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हरिवंश नारायण राज्यसभा के उपसभापति बने

Aug 9, 2018 11:51 IST

संसद के उच्च सदन अर्थात राज्य सभा के उपसभापति पद के लिए 09 अगस्त 2018 को चुनाव में हरिवंश नारायण ने जीत दर्ज की. इन चुनावों में एनडीए की ओर से जनता दल यूनाइटेड के सांसद हरिवंश नारायण उम्मीदवार थे जबकि विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार के तौर पर बीके हरिप्रसाद को मैदान में उतारा गया था.

हरिवंश नारायण को 125 वोट प्राप्त हुए जबकि विपक्ष के उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को 105 मत प्राप्त हुए. गौरतलब है कि पी.जे. कुरियन द्वारा जुलाई में सेवानिवृत्त होने के बाद से उप-सभापति का पद रिक्त था. यूपीए और एनडीए के बीच इस चुनाव को लेकर कड़ी टक्कर थी.

राज्यसभा के उपसभापति की शक्तियां

•    राज्यसभा में सभापति के न होने पर उपसभापति राज्यसभा का कार्यभार संभालते हैं.

•    अध्यक्ष अथवा उपसभापति सदन की अध्यक्षता करता है, उसका काम नियमों के हिसाब से सदन को चलाना होता है.

•    उपसभापति किसी भी राजनीतिक पार्टी का पक्ष नहीं ले सकता.

•    सदन में हंगामा होने या किसी भी और कारण से सदन को स्थगित करने का निर्णय भी अध्यक्ष अथवा उपसभापति ले सकता है.

•    किसी सदस्य के इस्तीफा को मंज़ूर या नामंज़ूर करने का अधिकार अध्यक्ष अथवा उपसभापति को होता है.

राज्यसभा समीकरण

उपसभापति उम्मीदवार को जीत के लिए मौजूदा 244 सांसदों में से 123 सदस्यों का समर्थन जरूरी था. राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के 73 सांसद हैं. सहयोगी जदयू के 6, शिवसेना के 3 और अकाली दल के 3 सांसद हैं. सदन में कांग्रेस की संख्या 50 है.


हरिवंश नारायण के बारे में जानकारी

•    हरिवंश नारायण जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के राज्यसभा सांसद हैं.

•    उनका जन्म 30 जून 1956 को बलिया के सिताबदरिया में हुआ था.

•    हरिवंश ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक और पत्रिकारिता में डिप्लोमा किया है

•    वे वर्ष 1981 में ‘धर्मयुग’ के उप-संपादक रहे.

•    हरिवंश पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार भी रह चुके हैं.

•    हरिवंश बिहार से राज्यसभा के लिए चुने गये थे और इन्हें नितीश कुमार का करीबी भी माना जाता है.

राज्यसभा उपसभापति चुनाव प्रक्रिया

•    कोई भी राज्यसभा सांसद इस संवैधानिक पद के लिए अपने किसी साथी सांसद के नाम का प्रस्ताव आगे बढ़ा सकता है.

•    इस प्रस्ताव पर किसी दूसरे सांसद का समर्थन भी जरूरी है. इसके साथ ही प्रस्ताव को आगे बढ़ाने वाले सदस्य को सांसद द्वारा हस्ताक्षरित एक घोषणा प्रस्तुत करनी होती है जिनका नाम वह प्रस्तावित कर रहा है.

•    इसमें इस बात का उल्लेख रहता है कि निवार्चित होने पर वह उपसभापति के रूप में सेवा करने के लिए तैयार हैं.

•    प्रत्येक सांसद को केवल एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाने या उसके समर्थन की अनुमति है.

•    यदि किसी प्रस्ताव में एक से अधिक सांसदों का नाम हैं तो इस स्थिति में सदन का बहुमत तय करेगा कि कौन राज्यसभा के उपसभापति के लिए चुना जाएगा.

•    यदि सभी राजनीतिक दलों में किसी एक सांसद के नाम को लेकर आम सहमति बन जाती है, तो इस स्थिति में सांसद को सर्वसम्मति से राज्यसभा का उपसभापति चुन लिया जाएगा.

 

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