Search

विश्व बैंक रिपोर्ट: टर्न डाउन दा हीट क्लाइमेट एक्सट्रीम्स, रीजनल इम्पैक्ट्स और केस फॉर रिज़िलीअन्स

विश्व बैंक ने टर्न डाउन दा हीट: क्लाइमेट एक्सट्रीम्स, रीजनल इम्पैक्ट्स और केस फॉर रिज़िलीअन्स नामक रिपोर्ट 19 जून 2013 को जारी की.

Jun 30, 2013 11:23 IST
facebook IconTwitter IconWhatsapp Icon

विश्व बैंक ने टर्न डाउन दा हीट: क्लाइमेट एक्सट्रीम्स, रीजनल इम्पैक्ट्स और केस फॉर रिज़िलीअन्स नामक रिपोर्ट 19 जून 2013 को जारी की. रिपोर्ट में इस बात पर विचार किया गया है कि तापमान में 2 डिग्री और 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से दक्षिण एशिया, उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में कृषि उत्पादन, जल संसाधन, तटीय परितंत्र और शहरों पर क्या असर होना है.

यह विश्व बैंक की वर्ष 2012 की रिपोर्ट पर आधारित है जिसमें निष्कर्ष निकाला गया था कि यदि देशों ने अभी ठोस कार्रवाई नहीं की तो इस सदी के आखिर तक विश्व का तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर के तापमान से 4 डिग्री बढ़ जाना है.
इस रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि वर्ष 2040 तक भारत में अत्यधिक गर्मी के कारण फसल की पैदावार में बहुत कमी हो जानी है. वर्षा स्तर तथा भूजल में बदलाव के कारण पानी की उपलब्धता कम हो जानी है जिससे भारत में हालात और खराब हो सकते हैं जहां भूजल संसाधन का स्तर पहले ही चिंताजनक हो चुका है. देश के 15 प्रतिशत से अधिक भूजल का अति दोहन किया जा चुका है.

विश्व बैंक के लिए यह रिपोर्ट पोट्सडैम इन्स्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च एंड क्लाइमेट एनालिटिक्स ने तैयार की है और विश्वभर के 25 वैज्ञानिकों ने इसकी समीक्षा की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि विश्व का तापमान वर्ष 2090 तक औसतन 4 डिग्री सेल्सियस बढ़ा तो दक्षिण एशिया हेतु इसके परिणाम और बुरे होने हैं. यदि दक्षिण एशिया में कार्बन उत्सर्जन को सीमित करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई तो इस परिदृश्य में, दक्षिण एशिया में भयंकर सूखे और बाढ़, समुद्र का जल स्तर बढ़ने, ग्लेशियर पिघलने और खाद्य उत्पादन में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. उदाहरण के लिए भारत में मॉनसून के दौरान अत्यधिक वर्षा जिसकी फिलहाल 100 वर्ष में सिर्फ एक बार होने की आशंका होती है लेकिन सदी के आखिर तक इसकी हर 10 वर्ष में होने की आशंका है.

जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे असर से अब भी बचा जा सकता है यदि गर्माहट में वृद्धि को 2 डिग्री से कम रखा जाए लेकिन इसके अवसर कम हो रहे हैं. रिपोर्ट के अनुसार जलवायु अनुकूल खेती, बाढ़ और सूखे से रक्षा तथा ऊष्मा प्रतिरोधी फसलों, भूजल प्रबंधन में सुधार, तटीय बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने और मानव स्वास्थ्य में सुधार के जरिए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता है.

विश्व के प्रमुख भागों में बढ़ते तापमान का प्रभाव

दक्षिण एशिया: वर्ष 2040 तक पृथ्वी के तापमान 2 डिग्री तक वृद्धि से दक्षिण एशिया में फसल उत्पादन कम से कम 12 प्रतिशत कम हो सकता है. इसके लिए प्रति व्यक्ति मांग पूरी करने के लिए आयात को जलवायु परिवर्तन के पहले की तुलना में दुगुना करना पड़ेगा. भोजन की उपलब्धता घटने से स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ जानी है जिनमें बच्चों में बोनापन होना शामिल है. जलवायु परिवर्तन से पहले की स्थिति की तुलना में वर्ष 2050 तक बच्चों में बोनापन होने की प्रक्रिया 35 प्रतिशत बढ़ सकती है. भूमध्यरेखा के निकट होने के कारण दक्षिण एशिया में समुद्र के जल स्तर में अधिक वृद्धि होनी है इसकी तुलना में अक्षांश के करीबी क्षेत्रों में समुद्र का जल स्तर कम बढ़ेगा.

बंग्लादेश: रिपोर्ट में बंग्लादेश को सबसे ज्यादा असर वाले स्थानों के तौर पर शामिल किया गया है. यहां नदियों में अत्यधिक बाढ़, उष्णकटिबंधीय तूफान, समुद्र का जल स्तर बढ़ने और तापमान में बहुत अधिक वृद्धि होने की आशंका है.

मालदीव: मालदीव में समुद्र का जल स्तर अधिकतम 100-115 सेंटीमीटर तक बढ़ने की आशंका है.

थाईलैंड: बढ़ते समुद्र के जल स्तर से बैंकाक में वर्ष 2030 तक बाढ़ आ सकती है.

अफ्रीका: सूखा और गर्मी के कारण उप-सहारा अफ्रीका (Sub-Saharan Africa) में मक्का की फसल के लिए उपयोग होने वाली 40 प्रतिशत भूमि कृषि योग्य नहीं रहेगी.

भारत पर संभावित असर

• मॉनसून के दौरान अत्यधिक वर्षा जिसकी फिलहाल 100 वर्ष में सिर्फ एक बार होने की आशंका होती है, सदी के आखिर तक इसकी हर 10 वर्ष में होने की आशंका है.
• कोलकाता और मुंबई में इसका सबसे अधिक असर पड़ने की आशंका है जहां नदियों में भारी बाढ़, उष्णकटिबंधीय तेज तूफान, समुद्र का जल स्तर बढ़ने और तापमान में अत्यधिक वृद्धि की आशंका है.
• फसल की उपज में बहुत कमी होने की आशंका प्रकट की गई है. करीब 6 करोड़ 30 लाख लोग अपनी कैलोरी की जरूरत भी पूरी नहीं कर सकेंगे.
• भोजन की उपलब्धता घटने से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
• वसंत के आखिर और ग्रीष्मकाल में सिंधु और ब्रहृमपुत्र नदियों में पानी के प्रवाह में बहुत कमी हो सकती है.
• रिपोर्ट में कोलकाता और मुंबई को सबसे ज्यादा असर वाले स्थानों के तौर पर शामिल किया गया है.
• ग्लेशियर पिघलने और बर्फ कम होने से भी स्थायी और विश्वसनीय जल संसाधनों को गंभीर जोखिम हो सकता है. गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियां बर्फ और ग्लेशियर के पिघले पानी पर बहुत अधिक निर्भर हैं जो जलवायु परिवर्तन के लिए अतिसंवेदनशील है.
• ग्लेशियर पिघलने और बर्फ कम पड़ने का इन नदियों पर अधिक असर पड़ेगा. रिपोर्ट के अनुसार भविष्य में कम हिमपात वाले वर्षों की संख्या बढ़ने का अनुमान है.
• तापमान में 2 डिग्री तक वृद्धि होने से पहले ही इस तरह की घटनाएं बढ़ जानी हैं. इससे बाढ़ आने की आशंका और कृषि पर खतरा बढ़ जाना है.

भारत सरकार के सहयोग से विश्व बैंक जलवायु परिवर्तन के वर्तमान तापमान वृद्धि के रुझानों के असर से बचने की क्षमता बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहा है. कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में विश्व बैंक की सहायता से चलाई जा रही परियोजनाओं से स्थानीय समुदायों को अपने जल क्षेत्रों के बेहतर संरक्षण में मदद मिल रही है. इससे खेती के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ने और अधिक आय देने वाली फसलों को उगाने में किसानों की मदद, अल्प जल संसाधनों के कुशल इस्तेमाल और कृषि व्यवसाय स्थापित करने में समुदायों को मदद मिल रही है. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन सहित विश्व बैंक समर्थित ग्रामीण आजीविका परियोजनाओं से भी जल संरक्षण और दक्षता, भूमि संरक्षण की पद्धतियों इत्यादि के एकीकरण में मदद मिल रही है. बैंक भारत में पर्यावरण के रूप से दीर्घकालिक जल विद्युत के विकास के साथ प्रायोगिक परियोजनाओं के जरिए राष्ट्रीय सौर और ऊर्जा दक्षता मिशन को भी समर्थन दे रहा है.

Download our Current Affairs & GK app For exam preparation

डाउनलोड करें करेंट अफेयर्स ऐप एग्जाम की तैयारी के लिए

AndroidIOS