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भारत ने जीएसएलवी-मार्क3 का सफल परीक्षण किया

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘इसरो’ ने अब तक के अपने सबसे वजनी व नवीनतम पीढ़ी के रॉकेट जीएसएलवी-मार्क3 का 18 दिसंबर 2014 को सफलतापूर्वक परीक्षण किया.

Dec 18, 2014 11:13 IST
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भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘इसरो’ ने अब तक के अपने सबसे वजनी व नवीनतम पीढ़ी के रॉकेट जीएसएलवी-मार्क3 का 18 दिसंबर 2014 को सफलतापूर्वक परीक्षण किया. यह रॉकेट अपने साथ प्रायोगिक क्रू मॉड्यूल भी लेकर गया, जो मानवरहित है.

भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान-मार्क3 (जीएसएलवी-मार्क3) का परीक्षण 18 दिसंबर 2014 को सुबह 9.30 बजे आंध्र प्रदेश में श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया. जीएसएलवी-मार्क3, 630 टन वजनी और 43.43 मीटर लंबा रॉकेट है. जीएसएलवी-मार्क3 के परियोजना निदेशक ‘इसरो’ के वैज्ञानिक एस. सोमनाथ हैं.

जीएसएलवी-मार्क3 से संबंधित मुख्य तथ्य

करीब 155 करोड़ रुपये की लागत वाला यह मिशन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की अंतरिक्ष में यात्रियों को भेजने की योजना का हिस्सा है. यह अपने साथ 3.7 टन वजनी क्रू मॉड्यूल भी लेकर गया, जिसे क्रू मॉड्यूल एटमॉस्फेरिक री-एंट्री एक्सपेरिमेंट नाम दिया गया. इसके जरिये अंतरिक्ष से धरती पर लौटने की तकनीक का परीक्षण किया जा रहा है. इस क्रू मॉड्यूल का आकार एक छोटे से शयनकक्ष के बराबर है, जिसमें दो से तीन व्यक्ति आ सकते हैं. प्रक्षेपण के पांच मिनट के बाद ही रॉकेट ने कप केक आकार के 3.7 टन वजनी बड़े से क्रू मॉड्यूल को 126 किलोमीटर की ऊंचाई पर अलग कर दिया, जिसके बाद यह तेजी से धरती की ओर आने लगा. इस क्रम में इसकी गति का नियंत्रण इसरो के अधिकारियों ने इसमें लगे मोटर के जरिये किया. यह क्रू मॉड्यूल धरती पर अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के करीब बंगाल की खाड़ी में गिरा.
प्रयोग के तौर पर अंतरिक्ष में भेजे गए इस रॉकेट में वास्तविक क्रायोजेनिक इंजन नहीं है. यह अभी निर्माणाधीन है और इसके बनने में करीब दो साल का वक्त लगेगा. हालांकि रॉकेट की संरचना के व्यावहारिक अध्ययन के लिए इसरो ने इसमें नकली क्रायोजेनिक इंजन लगाया, जो अंतरिक्ष यान को ऊर्जा देने वाले वास्तविक क्रायोजेनिक इंजन की तरह ही है. नकली क्रायोजेनिक इंजन में भी मास सिमुलेशन के लिए तरल नाइट्रोजन भरा गया है.