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राज्यसभा चुनावों में NOTA का इस्तेमाल नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

Aug 21, 2018 11:48 IST

सुप्रीम कोर्ट ने 21 अगस्त 2018 को एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्यसभा चुनावों में नोटा (NOTA)  का उपयोग नहीं किया जायेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला गुजरात कांग्रेस के चीफ व्हिप शैलेश मनुभाई परमार की याचिका पर सुनाया है. इस मामले की सुनवाई के दौरान कांग्रेस के साथ एनडीए ने भी राज्यसभा चुनाव में नोटा का विरोध किया था.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

•    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्यसभा चुनाव में नोटा का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

•    कोर्ट का मानना है कि नोटा को केवल प्रत्यक्ष चुनाव में ही लागू किया जाना चाहिए.

•    सुप्रीम कोर्ट के अनुसार राज्यसभा चुनावों में नोटा के प्रयोग की अनुमति नहीं है.

•    गुजरात कांग्रेस नेता शैलेष मनुभाई परमार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नोटा को प्रकाश में लाने वाला 2013 का फैसला राज्यपसभा चुनावों पर लागू नहीं होता है.

•    सुप्रीम कोर्ट ने 30 जुलाई को गुजरात कांग्रेस की याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था.

•    नोटा का इस्तेमाल वहीं इस्तेमाल होगा जहां प्रतिनिधि जनता के द्वारा सीधे चुने जाते हैं लेकिन राज्यसभा में इसका इस्तेमाल नहीं हो सकता क्योंकि यहां प्रतिनिधि प्रत्यक्ष तौर पर नही चुने जाते.

नोटा क्या है?

नोटा का शाब्दिक अर्थ है, नन ऑफ़ द अबव अर्थात् उपरोक्त में से कोई नहीं. यदि मतदाता किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं देना चाहता तो वह नोटा का बटन दबा सकता है. भारत में नोटा पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 2013 में दिये गए एक आदेश के बाद शुरू हुआ.  

पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जनता को मतदान के लिये नोटा का भी विकल्प उपलब्ध कराया जाना चाहिए. इस आदेश के बाद भारत नकारात्मक मतदान का विकल्प उपलब्ध कराने वाला विश्व का 14वाँ देश बन गया.


पृष्ठभूमि

वर्ष 2013 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिस प्रकार प्रत्येक मतदाता को वोट डालने का अधिकार है उसी तरह उसे किसी को भी वोट ना देने का अधिकार भी है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश सभी चुनावों को लेकर है.

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले का पालन करते हुए राज्यसभा चुनाव में NOTA का इस्तेमाल करना शुरू किया था. यदि वे राज्यसभा चुनाव में NOTA का इस्तेमाल शुरू नहीं करता तो यह अदालती आदेश की अवहेलना और अदालत की अवमानना का मामला बन सकता था.

 

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