Search

भारत का पर्यावरण संरक्षण पहल : प्रभाव विश्लेषण

यद्यपि भारत द्वारा 1985 में पहले से ही नीतिगत रूपरेखा में पर्यावरणीय पहलुओं को शामिल किया गया. पिछले दशक में विशेष रूप से 2014 से  केंद्र सरकार द्वारा सक्रिय पर्यावरण संरक्षण पहल की गई है. इसका स्पष्ट उदाहरण कई स्रोतों से पर्यावरण को बढ़ते खतरों से निपटने में मदद मिल सके, इस धारणा से पूर्ववर्ती पर्यावरण और वन मंत्रालय का नाम बदलकर अब पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय किया जाना है.

Sep 25, 2017 09:28 IST
facebook IconTwitter IconWhatsapp Icon

यद्यपि भारत द्वारा 19 85 में पहले से ही नीतिगत रूपरेखा में पर्यावरणीय पहलुओं को शामिल किया गया. पिछले दशक में विशेष रूप से 2014 से  केंद्र सरकार द्वारा सक्रिय पर्यावरण संरक्षण पहल की गई है. इसका स्पष्ट उदाहरण कई स्रोतों से पर्यावरण को बढ़ते खतरों से निपटने में मदद मिल सके, इस धारणा से पूर्ववर्ती पर्यावरण और वन मंत्रालय का नाम बदलकर अब पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय किया जाना है.

अतः इस पृष्ठभूमि में पर्यावरणीय चुनौतियों और इससे निपटने के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए क़दमों तथा उसके परिणाम और नए सक्रिय दृष्टिकोणों को समझना अति आवश्यक है

पर्यावरणीय मुद्दों से निपटने के लिए अपनाए गए नए तरीके हैं -

सरकारी निजी कंपनियों की भागीदारी :

 पहले, अकेले सरकार ही पर्यावरण संरक्षण उपायों के वित्तपोषण और निष्पादन के लिए जिम्मेदार थी. पिछले तीन वर्षों में  निजी क्षेत्र में उपलब्ध पूंजी,प्रौद्योगिकी और मानव संसाधनों का लाभ उठाने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) पर जोर दिया गया. उदाहरण के लिए पीपीपी मॉडल वन संरक्षण के लिए अपनाया गया था. इस पहल के तहत इसमें भाग लेने वाली कंपनियों को वाणिज्यिक उद्देश्यों और पुनर्नवीनीकरण उपायों को शुरू करने के लिए नए विकसित वन उपज का उपयोग करने की अनुमति प्रदान की गयी.

पीपीपी मॉडल वन संसाधनों और खजाने के अनियंत्रित उपयोग पर नियन्त्रण तथा वन उत्पादन का कम आयात सुनिश्चित करता है.

प्रौद्योगिकी का उपयोग :

 उद्योगों के प्रदूषण की वास्तविक समय पर निगरानी, ​​प्राकृतिक संसाधनों और वन्यजीवों की स्थिति और शिकायतों को दूर करने के लिए जानकारी आदि में संचार प्रौद्योगिकी से काफी हद तक फायदा हुआ है. वनों और जल निकायों की निगरानी के लिए उपग्रहों की तैनाती, एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली पर वेब आधारित आवेदन, गहरे जंगलों में निगरानी के लिए ड्रोनों की तैनाती, वन्यजीव जनगणना के लिए कैमरे के जाल का उपयोग, पर्यावरण प्रबंधन में प्रौद्योगिकी के उपयोग को दर्शाता है.

सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग :

 इसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर सहयोग शामिल है. संयुक्त राज्य अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों के साथ अक्षय ऊर्जा संसाधनों पर द्विपक्षीय समझौतों और एमओयू पर हस्ताक्षर आदि इसके मुख्य उदाहरण हैं. यूएनएफसीसीसी को लक्षित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (आईएनडीसी) प्रस्तुत करने और 2 अक्टूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते का अनुसमर्थन तथा भारत द्वारा 121 देशों से जुड़े अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का शुभारंभ,वैश्विक स्तर पर इसके नेतृत्व की भूमिका का संकेत देता है.

नियमों का समय पर संशोधन :

 पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करने के लिए नीतिगत वातावरण अब गतिशील हो गया है. 2016 में ई-वेस्ट, प्लास्टिक अपशिष्ट, ई-वेस्ट, कन्स्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन, अपशिष्ट और बायोमेडिकल वेस्ट के प्रबंधन के लिए अलग-अलग नोटिफिकेशन जारी करने से संबंधित नियमों को जारी करने से संकेत मिलता है कि दशकों से लंबित ईको-सिस्टम की निति को बदलने के पहल की शुरुआत हो गयी है.

प्रक्रियात्मक सुधार :

 प्रक्रियात्मक सुधार का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाने, पर्यावरण मंजूरी में लाल फीताशाही को रोकने और निर्णय लेने में विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया को लागू करना है. तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) क्लीयरेंस प्राप्त करने के लिए वेब पोर्टल का प्रक्षेपण, इस सुधार का परिणाम है.

व्यापक-प्रचार अभियान :

 इससे पहले पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरूकता फैलाने में केवल सरकारी एजेंसियां ​​शामिल थीं लेकिन  पिछले कुछ वर्षों में  चिंतन शिविर, स्कूल नर्सरी कार्यक्रम और जलवायु परिवर्तन विशेष एक्सप्रेस जैसे पहल के साथ साथ  सरकार पर्यावरण संरक्षण में नागरिक समाज और स्कूल के बच्चों और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी को सफलतापूर्वक बढ़ा रही है .

पर्यावरण संरक्षण उपायों का प्रभाव विश्लेषण

हाल ही में किये गए पर्यावरण संरक्षण उपायों के प्रमुख प्रभाव हैं -

वन कवर:

दिसंबर 2015 में जारी किये गए  भारत राज्य वन रिपोर्ट (आईएसएफआर) 2015 के अनुसार, देश के कुल वन क्षेत्र में दो साल में 3, 775 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है. परिणाम स्वरुप कुल जंगल और वृक्ष कवर 79.42 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 24.16 प्रतिशत है.

वन्यजीव आबादी :

 2016 में वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड और ग्लोबल टाइगर फोरम द्वारा जारी अनुमान के अनुसार, 2010 में जंगली बाघों की संख्या 3200 थी जो अब बढ़कर लगभग 3,8 9 0 हो गई है. यह एक अच्छा संकेत है क्योंकि बाघ की आबादी को प्रजातियों और वन्यजीव आबादी की स्थिति को मापने के लिए बेहतर पैरामीटर माना जाता है.

प्रदूषण के स्तर :

 कई उपायों के बावजूद भी  विभिन्न कारणों से हवा और जल प्रदूषण की गुणवत्ता बिगड़ती जा रही है. रिपोर्ट बताते हैं कि भारत का लगभग 80% सतही पानी प्रदूषित है तथा यहाँ की हवा की गुणवत्ता के सूचकांक में गिरावट अभी भी चिंता का कारण है और इस संबंध में मौजूदा नीतिगत उपायों को मजबूत करने की आवश्यकता है.

प्रशासनिक दक्षता :

 बड़े पैमाने पर प्रक्रियात्मक सुधारों और प्रौद्योगिकी की तैनाती के कारण हाल के वर्षों में प्रशासन के प्रदर्शन में सुधार हुआ है. परिणाम स्वरूप पिछले तीन वर्षों में पर्यावरण की मंजूरी देने के लिए आवश्यक औसत समय में 109 दिनों तक की गिरावट आई है.

निष्कर्ष

नए कानूनों को लागू करने और नई योजनाओं को लॉन्च करने के पहले के दृष्टिकोण के विपरीत  हाल के पर्यावरण पहलों में एक नई उर्जा देखने को मिली है जिसमें न केवल जलवायु परिवर्तन, वनों की जड़ें, वन्यजीव आदि की सुरक्षा जैसे मुद्दों को शामिल किया गया है, बल्कि इसमें नए पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के तरीके पर भी प्रकाश डाला गया है.

सरकार द्वारा नए सिरे से किए गए प्रयासों के बावजूद  पर्यावरणीय समस्याएं अभी भी कई कारकों जैसे कि बढ़ती आबादी, जीवाश्म-ईंधन आधारित औद्योगिकीकरण, नियमों और विनियमों के कार्यान्वयन में प्रभावहीनता के कारण ज्यों की त्यों बनी हुई हैं. अतः इस समय  सरकार, कॉर्पोरेट क्षेत्र और नागरिक समाज को एक साथ स्थायी और समावेशी विकास को प्राप्त करने के उद्देश्य से स्थायी वातावरण बनाने के लिए सम्मिलित प्रयास करना चाहिए.

Download our Current Affairs & GK app For exam preparation

डाउनलोड करें करेंट अफेयर्स ऐप एग्जाम की तैयारी के लिए

AndroidIOS