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राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा संथारा पर प्रतिबंध के पश्चात् देशभर में जैनियों द्वारा प्रदर्शन

जैन समुदाय के लोगों ने 10 अगस्त 2015 को राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा संथारा पर प्रतिबन्ध लगाये जाने के पश्चात् देश भर में प्रदर्शन किया

Aug 25, 2015 15:38 IST

संथारा : व्यक्ति के जीवन के अंतिम समय स्वयं मृत्यु स्वीकार करना

संथारा अगस्त 2015 से चर्चा में है क्योंकि जैन समुदाय के लोगों ने 10 अगस्त 2015 को राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा इस प्रथा पर प्रतिबन्ध लगाये जाने के पश्चात् देश भर में प्रदर्शन किया.

न्यायालय ने इसे भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 306 के तहत अपराध बताया है.

संथारा एक प्राचीन परंपरा है जिसे सल्लेखन अथवा समाधि मारना अथवा संन्यास मारना भी कहा जाता है, यह स्वेच्छा से मृत्यु प्राप्त करने की एक प्रथा है. इसका उद्देश्य पुराने कर्मों से मुक्ति प्राप्त करके नए कर्मों को बुराइयों से सुरक्षा प्रदान करना है. हिन्दू प्रथाओं में भी इसी तरह की एक प्रथा है प्रयोपवेसा अथवा संजीवन समाधि.

सल्लेखन, दो शब्दों के मिलकर बना है, सल (अर्थात् उचित) एवं लेखन अर्थात् गतिशीलता धारण करना. यह जैन समुदाय की एक विशेष प्रथा है.


इसे ग्रहस्थ तथा सन्यासियों दोनों के लिए आवश्यक बताया गया है. इसे व्यक्ति तभी कर सकता है जब वह किसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित हो अथवा पूरी तरह अक्षम हो अथवा उसे अपना अंत नजदीक दिखाई दे रहा हो. जैन समुदाय में श्वेताम्बर संप्रदाय के लोग इस प्रथा का अनुसरण करते हैं.

मौर्य संप्रदाय के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य भी तीसरी शताब्दी में कर्नाटक में चंद्रगिरी पर्वतमाला पर सल्लेखन धारण करके ही मृत्यु को प्राप्त हुए थे.

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