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केंद्र सरकार ने यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013 से सम्बंधित नए दिशा-निर्देश जारी किए

महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 में संशोधित नए दिशा -निर्देश के तहत शिकायतों का निस्तारण 30 दिन की अवधि में और विशेष परिस्थितियों में शिकायत मिलने की तारीख से 90 दिनों की अवधि में पूरा किय जाना चाहिए.

Dec 29, 2016 18:24 IST
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केन्द्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 से सम्बंधित नए दिशा - निर्देश जारी किए हैं.

मुख्य तथ्य-

  • केंद्र सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देश के अनुसार कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम के कार्यान्वयन के बारे में संक्षिप्त विवरण में प्राप्त होने वाले और निपटाए जाने वाले मामलों की संख्या भी शामिल की जाएगी.
  • इसको सभी मंत्रालय/ विभाग और प्राधिकारी वार्षिक रिपोर्ट का हिस्सा बनाएँगे.
  • महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 में संशोधित नए दिशा -निर्देश के तहत शिकायतों का निस्तारण 30 दिन की अवधि में और विशेष परिस्थितियों में शिकायत मिलने की तारीख से 90 दिनों की अवधि में पूरा किय जाना चाहिए.
  • मंत्रालय/ विभाग और सम्बंधित कार्यालय को शिकायतकर्ता के बारे में यह भी निगरानी रखनी चाहिए कि शिकायतकर्ता को शिकायत करने के बाद किसी भी तरीके से प्रताड़ित न किया जा सके.
  • यदि पीड़ित महिला ऐसा महसूस करती है कि उसकी शिकायत के कारण उसे प्रताड़ित किया जा रहा है तो शिकायतकर्ता के पास अपना प्रतिवेदन सचिव या संगठन प्रमुख को भेजने का विकल्प भी है.
  • संबंधित अधिकारी को इस तरह की शिकायत प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर उसका निस्तारण करना आवश्यक है.
  • सभी मंत्रालय/ विभाग द्वारा मासिक प्रगति रिपोर्ट महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के पास भेजना आवश्यक होगा.
  • केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका संजय गांधी के अनुसार महिला एवं बाल विकास मंत्रालय कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित मुद्दों पर निरंतर कार्य करेगा. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने केन्द्र सरकार के मंत्रालयों/ विभागों के तहत आंतरिक शिकायत समिति के प्रमुखों को प्रशिक्षित करने हेतु व्यापक योजना भी तैयार करेगी.  

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न-  

  • कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का आशय कार्यस्थल पर महिला सह कर्मियों के विरुद्ध पुरुष सहयोगियों की ओर से अवांछित प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से यौन सम्पर्क, टिप्पणी या आचरण के रुप में जाना जा सकता है.
  • भारत के सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान बनाम विशाखा केस 1997 में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामले को परिभाषित किया है.
  • किसी भी प्रकार का अस्वीकृत यौन निर्धारित व्यवहार (प्रत्यक्ष या दबाब में) शारीरिक सम्पर्क या प्रस्ताव, यौन अनुग्रह हेतु मांग या प्रार्थना, अश्लील व अभद्र टिप्पणी, अश्लील साहित्य या यौन प्रकृति के अन्य अप्रिय शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक आचरण को शामिल किया है.

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के कारण-
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के कारणों में पितृसत्तात्मक संरचना, यौन विकृति, कार्यस्थल पर ईर्ष्या, अवमानना और अपमान की भावना, पुरुष श्रेष्ठता आदि हो सकते हैं.

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से निपटने हेतु कानूनी प्रावधान-

  • वर्ष 2013 तक कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न विशेष अपराध की श्रेणी नहीं था.
  • भारतीय दंड संहिता 1860 में भी कार्यस्थल पर महिलाओं यौन उत्पीड़न को अपराध के रुप में सुलझाने हेतु कोई अलग धारा नहीं थी.
  • भारतीय दंड संहिता 1860 के अनुसार यौन उत्पीड़न को केवल परिभाषित किया गया और आई.पी.सी. की धारा 354 के अन्तर्गत इसे दंडनीय अपराध बनाया गया.

महिला यौन उत्पीड़न में विशाखा दिशा-निर्देश-

  • वर्ष 1997 में राजस्थान बनाम विशाखा केस में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी के इस दोष और बचाव के रास्तों को पहचाना और एक ऐतिहासिक निर्णय दिया.  
  • कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के बारे में-
  • यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, 9 दिसम्बर 2013 को प्रभाव में आया.
  • इसके नाम के अनुरूप यह उद्देश्य रोकथाम, निषेध और निवारण को स्पष्ट करता है और उल्लंघन के मामले में, पीड़ित को निवारण प्रदान करने हेतु कार्य भी करता है.
  • यह अधिनियम विशाखा केस में दिये गये लगभग सभी दिशा-निर्देशों को धारण करता है.
  • इसमें बहुत से अन्य प्रावधान भी निहित हैं. जैसे- शिकायत समितियों को सबूत जुटाने में सिविल कोर्ट वाली शक्तियाँ प्रदान की गयी है.
  • यदि नियोक्ता अधिनियम के प्रावधानों को पूरा करने में असफल होता है तो उसे 50,000 रुपये से अधिक अर्थदंड भरना पड़ेगा.
  • यह अधिनियम अपने क्षेत्र में गैर-संगठित क्षेत्रों जैसे ठेके के व्यवसाय में दैनिक मजदूरी वाले श्रमिक या घरों में काम करने वाली नौकरानियाँ या आयाएं आदि को भी समाहित करता है.

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