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यूनेस्को ने बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक परिदृश्य पर रिपोर्ट जारी की

संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 26 जून 2014 को बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक परिदृश्य पर रिपोर्ट जारी की.

Jun 30, 2014 17:28 IST
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संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने 26 जून 2014 को बच्चों की शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक परिदृश्य पर रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में 6 वर्ष से 11 वर्ष की उम्र वाले ऐसे 58 मिलियन बच्चे हैं जो स्कूल नहीं जाते.

यह रिपोर्ट यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा ने फ्रांस के ब्रुसेल्स में हुए एक संवाददाता सम्मेलन में प्रस्तुत की गयी. सम्मेलन का आयोजन ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन ने किया था.

नए वैश्विक आउट–ऑफ–स्कूल के आंकड़े यूनेस्को इंस्टीट्यूट फॉर स्टैटिस्टिक्स (यूआईएस) ने बनाए हैं. इन आंकड़ों से पता चलता है कि अगर यही रूझान जारी रहा तो स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों में से 43 फीसदी बच्चे कभी भी स्कूल नहीं जा पाएंगे. रिपोर्ट के मुताबिक खासतौर पर करीब 15 मिलियन लड़कियों और 10 मिलियन लड़कों को कभी भी यह अवसर नहीं मिल पाएगा.

रिपोर्ट की मुख्य बातें

रिपोर्ट में उन 17 देशों के बारे में बताया गया है जिन्होंने एक दशक से कुछ ज्यादा समय में स्कूल नहीं जाने वाली अपनी आबादी का लगभग 90 फीसदी को कम किया जिससे सकारात्मक परिवर्तन की संभावना पैदा होती है. इन देशों ने स्कूल की फीस कम करना, अधिक प्रासंगिक पाठ्यक्रम को शामिल  करना और संघर्षरत परिवारों को वित्तीय समर्थन देने जैसे सकारात्मक बदलावों में निवेश किया. वैश्विक प्रगति में कमी की बहुत बड़ी वजह उप– सहारा अफ्रीका में उच्च जनसंख्या वृद्धि दर है, जो अब 30 मिलियन से भी अधिक स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों का घर भी है. इस क्षेत्र में साल 2012 में शिक्षा प्रणाली में शामिल होने वाले तीन में से एक से अधिक बच्चा प्राथमिक स्कूल के अंतिम ग्रेड में पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ दिया था.

दस्तावेजों में 12 वर्ष से 15 वर्ष के बच्चों की शिक्षा में महत्वपूर्ण अंतर दिखता है. वैश्विक स्तर पर 2012 में 63 मिलियन किशोर स्कूल छोड़ चुके थे. दक्षिण और पश्चिम एशिया में हालांकि यह संख्या 2000 के बाद करीब एक तिहाई ही रह गया है फिर भी यह क्षेत्र 26 मिलियन किशोरों के स्कूल छोड़ने के साथ सबसे बड़ी आबादी वाला क्षेत्र बना हुआ है.

उप–सहारा अफ्रीका स्कूल छोड़ने वाले 21 मिलियन किशोरों का घर है और अगर यही हालात रहे तो इनकी संख्या और बढ़ सकती है.

एजुकेशन फॉर ऑल ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट द्वारा किए गए विश्लेषण में यह बात सामने आई है कि वे 17 देश जहां साल 2000 में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या विश्व स्तर पर स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या का एक चौथाई था, ने स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की आबादी में 86 फीसदी की कमी लाई और यह संख्या 27 मिलियन से घट कर 4 मिलियन रह गया. ऐसा करने में इन देशों ने   दशक से कुछ ज्यादा का समय लिया. उदाहरण के लिए नेपाल, यहां साल 2000 में 24 फीसदी बच्चे स्कूल नहीं जाते थे जबकि साल 2013 में ऐसे बच्चों की संख्या सिर्फ एक फीसदी रह गई. इसी समय में मोरक्को में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या में 96 फीसदी की कमी आई.

विश्लेषण ने छह नीतियों की पहचान की है जो प्राथमिक स्कूल जाने वाले बच्चों को स्कूल जाने में मदद करने में सफल साबित हुए हैं. ये अन्य देशों के लिए महत्वपूर्ण सबक साबित हो सकते हैं.

फीस में कमीः ब्रूंडी ने 2005 में स्कूल की फीस में कमी की थी और छह सालों में ही देश में प्राथमिक स्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चों की संख्या 54 फीसदी से 94 फीसदी पहुंच गई.

सामाजिक नकद हस्तांतरणः निकारागुआ ने साल 2000 में स्कूल के खर्च नहीं उठा सकने वाले परिवारों की मदद के लिए सामाजिक नकद हस्तांतरण की शुरुआत की थी. इससे साल 1998 में जहां कभी भी स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या 17 फीसदी थी, वह कम होकर साल 2009 में 7 फीसदी पर आ गई.

जातीय और भाषाई अल्पसंख्यकों का ध्यानाकर्षणः मोरक्को ने 2003 में प्राथमिक स्कूलों में स्थानीय अमाझिंग भाषा की पढ़ाई शुरू कराई और 2009 में कभी भी स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या 9 फीसदी से घट कर 4 फीसदी तक आ गई.

शिक्षा खर्च बढ़ानाः घाना ने शिक्षा पर होने वाले खर्च को दुगना कर दिया. इससे 1999 में जहां 2.4 मिलियन बच्चे स्कूल में दाखिला लेने आते थे, 2013 में उनकी संख्या बढ़कर 4.1 मिलियन हो गई.

शिक्षा की गुणवत्ता में सुधारः वियतनाम ने वंचित छात्रों पर विशेष ध्यान देने के लिए नए पाठ्यक्रम की शुरुआत की और 2000 से 2010 के बीच कभी भी स्कूल नहीं जा सकने वाले बच्चों की संख्या आधी करने में सफल रहा.

विवादों का निपटानः नेपाल में विवादित क्षेत्रों और अन्य स्थानों के बच्चों के लिए शिक्षा का अंतर 2006 में देश के गृह युद्ध के खत्म होने के बाद समाप्त हो गया. इसके लिए वैसे कार्यक्रमों को धन्यवाद देना चाहिए जिनकी वजह से शिक्षा के अवसर बढ़े. इसमें उपेक्षित समूहों के लिए छात्रवृत्ति भी शामिल है.

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