बचपन में मातृत्व: किशोरावस्था में गर्भधारण की चुनौती का सामना नामक रिपोर्ट यूएनपीएफए द्वारा जारी

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने बचपन में मातृत्व : किशोरावस्था में गर्भधारण की चुनौती का सामना नामक एक रिपोर्ट 30 अक्टूबर 2013 को जारी की.

Created On: Oct 31, 2013 12:02 ISTModified On: Oct 31, 2013 12:05 IST

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (United Nations Population Fund) ने बचपन में मातृत्व : किशोरावस्था में गर्भधारण की चुनौती का सामना (Motherhood in childhood: Facing the challenge of adolescent pregnancy) नामक एक रिपोर्ट 30 अक्टूबर 2013 को जारी की.  इस रिपोर्ट के अनुसार गरीब देशों में प्रतिवर्ष 73 लाख से अधिक लड़कियां 18 वर्ष की आयु से पहले ही मां बन जाती हैं. इनमें 20 लाख लड़कियों की उम्र 14 वर्ष या इससे कम होती है, इनमें से कई की प्रसव के दौरान मृत्यु हो जाती है.
 
रिपोर्ट में अफ्रीकी देश केन्या का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां दो लाख नाबालिग माताएं बेरोजगार हैं. अगर वह एक शिक्षित नागरिक बनकर बेहतर मानव संसाधन के रूप में काम करके कमाती तो उनके योगदान से केन्या की अर्थव्यवस्था में 3.4 अरब अमेरिकी डालर का योगदान होता. भारत में लड़कियां किशोरावस्था में मां बनने की बजाए कम से कम 25 वर्ष की आयु तक शिक्षा पूरी करें और नौकरी करें तो देश अपनी आर्थिक उत्पादकता में प्रतिवर्ष 7 अरब 70 करोड़ डॉलर का वृद्धि कर सकता है. जबकि ब्राजील की आर्थिक उत्पादकता में 3 अरब 50 करोड़ डॉलर वृद्धि हो सकती है. भारत एक ऐसा देश है जहां बीस से चौबीस साल की बीस प्रतिशत लड़कियां 18 साल की उम्र से पहले ही मां बन जाती हैं. किशोरावस्था में मां बनने पर जच्चा-बच्चा पर जिंदगी भर आने वाला खर्च उसके कमाने और स्वस्थ रहने की सूरत में वह सालाना रकम होती जो जीडीपी का 12 प्रतिशत हिस्सा है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘ बचपन में मां बनना खासकर विकासशील देशों में एक बड़ी वैश्विक समस्या है.’’

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार जल्दी गर्भधारण से न केवल लड़की के स्वास्थ्य, शिक्षा और अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है बल्कि वह अपनी क्षमताओं का एहसास भी नहीं कर पातीं और इससे बच्चे के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि कम उम्र में गर्भावस्था न सिर्फ लड़कियों की जान लेती है बल्कि जीवित बच जाने वाली बच्चियों को स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है. इन बच्चियों को अपने परिवार के सानिध्य और सहयोग की जरूरत होती है लेकिन उन पर खुद शिशु के लालन-पालन की जिम्मेदारी आ जाती है. इन विडंबनाओं के चलते विभिन्न देशों को हर साल अरबों डॉलर उनकी समस्याओं से निपटने और उन्हें आश्रय देने में खर्च करना पड़ता है.
 
रिपोर्ट में कहा गया है बच्चियों के बच्चों को जन्म देने से समुदाय और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. भारत उन देशों में से है, जहां 20 से 24 वर्ष की आयुवर्ग की 20 प्रतिशत या इससे अधिक महिलाओं ने कहा है कि उन्होंने 18 वर्ष की आयु से पहले बच्चे को जन्म दिया. हालांकि देशों ने बाल विवाह रोकने के लिए कानून बनाए हैं लेकिन इन्हें सख्ती से लागू नहीं किया जाता.

यूनिसेफ के अनुसार भारत में बाल विवाह रोकने के लिए कानून होने के बावजूद 18 वर्ष की आयु से पहले 47 प्रतिशत लड़कियों का विवाह हो जाता है लेकिन वर्ष 2010 में केवल 11 लोगों को बाल विवाह का दोषी पाया गया.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, हैती और कांगो ने हालांकि यौन अपराध रोकने के लिए कानून कड़े किए हैं, लेकिन अभी तक इन कानूनों का इस लिहाज से मूल्यांकन नहीं किया गया है कि ये लड़कियों को बलात्कार और अवांछित गर्भधारण से किस हद तक बचाते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है, कम उम्र में गर्भधारण की बाध्यता जब समाप्त होगी तब लड़कियां अधिक शिक्षा ग्रहण कर पाएंगी और उसके परिणामस्वरूप उनका सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण होगा.

रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों को सशक्त करने वाले निवेश अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक है जबकि नहीं निवेश करने की कीमत भारी होती है. किशोर विश्व की पूरी आबादी की 18 फीसदी है और उनमें से 88 फीसदी किशोर विकासशील देशों में हैं. करीब आधी किशोरियां चीन, भारत, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान और अमेरिका में रहती हैं.


यूएनएफपीए के कार्यकारी निदेशक बाबूतुंडे ओसोटीमेहिन ने कहा कि अक्सर समाज लड़कियों को ही उनके गर्भधारण के लिए दोषी ठहराता है. उन्होंने कहा कि किशोरियों के गर्भधारण की वजह लड़कियों के समक्ष विकल्प के अभाव तथा परिस्थिति के नियंत्रणके बाहर होना है. यह शिक्षा की कमी ,बेरोजगारी और सही सूचना और स्वास्थ्य सेवा के अभाव के परिणामस्वरूप है.

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