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पूंजी बाजार नियामक ‘सेबी’ ने काले धन के संदेह में 260 कंपनियों पर पाबंदी लगाई

पूंजी बाजार नियामक ‘सेबी’ ने 19 दिसंबर 2014 को काले धन के संदेह में 260 कंपनियों पर पाबंदी लगाई.

Dec 20, 2014 16:08 IST
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भारत की पूंजी बाजार नियामक संस्था ‘सेबी’ ने कर चोरी और मनी लांडिंग के संदेह में अब तक की सबसे कठोर कार्रवाई करते हुए 19 दिसंबर 2014 को 260 कंपनियों पर शेयर बाजार में खरीद-फरोख्त करने से रोक लगा दी. दो अलग-अलग अंतरिम आदेशों के जरिये भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कहा कि इन 260 फर्मो को अगले निर्देश आने तक तत्काल प्रभाव से शेयर बाजार में कारोबार करने से रोका जाए.

सेबी की तरफ से स्टॉक एक्सचेंजों और डिपॉजिटरियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि सभी निर्देशों का सख्ती से पालन हो. नियामक ने 152 फर्मों पर एक ही मामले में कार्रवाई की.
प्रतिबंधधित कंपनियों के मामलों में सेबी आगे और जांच करेगा. उसने आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), वित्तीय खुफिया इकाई समेत अन्य जांच एजेंसियों के साथ भी इन मामलों को साझा करने का फैसला किया है, ताकि अपने-अपने स्तर पर वे आवश्यक कार्रवाई कर सकें.

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यह मामला फर्स्ट फाइनेंशियल सर्विस नाम की फर्म से संबंधित है. दूसरा मामला रैडफोर्ड ग्लोबल लिमिटेड से जुड़ा है, जिसमें 108 कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की गई. सेबी ने यह कदम ऐसे समय उठाया है जब सरकार ने काले धन पर अंकुश लगाने के लिए अपनी मुहिम को तेज कर दिया है. हाल ही में बाजार नियामक ने भी ऐसी कंपनियों पर अपनी निगरानी बढ़ा दी है जो महज कर चोरी या मनी लांडिंग की गतिविधियों के मकसद से ही बनाई जाती हैं. पहले मामले में करीब दो साल तक शेयर बाजार में संदिग्ध सौदे हुए. ये 31 मार्च  2014 तक चले. जबकि दूसरे मामले में यह अवधि एक वर्ष से कुछ ऊपर रही. इसकी शुरुआत जनवरी 2013 में हुई थी. फर्स्ट फाइनेंशियल के मामले में प्रतिबंधित फर्मो में खुद यह कंपनी, इसके सात प्रमोटर व डायरेक्टर, 80 तरजीही आवंटियों और समूह की 57 फर्मे शामिल हैं. रैडफोर्ड के मामले में सेबी ने इस कंपनी, चार डायरेक्टरों, एक प्रमोटर कंपनी, ग्रुप फर्म के दो डायरेक्टरों, 49 तरजीही आवंटियों, रैडफोर्ड समूह की 39 कंपनियों, पांच संदेहास्पद फर्मो और सात अन्य पर रोक लगाई.

विदित हो कि सेबी के आदेश में प्रतिबंधित कंपनियों के काम करने के तरीके का भी जिक्र किया गया है. ये दीर्घकालिक पूंजी लाभ कर की चोरी में संलिप्त थीं. शेयर बाजारों के जरिये ये अपने आय के स्रोत को जायज दिखाती थीं. इनके खिलाफ कारोबार में अनियमितता और बाजार का दुरुपयोग करने के सुबूत मिले.