कक्षा तीन में पढ़ाई छोड़ने वाले कवि हलधर नाग पदम् श्री से सम्मानित

ओड़िसा में उन्हें लोक कबी रतन के नाम से जाना जाता है, उन्होंने 20 महाकाव्य एवं कई कविताएं लिखी हैं. उन्हें अपने द्वारा लिखी सभी रचनाएं कंठस्थ हैं एवं वे किसी भी गद्य को सुना सकते हैं.

Created On: Apr 1, 2016 08:20 ISTModified On: Apr 1, 2016 08:25 IST

कोसली भाषा के कवि, 66 वर्षीय, हलधर नाग मार्च 2016 में चर्चा में रहे. वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा 28 मार्च 2016 को पदम् श्री प्राप्त करने के बाद चर्चा में आये.

उन्हें साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में उनके योगदान के लिए देश का तीसरा सबसे बड़ा सम्मान दिया गया.

हलधर नाग

•    ओड़िसा में उन्हें लोक कबी रतन के नाम से जाना जाता है, उन्होंने 20 महाकाव्य एवं कई कविताएं लिखी हैं. उन्हें अपने द्वारा लिखी सभी रचनाएं कंठस्थ हैं एवं वे किसी भी गद्य को सुना सकते हैं.
•    उन्होंने वर्ष 1990 में अपनी पहली कविता ‘धोडो बारगछ’ (बरगद का पुराना वृक्ष) लिखी जो एक स्थानीय पत्रिका में प्रकाशित हुई. इस दौरान में स्कूली बच्चों के लिए स्टेशनरी एवं खाने-पीने की वस्तुएं बेचा करते थे.
•    उन्होंने उस पत्रिका को चार और रचनाएं भेजी जो प्रकाशित हो गयीं.
•    ओड़िसा में वर्ष 1950 में एक निर्धन परिवार में जन्मे हलधर नाग केवल कक्षा तीन तक ही पढ़ सके.
•    पांच विद्वानों ने उनकी रचनाओं पर पीएचडी की है.
•    वे अधिकतर प्रकृति, समाज, धर्म एवं पौराणिक कथाओं पर लिखते हैं. वे अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के शोषित एवं दबे कुचले लोगों की भावनाओं को भी व्यक्त करते हैं.
•    संबलपुर यूनिवर्सिटी उनके द्वारा लिखित रचनाओं को हलधर ग्रंथावली-2 नाम से प्रकाशित करने जा रही है. यह ग्रंथावली यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम का ही हिस्सा होगी.

कोसली भाषा

इसे संबलपुरी के नाम से भी जाना जाता है जो ओड़िसा के पश्चिमी भाग में बोली जाती है. यह उस समय अस्तित्व में आई जब 1891 में एक साप्ताहिक पत्रिका ‘संबलपुर हितेसानी’ द्वारा इसे प्रकाशित किया गया. इसे मधुसुदन द्वारा ‘संबलपुर आंचलर प्राचीन कबिता’ शीर्षक से प्रकाशित की गयी.

वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार कोसली, उड़िया के अंतर्गत एक मातृभाषा के रूप में वर्गीकृत है.

कोसली भाषा आन्दोलन

कोसली भाषा के विस्तार हेतु समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा पश्चिमी ओड़िसा (कोसल) में पिछले पांच दशकों से अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान को आन्दोलन माना गया क्योंकि वे इसे भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं.

इस आन्दोलन में प्रयाग दत्ता जोशी, नीलाम्बधाब पनीघड़ी एवं अन्य का महत्वपूर्ण योगदान है.

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