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कंपनी अधिग्रहण संबंधी नियमों में परिवर्तन हेतु अच्युतन समिति की सिफारिश पेश

Sep 9, 2010 18:47 IST
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कंपनी अधिग्रहण संबंधी नियमों में परिवर्तन पर गठित बाजार नियामक सेबी (SEBI – Securities and Exchange Board of India – भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) की टेकओवर रेगुलेशंस एडवाइजरी समिति (टीआरएसी) के अध्यक्ष सी. अच्युतन ने 19 जुलाई 2010 को अपनी रिपोर्ट सेबी के चेयरमैन सीबी भावे को सौंप दी. इस रिपोर्ट की सिफारिशें निम्नलिखित हैं:

• किसी अधिग्रहणकर्ता कंपनी द्वारा खुली पेशकश (ओपन ऑफर) की अनिवार्यता तब है जब वह अधिग्रहीत कंपनी (टार्गेट कंपनी) की 15 प्रतिशत के बजाय 25 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदे. 
• अधिग्रहणकर्ता कंपनी द्वारा लाए जाने वाले खुली पेशकश (ओपन ऑफर) के आकार को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत किया गया. 
• प्रस्तावित मूल्य (ऑफर प्राइस) को टार्गेट कंपनी के पिछले 26 हफ्तों के बजाय 12 हफ्तों के औसत शेयर भाव (वाल्यूम वेटेड) के आधार पर तय किया जाए
• अधिग्रहणकर्ता कंपनी की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत से ज्यादा होने पर अधिग्रहीत कंपनी (टार्गेट कंपनी) की सूचीबद्धता (लिस्टिंग) स्वत: ही खत्म हो जाएगी. यदि कुल हिस्सेदारी 90 फीसदी से कम रहती है तो अधिग्रहीत कंपनी (टार्गेट कंपनी) के नए मालिक को अपनी हिस्सेदारी घटाकर 75 फीसदी तक लानी होगी ताकि कम से कम 25 फीसदी पब्लिक होल्डिंग की शर्त पूरी होती रहे.
• अधिग्रहीत कंपनी (टार्गेट कंपनी) के स्वतंत्र निदेशकों को अधिग्रहणकर्ता कंपनी की प्रस्तावित मूल्य (ऑफर प्राइस) पर राय व्यक्त करनी होगी ताकि अल्पतम शेयरधारकों के हितों की रक्षा हो सके.
• समझौता होने के पांच दिन के भीतर अधिग्रहणकर्ता कंपनी को इस बारे में विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करनी होगी. 
• सेबी कॉरपोरेट ऋण की पुनर्संरचना, राइट्स इश्यू आदि के मामले में संबंधित कंपनी को खुली पेशकश (ओपन ऑफर) न लाने की छूट दे सकता है.
• अधिग्रहणकर्ता कंपनी खुली पेशकश (ओपन ऑफर) के खुलने से तीन दिन पहले प्रस्तावित मूल्य (ऑफर प्राइस) बढ़ा सकती है
• अधिग्रहणकर्ता कंपनी द्वारा ओपन ऑफर से जुड़ी औपचारिकताएं 95 दिनों के बजाय 57 दिनों में ही पूरी की जाएं.
• अधिग्रहणकर्ता कंपनी जो मूल्य टार्गेट कंपनी के प्रमोटर को देगी, वही मूल्य उसे बाकी शेयरधारकों को भी देना होगा. इस तरह समिति ने टार्गेट कंपनी के प्रमोटरों को दी जाने वाली ‘नॉन कंपीट फीस’ का प्रावधान खत्म करने की सिफारिश की है.
• उन्हीं प्रमोटरों को कंपनी में हर साल 5 फीसदी क्रीपिंग अधिग्रहण (धीरे-धीरे शेयरधारिता बढ़ाने) की सुविधा दी जानी चाहिए जिनकी हिस्सेदारी पहले से ही कम से कम 25 फीसदी हो.
 
विदित हो कि बाजार नियामक सेबी ने 4 सितंबर 2009 को कंपनी अधिग्रहण संबंधी नियमों की समीक्षा के लिए सिक्युरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (एसएटी) के पूर्व पीठासीन अधिकारी सी.अच्युतन की अध्यक्षता में 12 सदस्यीय टेकओवर रेगुलेशंस एडवाइजरी समिति (टीएआरसी) बनाई थी. अधिग्रहण संबंधी वर्त्तमान नियम पीएन भगवती समिति की रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 1995 में बनाया गया था.
 
लाभ: 1. सभी शेयरधारकों को खुली पेशकश की प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिलेगा. इसका फायदा आम निवेशकों को होगा.
     2. इससे कॉरपोरेट सेक्टर में अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान होगी.
नुकसान: इससे अधिग्रहण की लागत बढ़ जाएगी. लागत बढ़ने से अधिग्रहण के मामलों में कमी भी आ सकती है.