बदलाव की बयार!

Aug 6, 2018 17:08 IST
    Why Academic Syllabus must change with time?
    Why Academic Syllabus must change with time?

    तकनीक की वजह से दुनिया और देश में तेज गति से होने वाले बदलावों को हम सब देखने, सुनने के अलावा खुद महसूस भी कर रहे हैं। इस बदलाव के साथ स्कूलों-कॉलेजों-विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को भी बदलने की लगातार जरूरत महसूस की जा रही है। देर से ही सही, बदलाव के कुछ प्रयास आरंभ तो हुए हैं, लेकिन इस दिशा में अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। आखिर क्यों जरूरी है बदलते जमाने के हिसाब से सिलेबस में बदलाव लाना, बता रहे हैं अरुण श्रीवास्तव...

    हाल में दक्षिण अफ्रीका की राजधानी जोहानिसबर्ग में ब्रिक्स देशों के दसवें शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं के लिए रोजगार की चुनौतियों और अवसरों का मुद्दा उठाते हुए इस बात पर खास जोर दिया कि हमें अपने स्कूलों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को ऐसा बनाना होगा, जिससे युवाओं को भविष्य के लिए तैयार किया जा सके। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक में तेजी से हो रहे बदलावों के अनुरूप ही पाठ्यक्रम भी अपडेट होते रहें। हाल के वर्षों में रोजगार उपलब्धता को लेकर लगातार उठने वाले तीखे सवालों के मद्देनजर प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य बेहद महत्वपूर्ण है।

    सक्रियता बढ़ाने की जरूरत

    सरकार की तरफ से लगातार बढ़ रहे दबावों की वजह से विभिन्न शिक्षा नियामक संस्थानों (एआइसीटीई, एमसीआइ, यूजीसी आदि) ने दशकों से चले आ रहे प्रोफेशनल कोर्सों के सिलेबस को बदलने की प्रक्रिया तो आरंभ की है, लेकिन जिस तेजी से तकनीक में बदलाव आ रहा है, उस स्तर तक पहुंचने और बदलाव की यह प्रक्रिया सतत बनाए रखने के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इसके लिए सबसे पहले नियामक संस्थानों को अपनी सक्रियता बढ़ाने और दुनियाभर में हो रहे बदलावों पर सचेत नजर रखते हुए उसके मुताबिक सिलेबस तैयार करने/कराने की जरूरत है। इस बारे में उद्योग जगत के विशेषज्ञों से नियमित सलाह-मशविरा करने और उन्हें पाठ्यक्रम बदलाव समिति में शामिल करने की भी जरूरत है। एक बार पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिए जाने के बाद ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि फिर सालों तक उसे ही चलते रहने दिया जाए। दरअसल, तकनीक की वजह से तेजी से हो रहे बदलाव के दौर में अब किसी भी पाठ्यक्रम को सालों-साल चलाते रहने का कोई औचित्य नहीं है। कुछ प्राथमिक और बुनियादी बातों को यथावत रखते हुए अधिकतर पाठ्यक्रमों को अब नियमित समयांतराल पर बदलते रहने की जरूरत है। इस बारे में एक स्थायी पाठ्यक्रम बदलाव निगरानी समिति भी बनाने की जरूरत महसूस हो रही है, जो अप्रासंगिक/अनुपयोगी पाठ्यक्रम के हिस्से को यथासमय हटाकर उसकी जगह नई, उपयोगी और प्रासंगिक चीजों को शामिल करा सके।

    तभी रहेंगे आगे

    हाल में फ्रांस को पछाड़कर भारत दुनिया की छठीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बना। हालांकि इसे लेकर आत्ममुग्ध होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दुनिया की इस सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती अपनी इस युवाशक्ति को रोजगार के लिए सक्षम बनाना है। इस बात को महसूस करते हुए सरकार ने बेशक कौशल विकास योजना के तहत शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए तमाम तरह की योजनाएं चलाई हैं, लेकिन अभी ये ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ ही साबित हो रही हैं। इसके अलावा, समुचित निगरानी न होने के कारण तमाम योजनाएं अनियमितता और भ्रष्टाचार की भेंट भी चढ़ जा रही हैं। इससे कागजों पर तो सरकार के पास लाखों की संख्या में ‘स्किल्ड’ बना दिए जाने के आंकड़े पहुंच जा रहे हैं, जिसे वह संसद में पेश कर अपनी पीठ खुद ठोंक कर खुश हो सकती है, लेकिन वास्तव में इसकी जमीनी हकीकत उतनी खुश करने वाली नहीं है। यह ज्यादातर अधिकारियों-कर्मचारियों की कथित करतूत का नतीजा ही है, जो सरकारों की मंशा को भी पलीता लगा रहा है। इस वजह से भी न तो पर्याप्त संख्या में युवाओं को स्किल्ड बनाया जा पा रहा है और न ही उन्हें नौकरी मिल पा रही है।

    पॉलिटेक्निक-आइटीआइ को भी बनाएं जरिया

    कौशल विकास के लिए सिर्फ पैसा बनाने वाले फ्रेंचाइजी पर निर्भर रहने की बजाय इसके लिए लगभग हर जिले में स्थित आइटीआइ और पॉलिटेक्निक भी जरिया बनाया जाना चाहिए। बेशक कुछ केंद्रीय और राजकीय विद्यालयों की तरह इन्हें भी दो पारी में किया जा सकता है। एक पारी में रेगुलर कोर्स चलें और दूसरी पारी में सिर्फ कौशल विकास के शॉर्ट-टर्म कोर्स, जिसमें आठवीं-दसवीं पास युवाओं को बिना अधिक कागजी खानापूरी के स्किल ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। ऐसा होने पर केंद्र/राज्य सरकारों को बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी हैरान-परेशान नहीं होना पड़ेगा, क्योंकि परिसर और लैब के रूप में यह पहले से होगा। हां, उन्हें और उन्नत बनाने की दिशा में कोशिशें की जा सकती हैं। ऐसे संस्थानों से इंडस्ट्री के समर्पित प्रोफेशनल्स को भी जरूर जोड़ा जाना चाहिए। तभी सही मायने में युवाशक्ति को सही रोजगार की दिशा में आगे बढ़ाकर देश को भी मजबूत किया जा सकेगा।

    सोच हो सही

    दरअसल, अब जितना जरूरी पाठ्यक्रम में बदलाव लाना और वक्त के साथ लचीला बने रहना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसे व्यावहारिक रूप से पूरी तरह अमल में लाना भी है। इसके लिए शैक्षणिक संस्थानों, स्किल ट्रेनिंग सेंटर्स के संचालकों के अलावा उनकी सतत निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। अगर कहीं किसी को लापरवाही, उदासीनता या पारदर्शिता में कमी का दोषी पाया जाए, तो उसके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई से भी परहेज नहीं किया जाना चाहिए। आखिर यह देश के कर्णधारों के भविष्य से खिलवाड़ करने का मामला जो है। यह भी तो एक तरह का भ्रष्टाचार और देशद्रोह ही तो है, जो वे अपने देश और समाज को नुकसान पहुंचाकर कर रहे हैं।

    गड़बड़ी की जड़

    अगर कौशल विकास योजनाओं की बात की जाए, तो ज्यादातर योजनाएं फ्रेंचाइजी मॉडल पर चल रही हैं। विभिन्न ट्रेड्स में स्किल ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाने की जिम्मेदारी स्थानीय निजी इंस्टीट्यूट संचालकों को दे दी गई है। आमतौर पर इनमें से अधिकतर संस्थान सरकारी अधिकारियों से मिलीभगत करके और फर्जी पंजीकरण दिखाकर सरकार से मिलने वाले धन की बंदरबांट कर लेते हैं। बेशक कुछ संस्थान ईमानदारी से काम कर रहे हैं, पर अधिकतर संस्थानों की हालत कमोबेश यही है। समुचित निगरानी और कार्रवाई न होने की वजह से ही इन योजनाओं का अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहा। इसके विपरीत सरकार तक भी फर्जी आंकड़े पहुंचाने की बाजीगरी की जा रही है। अगर कौशल विकास की इन योजनाओं पर ईमानदारी के साथ अमल हो रहा होता, तो निश्चित रूप से देश के लगभग हर जिले में संचालित इन केंद्रों के जरिए करोड़ों युवाओं को स्किल्ड बनाया जा चुका होता, जिसकी बदौलत उन्हें सरकारी या निजी क्षेत्र के उद्योगों में आसानी से नौकरी मिल गई होती। ऐसी स्थिति में रोजगार के सवाल पर विपक्ष द्वारा सरकार को घेरने की नौबत नहीं आती।

    भ्रष्टाचार पर वार

    सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। रोजगार के क्षेत्र में इसका एक बड़ा नमूना हर जिले में स्थापित एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज यानी जिला सेवायोजन केंद्र भी हैं। जरा याद करें। आप में से कितने लोगों को इन केंद्रों के जरिए नौकरी पाने में मदद मिली है। आज भी स्थिति में कोई खास सुधार आया नहीं दिखता है। बिना जवाबदेही तय किए ऐसे संस्थानों से परिणाम की उम्मीद करना बेमानी है।

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