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परमाणु हथियारों के निषेध पर संयुक्त राष्ट्र संधि : विश्लेषण

परमाणु हथियारों के निषेध पर संयुक्त राष्ट्र संधि वैश्विक निशस्त्रीकरण की दिशा में एक आदर्श बदलाव को रेखांकित करती है.

Aug 11, 2017 16:04 IST
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7 जुलाई 2017 को संयुक्त राष्ट्र ने परमाणु हथियारों के निषेध पर  की गयी संधि के शर्तों को अपनाया. परमाणु हथियारों को व्यापक रूप से समाप्त करने के लिए यह पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी  अंतर्राष्ट्रीय समझौता है.
उन राष्ट्रों के लिए जो इस संधि में शामिल हैं, उनके विकास, परीक्षण, उत्पादन आदि गतिविधियों पर रोक लगाई गई है. इसके अतिरिक्त यह संधि उपर्युक्त निषिद्ध गतिविधियों में सहायता करने और प्रोत्साहन देने को भी प्रतिबंधित करती है. अतः आज के दौर में भारत सहित विभिन्न राष्ट्रों पर इस संधि के प्रभाव तथा उसकी प्रतिक्रिया को समझना आवश्यक है.

संधि की अहमियत

संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस ऐतिहासिक समझौते को अपनाने से निम्नलिखित कारणों से इस संधि का वैश्विक स्तर पर बहुत अधिक महत्व है.

• यह परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए पहला बहुपक्षीय कानूनी रूप से बाध्यकारी साधन है. जिन देशों ने संधि पर हस्ताक्षर किया और उसकी पुष्टि की है, उन्हें संधि के प्रावधानों का पालन करना चाहिए. उल्लंघन के मामले में अपराध करने वाले देशों को संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित किया जायेगा.

• परमाणु हथियारों के निषेध पर संयुक्त राष्ट्र संधि वैश्विक निशस्त्रीकरण की दिशा में एक आदर्श बदलाव को रेखांकित करती है. संधि ने परमाणु हथियारों के एक दूसरे से खतरों के खिलाफ राज्यों द्वारा निवारक के रखरखाव पर संकीर्ण फोकस के कारण परमाणु हथियारों के कुल उन्मूलन के सार्वभौमिक लक्ष्य को अलग कर दिया है.

• इस संधि में व्यापक रूप से इन सभी पहलुओं को शामिल किया गया है - विकास, परीक्षण, उत्पादन, भंडारण, स्टेशनिंग, स्थानांतरण, उपयोग और परमाणु हथियारों से संबंधित उपयोग के खतरे आदि. पहले के प्रस्तावित समझौते  जैसे गैर परमाणु हथियार संधि (एनपीटी) और व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) के इन सभी पहलुओं को इसमें शामिल नहीं किया गया है.

• संधि के अनुच्छेद 1 के तहत यह परिकल्पना की गई है कि भूमिगत विस्फोटों के संचालन के  परीक्षणों का पता लगाना कहीं अधिक मुश्किल है.

• संधि का सबसे मुख्य प्रावधान है- अनुच्छेद 1 (डी). यह सभी परिस्थितियों में  परमाणु हथियारों के उपयोग या उसके प्रभाव के खतरे को स्पष्ट रूप से निषिद्ध करता है. इस प्रावधान को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) के सलाहकार की राय के आधार पर संधि में शामिल किया गया था, जिसमें कहा गया है कि घातक हथियारों का उपयोग, या यहां तक कि उपयोग करने की धमकी आम तौर पर अवैध थी.

• पिछले संधियों के विपरीत, यह परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के नैतिक आयाम तक ही सीमित नहीं है. इसका लक्ष्य इस ग्रह पर मानव जीवन को संरक्षित करना है. संधि के प्रावधान सभ्यता के अस्तित्व को समाप्त करने वाले प्रलय की तरह संभावित खतरे वाली घटना पर आधारित हैं.

• संधि जैविक और रासायनिक हथियारों के निषेध के बाद सामूहिक विनाश के सभी प्रकार के हथियारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध को लागू करने के लिए एक प्रक्रिया को पूरा करने का संकेत देती है. जैविक हथियार सम्मेलन 1975 में लागू हुआ था. रासायनिक हथियार सम्मेलन 1997 में लागू हुआ था.

संधि की प्रतिक्रिया

इस संधि को  122  वोट से (नीदरलैंड्स) के खिलाफ एक के पक्ष में और एक अपवाद (सिंगापुर) के साथ अपनाया गया था. हालांकि, 9 देशों, जिन्हें आम तौर पर परमाणु हथियार सम्पन्न शक्ति के रूप में पहचाना जाता है- अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजरायल इस वार्ता से अनुपस्थित थे. इसके अतिरिक्त नाटो के एक सदस्य एवं  एक महत्वपूर्ण सुरक्षा समूह  ने इस कार्यवाही में भाग नहीं लिया.
पी 5 देशों ने घोषणा की कि संधि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा माहौल की वास्तविकताओं को स्पष्ट रूप से नकारती है तथा यह संधि परमाणु प्रतिरोध की वर्तमान नीति के साथ असंगत है, जो पिछले 70 वर्षों से पूरे विश्व में शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है.

संधि के प्रति भारत की प्रतिक्रिया

अक्टूबर 2016 में इसके पूर्ववर्ती प्रस्ताव में अपने वोट देने के स्पष्टीकरण (ईओवी) में भारत ने कहा कि यह "आश्वस्त नहीं" था कि प्रस्तावित सम्मेलन परमाणु निरस्त्रीकरण के एक व्यापक साधन के रूप में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की पुरानी उम्मीदों को दूर कर सकता है.

भारत ने आगे कहा कि निस्संदेह जिनेवा स्थित सम्मेलन एकल बहुपक्षीय निरस्त्रीकरण वार्ता मंच है. सीडी निस्संदेह अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा बहुपक्षीय हथियार नियंत्रण और समझौते पर बातचीत करने के लिए स्थापित एक मंच है. वर्तमान में 65 सदस्यों  की संख्या वाला  जैविक हथियार सम्मेलन और रासायनिक हथियार सम्मेलन पर  बातचीत करने के लिए 1979  में स्थापित  यह अपने सदस्य राज्यों द्वारा उपयोग किया जाने वाला मंच था.

निष्कर्ष

यह संधि 20 सितंबर 2017 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सभी राज्यों के हस्ताक्षर के लिए खुली होगी और कम से कम 50 देशों द्वारा इसकी स्वीकृति के 90 दिन बाद यह लागू हो जाएगा. संधि के विषय में होने वाली प्रतिक्रिया के कारण, यह आशा की जाती है कि यह 2017 के अंत तक यह लागू होगा. हालांकि, संधि का विरोध करने वाले नौ देशों द्वारा इसका प्रभाव खतरे में पड़ सकता है.

नई संधि के लिए समर्थन वर्षों में तेजी से बढ़ता है और अंत में वह एक कानूनी बाध्यता का आकार ले लेता है.यद्यपि रासायनिक और जैविक हथियारों पर सम्मेलनों की पुष्टि की गई और बहुत अधिक प्रयास किए बिना इसे लागू किया गया. परमाणु समझौते को लेकर संधि 7 दशकों से बड़ी ट्रिकी रही है. पी 5 देशों और अन्य परमाणु सम्पन्न राज्यों के प्रतिनिधियों को इस मौके पर किसी भी हालत में मौजूद रहना चाहिए.

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