पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन: सात दिन का राजकीय शोक

Aug 18, 2018 08:35 IST

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का 16 अगस्त 2018 को दिल्ली के एम्स में शाम 05 बजकर 05 मिनट पर निधन हो गया. अटल बिहारी वाजपेयी को गुर्दा (किडनी) की नली में संक्रमण, छाती में जकड़न, मूत्रनली में संक्रमण आदि के बाद 11 जून 2018 को एम्स में भर्ती कराया गया था.

एम्‍स से उनका पार्थिव शरीर उनके निवास कृष्‍ण मेनन मार्ग पर लाया गया. यहां पर पूर्व प्रधानमंत्री का शव उनके निवास स्‍थान पर तिरंगे में लपेटा गया. यहां पर लोगों ने उन्‍हें श्रद्धांजलि अर्पित किया.

पंचतत्व में विलीन:

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 17 अगस्त 2018 को पंचतत्व में विलीन हो गए. दिल्ली के स्मृति स्थल पर राष्ट्र ने उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी. वाजपेयी द्वारा गोद ली गई बेटी नमिता ने उन्हें मुखाग्नि दी. इस दौरान वहां मौजूद सभी लोग हाथ जोड़े खड़े रहे. सभी की आंखों में आंसू थे. वाजपेयी का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ संपन्न किया गया.

अंतिम संस्कार से पहले स्मृति स्थल पर सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सलामी दी. अंतिम यात्रा के दौरान अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। करीब 45 हजार जवानों को चप्पे-चप्पे पर तैनात किया गया.

विदेशी नेताओं ने भी वाजपेयी को श्रद्धांजलि दी:

भूटान नरेश जिग्मे खेसर, अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका के विदेश मंत्रियों समेत कई विदेशी नेताओं ने भी वाजपेयी को श्रद्धांजलि दी.

राजकीय शोक:
केंद्र सरकार ने सात दिन का राजकीय शोक घोषित किया. इस दौरान राष्‍ट्रीय झंडा आधा झुका रहेगा. केंद्र सरकार के कार्यालयों में आधे दिन की छुट्टी रहेगी. इसके साथ उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड, मध्‍यप्रदेश, झारखंड और बिहार ने भी सात दिन का राजकीय शोक घोषित किया. पंजाब ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया.

स्‍कूल कॉलेजों में सार्वजनिक अवकाश:  

उत्‍तर प्रदेश, दिल्‍ली, झारखंड, बिहार, तमिलनाडु, मध्‍यप्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, उत्‍तराखंड और पंजाब में 17 अगस्त 2018 को स्‍कूल, कॉलेज और सरकारी कार्यालय बंद रहेंगे. हिमाचल प्रदेश ने दो दिन की छुट्टी ऐलान किया. भारतीय उद्योग व्‍यापार मंडल ने 17 अगस्त 2018 को दिल्‍ली के बाजार बंद करने का निर्णय लिया है. आज छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस रेलवे स्टेशन की लाइट्स बंद रहेंगी.

AIIMS ने प्रेस रिलीज जारी किया:

 Atal Bihari Vajpayee passes away

अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर पीएम मोदी का ट्वीट:

मधुमेह से पीड़ित वाजपेयी का एक ही गुर्दा काम करता था. हालांकि, इन सबमें डिमेंशिया से भी अटल बिहारी वाजपेयी सबसे ज्यादा पीड़ित थे.

                                डिमेंशिया क्या है?

डिमेंशिया किसी खास बीमारी नहीं, बल्कि एक अवस्था है. डिमेंशिया में इंसान की याददाश्त कमजोर हो जाती है और वह अपने रोजमर्रा के काम भी ठीक से नहीं कर पाता है. डिमेंशिया से पीड़ित लोगों में लघु याददाश्त जैसे लक्षण भी देखने को मिलते हैं. अकसर लोग डिमेंशिया को सिर्फ एक भूलने की बीमारी के नाम से जानते हैं, और सोचते हैं कि यह मुख्यतर याददाश्त की समस्या है. पर डिमेंशिया के अनेक गंभीर और चिंताजनक लक्षण होते हैं. डिमेंशिया से ग्रस्त व्यक्ति की हालत समय के साथ बिगड़ती जाती है, और सहायता की जरूरत भी बढ़ती जाती है. इसमें मस्तिष्क में हानि भी होती है.

 

काफी दिनों से बीमार थे वाजपेयी:

आपको बता दें कि वाजपेयी काफी दिनों से बीमार थे. वे लगभग 15 साल पहले राजनीति से संन्यास ले चुके थे.

           अटल बिहारी वाजपेयी एक 'कवि' भी:

एक राजनीतिज्ञ होने के साथ साथ अटल बिहारी वाजपेयी एक 'कवि' भी रहे और कविताएं उनके हृदय के करीब रहीं. प्रधानमंत्री बन जाने के बाद कविता गोष्ठियों या कवि सम्मेलनों में जाना उनके लिए संभव नहीं था, लेकिन कविता से उनका प्रेम ही है जो वर्ष 2002 में 'संवेदना' नाम की एलबम के रुप में सामने आया.

अटल बिहारी वाजपेयी एक कमाल के वक्ता रहे हैं और उनकी भाषा शैली में कविता इस कदर रची बसी थी की वो सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर लेते थे.

 

अटल बिहारी वाजपेयी के “जीवन से मृत्यु की कहानी” कहती इस कविता के कुछ अंश:

...जीवन एक अनंत कहानी

पर तन की अपनी सीमाएं

यद्दपि सौ शरदों की वाणी

इतना काफी है, अंतिम दस्तक पर...

 

 

3 बार देश के प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी:

अटल बिहारी वाजपेयी 3 बार देश के प्रधानमंत्री रहे. वह पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया. पहली बार वर्ष 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और उनकी सरकार सिर्फ 13 दिनों तक ही रह पाई. वर्ष 1998 में वे दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, तब उनकी सरकार 13 महीनों तक चली थी. वर्ष 1999 में वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और 5 सालों का कार्यकाल पूरा किया. 5 साल का पूर्ण कार्यकाल पूरा करने वाले वह पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं.

भाजपा की स्थापना:

अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 1980 में जनता पार्टी से असन्तुष्ट होकर जनता पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना में मदद की. अटल बिहारी वाजपेयी ने लाल कृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर भाजपा की स्थापना की थी और उसे सत्ता के शिखर पहुंचाया. भारतीय राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी सुपरहिट साबित हुई है. अटल बिहारी देश के उन चुनिन्दा राजनेताओं में से हैं जिन्हें दूरदर्शी माना जाता है. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में ऐसे कई फैसले लिए जिसने देश और उनके खुदके राजनीतिक छवि को काफी मजबूती दी.

अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में:

•    अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था.

•    वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई थी.

•    उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया था.

•    अटल बिहारी वाजपेयी 3 बार देश के प्रधानमंत्री भी रहे थे.

•    वे वर्ष 1968 से 1973 तक भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे. विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया था.

•    अटल बिहारी वाजपेयी कुल 10 बार लोकसभा के सांसद रहे.

•    वहीं वे दो बार वर्ष 1962 और वर्ष 1986 में राज्यसभा के सांसद भी रहें. इस दौरान वे उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली और मध्य प्रदेश से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीते. वहीं वह गुजरात से राज्यसभा पहुंचे थे.

•    वे भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले महापुरुषों में से एक हैं. वे वर्ष 1968 से 1973 तक उसके अध्यक्ष भी रहे. वे जीवन भर भारतीय राजनीति में सक्रिय रहे.

आजीवन अविवाहित:

उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारम्भ किया था और देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचने तक उस संकल्प को पूरी निष्ठा से निभाया.

पुरस्कार:

•    सर्वतोमुखी विकास के लिये किये गये योगदान तथा असाधारण कार्यों के लिये दिसंबर 2014 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. भारत रत्न भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है. इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है. इस सम्मान की स्थापना 02 जनवरी 1954 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी.

•    उन्हें बांग्लादेश सरकार ने वर्ष 2015 में फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड से नवाजा था. यह अवार्ड उन्हें  वर्ष 1971 में पाकिस्तान से स्वतंत्रता प्राप्त करने में बांग्लादेश की मदद करने के लिए दिया गया था. उस वक्त  वह लोकसभा के सदस्य‍ थे.

•    पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को वर्ष 2015 में मध्य‍ प्रदेश के भोज मुक्त विद्यालय ने भी डी लिट की उपाधि दी थी.

•    उन्हें वर्ष 1994 में श्रेष्ठ सांसद के पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.

•    कानपुर विश्वविद्यालय ने वर्ष 1993 में उन्हेंं डी लिट की उपाधि से सम्मानित किया था.

•    उन्हें  वर्ष 1992 में पद्म विभूषण के नागरिक सम्मा‍न से नवाजा गया था.

पोखरण में परमाणु परीक्षण:

पोखरण में 11 मई और 13 मई 1998 को पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट कर अटल बिहारी वाजपेयी ने सभी को चौंका दिया था. यह भारत का दूसरा परमाणु परीक्षण था. इससे पहले वर्ष 1974 में पोखरण 1 का परीक्षण किया गया था. दुनिया के कई संपन्न देशों के विरोध के बावजूद अटल सरकार ने इस परीक्षण को अंजाम दिया था, जिसके बाद अमेरिका, कनाडा, जापान और यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह की रोक भी लगा दी थी जिसके बावजूद अटल सरकार ने देश की जीडीपी में बढ़ोतरी की. पोखरण का परीक्षण अटल बिहारी वाजपेयी के सबसे बड़े फैसलों में से एक था.

कारगिल युद्ध:
पाकिस्तानी सेना और उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया था. अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया था. इस युद्ध में प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण भारतीय सेना को जान माल का काफी नुकसान हुआ था और पाकिस्तान के साथ शुरु किए गए संबंध सुधार एकबार फिर शून्य हो गया था.

संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में हिंदी में भाषण:

वर्ष 1977 में मोरार जी देसाई की सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे, वे तब पहले गैर कांग्रेसी विदेश मंत्री बनें थे. इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया था और दुनियाभर में हिंदी भाषा को पहचान दिलाई. हिंदी में भाषण देने वाले अटल भारत के पहले विदेश मंत्री थे. पहली बार यूएन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की राजभाषा गूंजी थी. इतना ही नहीं भाषण खत्म होने के बाद यूएन में आए सभी देश के प्रतिनिधियों ने खड़े होकर अटल बिहारी वाजपेयी का तालियों से स्वागत किया था.

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