनंद तथा उनके भाई साइकिल चलाकर घर-घर जाकर पापड़ बेचने लगे. इसी समय आनंद कुमार ने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने की सोची. उन्होंने घर में ही ‘रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमेटिक्स’ नाम से कोचिंग शुरू किया. शुरुआत में केवल दो ही विद्यार्थी कोचिंग में आए. इस दौरान वह छात्रों से 500 रुपये फीस लेते थे. लेकिन एक दिन उनके पास एक ऐसा छात्र आया, जो ट्यूशन तो पढ़ना चाहता है लेकिन वह आर्थिक रूप से कमज़ोर था. यह बात आनंद कुमार  के दिल को छू गई और उन्होंने उसे निःशुल्क ही पढ़ाना स्वीकार कर लिया और वह छात्र आईआईटी की प्रवेश परीक्षा (IIT JEE) में सफल हुआ.

इस प्रकार दिन प्रतिदिन बच्चों की संख्या बढ़ती रही और पहली बार जब उनके द्वारा पढ़ाये हुए बच्चों में 22 छात्रों ने IIT JEE की परीक्षा को क्रैक कर लिया तब सभी ने बोला कि Super 30 में से 22 विद्यार्थियों ने  IIT JEE की परीक्षा को क्रैक कर लिए. इस प्रकार उनके द्वारा चलाए गए इंस्टिट्यूट का नाम Super 30 पड़ा.

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