भारत में कृषि कर:अच्छा या बुरा ?

हाल ही में, नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि भारत में कृषि क्षेत्र को आयकर के दायरे में लाना चाहिए.यह एक संवेदनशील मुद्दा है. हमने यहाँ इस मुद्दे से जुड़े सभी पहलुवो का विश्लेषण करने की कोशिश की है.

Created On: May 24, 2017 12:33 ISTModified On: May 24, 2017 12:34 IST

भारत में कृषि कर नीति आयोग ने यह सुझाव दिया है कि कृषि आय को व्यकितगत आय के कर क्षेत्र में लाना चाहिए ताकि कर की चोरी में रोक लगाई जा सके.  आयोग की बैठक के दौरान यह सहमति हुई कि गैर-कृषि चीजें टैक्स चोरी करने के लिए एक आड़ की तरह इस्तेमाल की जाती है.
वर्तमान में, सारी कृषि आय व्यक्तिगत  आय के दाय्ररे से बाहर हैं. इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य  किसानों की सहायता करना है परन्तु समय समय पर गैर-कृषि सत्ताओं द्वारा अपनी आय के स्रोत की कृषि क्षेत्र का बताकर इसका इस्तेमाल टैक्स चोरी करने के लिए किया जाता है. इसीलिए इन कमियों की भरपाई करके काले धन के उत्पादन में कमी लायी जा सकती है. और यह बारीकी के साथ कृषि आय को कर क्षेत्र में लाके क्रियान्वयित किया जा सकता है.
उदाहरण के लिए, मूल्यांकन वर्ष 2014-15 में कृषि क्षेत्र के शीर्ष 10 कर में छूट के 9 मामले कॉर्पोरेट से जुड़े थे,जब की दसवां मामला एक राज्य सरकार का विभाग था.
इसके आलवा, 2011-12 और  2012-13 में कृषि आय से जुड़े कई मामलों में अनियमितता पाई गई. इसीलिए यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है की कृषि आय को व्यकितगत आय की तरह कर क्षेत्र में कैसे लाया जाये?

 कृषि कर क्यों जरूरी है ?

आरबीआई की रिपोर्ट यह दिखाती है कि इस वक़्त देश में 225 मिलियन परिवार हैं जिसमे से 66 प्रतिशत परिवार ग्रामीण क्षेत्र में हैं. जबकि ग्रामीण भारत व्यक्तिगत कर क्षेत्र के दायरे से बाहर है.
आदर्शरूप से, दस्तावेजों में शहरी तथा ग्रामीण इलाकों में कोई कृत्रिम अंतर नहीं होना चाहिए. इसीलिए व्यकितगत आय के ऊपर कर के जो आधार शहरी क्षेत्रो में हैं वो ही ग्रामीण क्षेत्रों में होने चाहिए.
नीति आयोग ने यह योजना बनाई है कि राजकोषीय घाटे को 2018-19  तक 3% किया जाये तथा राजस्व घाटे को  2019-20. तक जीडीपी का 0.9% किया जाये. इसके लिए भारत में करों के दायरों को बढाने की जरूरत है.
कृषि आय को कर क्षेत्र में लाना ठीक वैसा होना चाहिए जैसा किसी भी आर्थिक गतिविधि को कर क्षेत्र में लाना होता है. इसके अलावा भारत में कृषि आय को कर क्षेत्र से बाहर रखने के अधिकतर कारण भावनात्मक हैं. इन कारणों का मुख्य तर्क यह होता है कि अधिकांश कृषि क्षेत्र सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित है इसीलिए इसे कर क्षेत्र में नहीं लाना चाहिए. यह तर्क उन क्षेत्रो के बारे में भी दिया जा सकता है जहां आय बहुत कम है.
यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि अगर भारत में कृषि आय कर को लागू किया जा सकता है तो या मुख्य रूप से राज्य सरकारों का काम होगा. भारत का संघीय संरंचना केंद्र सरकार को इसकी अनुमती नहीं देगा.
कृषि क्षेत्र में कर के लिए  योग्य लोगों की पहचान करना मुश्किल काम होगा क्योंकि कृषि क्षेत्र से जुड़े अधिकतर लोग भूमि रहित मजदूर हैं.
 कृषि क्षेत्र में कुल 120 मिलियन संभावित निर्धारितियाँ हैं  तो उनकी पहचान कर पाना एक कठिन चुनौती होगी.

भारत में कृषि कर  का इतिहास

1925 में, भारतीय कराधान जांच समिति ने यह निरीक्षण किया कि कृषि क्षेत्र से जुड़ी आय को करों से दूर रखने के पीछे कोई ऐतिहासिक और सैद्दांतिक औचित्य नहीं है. हालांकि इसके राजनीतिक और प्रशासनिक कारण हैं. इसके लगभग एक सौ साल बाद भी इस निरीक्षण के दोनों पहलों सच लगते हैं.
वर्तमान में भारत में 6 राज्यों में कृषि क्षेत्र में कर से जुड़े कानून हैं. ये राज्य केरल , तमिलनाडु, आसाम, बिहार, पशिमी बंगाल तथा उडीशा हैं. परन्तु इस कानून का क्रियान्वयन हर राज्य में अलग अलग है.कही कही कर केवल वृक्षारोपण से अर्जित आय में लगाता जाता है किसी राज्य में कहीं भी नहीं लगाया जाता.

कुछ अन्य राज्य जैसे राजस्थान तथा उत्तरप्रदेश ने अपने कृषि कर से सम्बंधित कानूनों को कई सालों से निग्रह करके रखा है.
भारत में कृषि कर में सुधार 1947 से होता आया है. तब संवैधानिक सभा ने राज्यों से इस मुद्दे पर तुरंत कार्यवाही करने के लिए कहा था. 1972 में बनायी गई राज समिति ने  कृषि धन तथा आय से सम्बंधित एक रिपोर्ट तैयार की जो कृषि कर के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट मानी जाती है.
2002, में विजय केलकर समीति ने भी इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट दी थी तथा केंद्र सरकार से कृषि कर से जुड़े क़ानून बनाने की सिफारिश की थी.
और वर्तमान में , प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में कर से जुड़े प्रसाशनिक अधिकारियों से एक  सभा की जिसमे प्रसाशनिक अधिकारियों ने टैक्स कर के मुद्दों का जिक्र किया.
निष्कर्ष
यह स्पष्ट है कि सरकार कृषि क्षेत्र को अन्य क्षेत्रों की तरह आयकर के अधीन लाने के लिए प्रयासरत है. परन्तु सरकार को इस मामले उचित सावधानी तथा अविलम्बिता बरतने की जरूरत है.
इस दिशा में कृषि क्षेत्र में किये जाने वाले सुधारों में कृषि आपूर्ति श्रंखला में व्याप्त कमियों को दूर करना एक मुख्य कार्य होगा. ऐसे सुधार महत्वपूर्ण हैं अगर सरकार कृषि को एक सतत इकाई बनाए रखना चाहती है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो उच्च आय किसानों के साधनों का  दूसरे  क्षेत्रों  में स्थानान्तरण हो जायेगा. जो कृषि के लिए अच्छा नहीं है. और गरीब किसानों के लिए चुनौती तैयार किये बगैर कृषि क्षेत्र की बाकी समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता. इस प्रसंग में, ऐतिहासिक रूप से कृषि क्षेत्र से अन्य क्षेत्रो में मजदूरों तथा अन्य साधनों के स्थानांतरण को नजर में रखना जरूरी है जो बहुत कम है. इसके अलावा कृषि मजदूरों को दुसरे क्षेत्रो में रोजगार मिलने की बहुत नगण्य संभावनो को भी परखने की जरूरत है. इसीलिये  नीति निर्माताओं को कृषि को कर क्षेत्र में लाने की दिशा में  सावधानी पूर्वक चलने की जरूरत है.

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