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14वें वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी

वाईवी रेड्डी की अध्यक्षता वाले 14वें वित्त आयोग ने 15 दिसंबर 2014 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी.

Dec 17, 2014 16:50 IST
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आरबीआई के भूतपूर्व गवर्नर वाईवी रेड्डी की अध्यक्षता वाले 14वें वित्त आयोग ने 15 दिसंबर 2014 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप दी. यह रिपोर्ट वित्त आयोग के सचिव एएन झा ने भारत के राष्ट्रपति की सचिव ओमिता पॉल को सौंपी.

पैनल ने केंद्र औऱ राज्यों के बीच 1 अप्रैल 2015 और 31 मार्च 2020 के दौरान कर प्राप्तियों के हस्तांतरण पर अपने विचार दिए हैं.
आयोग द्वारा जमा की गई रिपोर्ट केंद्रीय बजट 2015–16 को तैयार करने के लिए प्रमुख इनपुट होगा.

14वें वित्त आयोग के बारे में
14वें वित्त आयोग का गठन 2 जनवरी 2013 को वाईवी रेड्डी की अध्यक्षता में किया गया था और इसे अपनी रिपोर्ट 31 अक्टूबर 2014 तक जमा करने को कहा गया था. 31 अक्टूबर 2014 को भारत के राष्ट्रपति ने 14वें वित्त आयोग को दो माह का अतिरिक्त समय ( 31 दिसंबर  2014) देने संबंधी आदेश जारी किया था.
 
राष्ट्रति ने आयोग की समय सीमा में विस्तार करने का फैसला आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट जमा करने के लिए दो माह का विस्तार मांगने पर किया था. आयोग ने वित्तीय अनुमानों की जांच और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों के साथ 2 जून 2014 को हुए अतिरिक्त शर्तों के संदर्भ में परामर्श करने लिए समय सीमा में विस्तार की मांग की थी. पैनल को वस्तु एवं सेवा कर पर भी गौर करने को कहा गया था.

14वें वित्त आयोग के विचारार्थ
• 1 अप्रैल 2015 से शुरु होने वाले पांच वर्षों तक केंद्र सरकार के संसाधनों, 2014– 15 के दौरान कराधान स्तर एवं गैर– कर राजस्व की जो होने की संभावना है, के स्तर के आधार पर.
• केंद्र सरकार के संसाधनों की मांग, खासतौर पर, लोक प्रशासन, सैन्य, आंतरिक एवं सीमा सुरक्षा, ऋण– सर्विसिंग और अन्य प्रतिबद्ध व्यय एवं देनदारियों पर होने वाले खर्च पर.
• राज्य सरकारों के संसाधन और विभिन्न मदों में ऐसे संसाधनों की मांग जिसमें अत्यधिक ऋण वाले राज्यों में संसाधन उपलब्धता पर ऋण स्तरों का प्रभाव, 1 अप्रैल 2015 से शुरु होने वाले पांच वर्षों तक 2014– 15 के दौरान कराधान स्तर एवं गैर– कर राजस्व की जो होने की संभावना है, के स्तर के आधार पर.
• सभी राज्य और केंद्र सरकार के राजस्व खाते पर प्राप्तियों और खर्च को न सिर्फ संतुलित करने के उद्देश्य से बल्कि पूंजीगत निवेश के लिए अधिशेष पैदा करने के उद्देश्य से भी.
• केंद्र सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार का कराधान प्रयास और केंद्र के मामले में कर– सकल घरेलू उत्पाद अनुपात में सुधार और राज्य के मामले में कर– सकल राज्य घरेलू उत्पाद अनुपात हेतु अतिरिक्त संसाधन जुटाने की क्षमता के लिए.
• टिकाउ और समावेशी विकास को ध्यान में रखते हुए जरूरी सब्सिडी का स्तर एवं केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सब्सिडी का समान साझा.
• रखरखाव के गैर– वेतन घटक पर किया जाने वाला खर्च और पूंजीगत संपत्तियों एवं नियोजित स्कीमों पर गैर– पारिश्रमित संबंधित रखरखाव खर्च का 31 मार्च 2015 तक रखरखाव और नियम जिनके आधार पर पूंजीगत संपत्तियों के रखरखाव के लिए विशेष राशि की सिफारिश की गई है और ऐसे खर्च की निगरानी का तरीका.
• सार्वजनिक उपयोगिता सेवाओं जैसे पेयजल, सिंचाई, बिजली एवं सार्वजनिक परिवहन को नीतिगत उतार– चढ़ाव के दौरान वैधानिक प्रावधानों के जरिए इंसुलेट करने की जरूरत.
• सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को प्रतिस्पर्धी और बाजारोन्मुख बनाने, सूचीबद्ध एवं विनिवेश एवं गैर– प्राथमिकता वाले उद्यमों को खत्म करने की जरूरत.
• पारिस्थितिकी, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के प्रबंधन के संतुलन की जरूरत.
• प्रस्तावित वस्तुओं एवं सेवा कर का केंद्र एवं राज्य सरकार के वित्त एवं किसी प्रकार के राजस्व घाटे की स्थिति में मुआवजे के तंत्र पर प्रभाव.

वित्त आयोग
भारतीय वित्त आयोग का गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत राष्ट्रपति द्वारा किया गया था. आयोग का गठन केंद्र एवं राज्य के बीच वित्तीय संबंधों को परिभाषित करने के लिए किया गया था. संविधान के मुताबिक, आयोग का गठन प्रत्येक पांच वर्षों के लिए होगा और इसमें एक अध्यक्ष एवं चार अन्य सदस्य होंगे.

• भारत का पहला वित्त आयोग 1951 में बनाया गया था जिसके अध्यक्ष के. सी. नेगी थे. उनकी योजना का संचालन 1952– 57 के दौरान किया गया था.
• 13 वां वित्त आयोग 2007 में गठित हुआ और भूतपूर्व केंद्रीय वित्त सचिव और वित्त मंत्री के सलाहकार डॉ. विजय एल. केलकर इसके अध्यक्ष थे. उनकी योजना 2010– 15 के दौरान परिचालित की गई थी.