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अर्थव्यवस्था

General Knowledge for Competitive Exams

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कृषि और ग्रामीण विकास के लिए नीतियां: एक अवलोकन

May 4, 2016
कृषि उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने हेतु राज्यों के प्रयासों में सुधार और दक्षता लाने के लिए 2008 में कृषि मैक्रो मैनेजमेंट (एमएमए) 2008 में संशोधन किया गया। किसानो को अधिक खाद्यान्न के उत्पादन के लिए प्रेरित करने हेतु केंद्र सरकार ने 1966-1967 से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP Policy) नीति की शुरूआत की है । यह नीति प्रत्येक फसल के लिए किसानों को न्यूनतम मूल्य की गारंटी देती है। दूसरी ओर, सरकार ने ग्रामीण गरीबों के लिए महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) जैसी योजनाओं की शुरूआत की है।

मौद्रिक नीति का अवलोकन

May 2, 2016
मौद्रिक नीति एक नियामक नीति है जिसके तहत केंद्रीय बैंक (भारत के मामले में आरबीआई) पैसे की आपूर्ति सामान्य आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए करता है। भारत में मुद्रा की आपूर्ति भारतीय रिजर्व बैंक करता है । सिक्के, वित्त मंत्रालय द्वारा ढालवाये जाते हैं लेकिन उनकी आपूर्ति भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा की जाती है। मौद्रिक नीति के मुख्य कारक हैं: नकद आरक्षित अनुपात, सांविधिक तरलता अनुपात, बैंक दर, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर और खुले बाजार के परिचालन।

बीज की अधिक उपज वाली किस्में

Apr 29, 2016
बीज की अधिक उपज वाली किस्में (HYV बीज) सामान्य गुणवत्ता के बीज की तुलना में बेहतर होती हैं। इन बीजों से उत्पादन सामान्य बीजों की तुलना में अधिक होता है। इस प्रकार के बीज स्वस्थ और अधिक फसल प्राप्त करने के लिए बीजों का एक बेहतर विकल्प हैं। इन बीजों में कीड़ों और अन्य रोगों से लड़ने के लिए एक बेहतर प्रतिरक्षा प्रणाली होती है। इन बीजों की एक और विशेषता होती है वो यह है कि इन बीजों को सिंचाई की कम जरूरत होती है। इन बीजों का भारत की हरित क्रांति में एक बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

मुद्रा की आपूर्ति और मुद्रास्फीति के बीच सम्बन्ध

Apr 28, 2016
बाजार में पैसे की आपूर्ति (भारत के मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) किसी भी देश के केंद्रीय बैंक की जिम्मेदारी होती है । भारतीय रिजर्व बैंक, अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति के लिए करेंसी छपवाती है। सिक्के, वित्त मंत्रालय द्वारा विभिन्न टकसालों में ढलवाए जाते है लेकिन पूरे देश में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ही वितरित किए जाते हैं। अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति, मुद्रास्फीति की दर को निर्धारित करती है। पैसे की आपूर्ति अर्थव्यवस्था में जैसे- जैसे बढ़ती है उसी प्रकार मुद्रास्फीति भी बढ़ती जाती है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक

Apr 22, 2016
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2013 में संसद द्वारा पारित किया गया था। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, प्राथमिकता वाले परिवारों से संबंधित प्रत्येक व्यक्ति को हर माह में 7 किलो खाद्यान्न देने का प्रस्ताव है। जिसमें 3 रुपये प्रति किलो चावल, 2 रुपये किलो गेहूं और 1 रुपये किलो मोटा अनाज दिया जाता है। इस विधेयक के अनुसार सामान्य श्रेणी के परिवारों को 3 किलो खाद्यान्न प्रति व्यक्ति देने का प्रावधान है। इसका खाद्य सुरक्षा विधेयक का लाभ देश की 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को होगा।

राष्ट्रीय विकास परिषद

Apr 22, 2016
योजना के निर्माण में राज्यों की भागीदारी होनी चाहिए, इस विचार को स्वीकार करते हुए सरकार के एक प्रस्ताव द्वारा 6 अगस्त, 1952 ई० को राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन हुआ था । राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) एक कार्यकारी निकाय है ।यह ना ही संवैधानिक है और न ही एक सांविधिक निकाय है। यह देश की पंचवर्षीय योजनाओं का अनुमोदन करती है। प्रधानमंत्री, परिषद का अध्यक्ष होता है । भारतीय संघ के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री एवं योजना आयोग के सभी सदस्य इसके पदेन सदस्य होते हैं।

भारत में गरीबी और गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या

Apr 22, 2016
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी. रंगराजन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समीति के अनुसार गरीबी की परिभाषा इस प्रकार है, "ग्रामीण क्षेत्रों में 32 रुपया प्रतिदिन और कस्बों तथा शहरी क्षेत्रों में 47 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वाले लोगों को गरीब नहीं कहा जा सकता है।" रंगराजन समिति के अनुमान के अनुसार, 2009-10 के 29.8% के मुकाबले 2011-12 के दौरान गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या (बीपीएल) घटकर 21.9% रह गई थी जबकि 2004-05 के दौरान यह 37.2% फीसदी थी।

भारत में भूमि सुधार अथवा भू सुधार

Apr 18, 2016
देश की स्वतंत्रता के समय भूमि का स्वामित्व केवल कुछ ही लोगों के हाथों में केंद्रित था। इससे किसानों का शोषण बढ़ता गया और साथ ही साथ ग्रामीण आबादी के सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में भी यह एक प्रमुख बाधा बना रहा। भारत में भूमि सुधार कार्यक्रमों में मध्यस्थों का उन्मूलन, काश्तकारी सुधार, भूमि की चकबंदी तथा प्रति परिवार भूमि का निर्धारण और भूमिहीन लोगों के बीच अधिशेष भूमि वितरित करना शामिल था ।

भारत में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs)

Apr 18, 2016
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) देश की जीडीपी का लगभग 8 फीसदी, विनिर्माण उत्पादन का 45 प्रतिशत और निर्यात में 40 प्रतिशत योगदान देते हैं। ये उद्योग कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार प्रदान करने वाले हैं। ये उद्यमशीलता और नवीनता के लिए एक नर्सरी है। ये उद्यम देशभर में व्यापक रूप से फैले स्थानीय बाजारों की जरूरत को पूरा करते हैं। ये राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मूल्य की श्रृंखला को पूरा करने के लिए उत्पादों एवं सेवाओं की एक विविध रेंज का उत्पादन करते हैं। वर्तमान में एसएमई को एमएसएमई अधिनियम, 2006 के अनुसार परिभाषित किया जाता हैं।

उदारीकरण से पहले औद्योगिक विकास और नीति

Apr 4, 2016
आजादी के बाद पहली औद्योगिक नीति की घोषणा 6 अप्रैल 1948 को तत्कालीन केंद्रीय उद्योग मंत्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा की गई थी। इस नीति ने भारत में मिश्रित और नियंत्रित अर्थव्यवस्था के लिए एक आधार की स्थापना की थी। नई औद्योगिक नीति के प्रारंभ होने से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था 3.5% की हिंदू वृद्धि दर में उलझ गई थी। देश का आर्थिक परिदृश्य कुछ इस प्रकार का हो गया था: राजकोषीय घाटा बढ़ रहा था, मुद्रास्फीति तेजी से बढ़ रही थी और भुगतान संतुलन प्रतिकूल था। इसलिए अर्थव्यवस्था की समग्र स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी।

भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति या स्वभाव

Apr 1, 2016
आजादी के बाद से भारत की अर्थव्यवस्था एक 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' रही है। भारत के बड़े सार्वजनिक क्षेत्र 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' को सफल बनाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार रहे हैं । भारतीय अर्थव्यवस्था, मूल रूप से सेवा क्षेत्र (वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का 60% हिस्सा प्रदान करता है) के योगदान और कृषि (जनसंख्या के लगभग 53% लोग) पर निर्भर है । ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है वैसे-वैसे अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी कम हो रही है तथा सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ रही है।

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)

Apr 1, 2016
यह एक शीर्ष बैंकिग संस्था है जो कृषि और ग्रामीण विकास के लिए पूंजी उपलब्ध कराती है। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना 12 जुलाई, 1982 को 100 करोड़ रूपये की प्रदत्त धनराशि के साथ की गई थी। 2010 में नाबार्ड की प्रदत्त राशि 2,000 करोड़ रुपए पर पहुंच गई। यह ग्रामीण ऋण संरचना की एक शीर्ष संस्था है जो कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर एवं ग्रामोद्योग तथा हस्तशिल्प आदि को बढ़ावा देने के लिए ऋण उपलब्ध कराता है।

वैश्विक गरीबी परिदृश्य

Mar 30, 2016
गरीबी की अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक परिभाषा के तहत यदि एक व्यक्ति की आय एक डॉलर/ दिन से कम है तो उस व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे माना जाता है। इसकी गणना करते समय प्रत्येक देश की गरीबी की सीमा को ध्यान में रखा जाता है । प्रत्येक देश में गरीबी रेखा की गणना का आधार, एक वयस्क व्यक्ति को जीवित रहने के लिए आवश्यक वस्तुओं की जरूरत के आधार पर की जाती है और इसकी गणना डॉलर में की जाती है।अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा मूल रूप से 1 डॉलर प्रतिदिन विश्व बैंक द्वारा निर्धारित की गयी थी।

भारत के कृषि श्रमिकों का अवलोकन

Mar 25, 2016
कृषि मजदूर वह श्रमिक है, जो खेती से सम्बंधित कार्यों जैसे खेत जोतना ,फसल काटना, बागवानी करना, पशुओं को पालना, मधुमक्खियों और मुर्गी पालन के प्रबंधन और वन्य जीवन से जुडे कार्यों में लगा होता है। कृषि मजदूर असंगठित में क्षेत्र में आते हैं। भारत की लगभग 53% आबादी आज भी कृषि संबंधी गतिविधियों में शामिल है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का अवलोकन

Mar 23, 2016
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) का अर्थ सस्ती कीमतों पर खाद्य और खाद्यान्न वितरण के प्रबंधन की व्यवस्था करना है। गेहूं, चावल, चीनी और मिट्टी के तेल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों को इस योजना के माध्यम से सार्वजनिक वितरण की दुकानों द्वारा पूरे देश में पहुंचाया जाता है। इस योजना का संचालन उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण के मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस योजना का मुख्य मकसद सस्ती दरों पर देश के कमजोर वर्ग को खाद्यान्न उपलब्ध कराना है।

भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का अवलोकन

Mar 23, 2016
जैसा कि हम जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है। इसकी लगभग 55% जनसंख्या इस क्षेत्र में कार्यरत है। कृषि का भारतीय अर्थव्यस्था के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 14% योगदान है। लेकिन लगातार हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान घट रहा है। 1950 के दशक में हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान 53% प्रतिशत होता था जो वर्तमान में करीब 14% रह गया है। देश में निर्यात के क्षेत्र में कृषि का 10% हिस्सा है। देश की 1.26 अरब आबादी की खाद्य सुरक्षा कृषि पर निर्भर है।

1991 की नयी आर्थिक नीति

Mar 21, 2016
सारांश: जून 1991 में नरसिंह राव सरकार ने भारत की अर्थव्यवस्था को नयी दिशा प्रदान की । यह दिशा उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी मॉडल के रूप में जाना जाता है) के रूप में पूरे देश में आर्थिक सुधारों के रूप में लागू की गयी । इस नई औद्योगिक नीति के तहत सरकार ने कई ऐसे क्षेत्रों में निजी कंपनियों को प्रवेश करने की अनुमति दी, जो पहले केवल सरकारी क्षेत्रों के लिए आरक्षित थे। इस नई आर्थिक नीति को लागू करने के पीछे मुख्य कारण भुगतान संतुलन (BOP) का निरंतर नकारात्मक होना था।

उदारीकरण से पहले भारत की पंचवर्षीय योजनाएं

Mar 18, 2016
भारत में नियोजित आर्थिक विकास, पहली पंचवर्षीय योजना की स्थापना के साथ 1951 में शुरू हुआ था | पहली पंचवर्षीय योजना का मुख्य उद्देश्य देश में कृषि की हालत को सुधारना था क्योंकि कृषि पूरी अर्थव्यस्था का आधार है | दूसरी पंचवर्षीय योजना (महालनोबिस मॉडल पर आधारित) औद्योगिक विकास के लिए समर्पित थी | सन 1980 की अवधि तक भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 3.5% के आसपास थी (जिसे प्रोफेसर राज्कृष्णा द्वारा हिंदू विकास दर का नाम दिया गया था गया था) |

‘डिजिटल इंडिया कार्यक्रम’ भारत में क्या बदलाव लाएगा?

Mar 15, 2016
‘डिजिटल इंडिया कार्यक्रम’ भारत सरकार का फ़्लैगशिप कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज व ज्ञान अर्थव्यवस्था में बदलना है| ‘डिजिटल इंडिया कार्यक्रम’ की शुरुआत 1 जुलाई, 2015 को भारत के प्रधानमंत्री द्वारा की गयी थी| ‘डिजिटल इंडिया कार्यक्रम’ के तीन मुख्य घटक हैं- डिजिटल अवसंरचना का निर्माण करना, सेवाओं को डिजिटल रूप में प्रदान करना और डिजिटल साक्षरता |

वाणिज्यिक बैंकों का संचालन: एक आलोचनात्मक समीक्षा

Mar 11, 2016
वाणिज्यिक बैंक( वर्तमान में 27) देश की वित्तीय संस्थान प्रणाली का एक प्रमुख हिस्सा हैं । वाणिज्यिक बैंक वे लाभ कमाने वाले संस्थान हैं जो आम जनता से धन स्वीकार करते हैं और घरेलू, उद्यमियों, व्यवसायियों आदि जैसे व्यक्तियों को पैसे(ऋण) देते हैं | इन बैंकों का मुख्य उद्देश्य ब्याज, कमीशन आदि के रूप में लाभ कमाना है | इन सभी वाणिज्यिक बैंकों के कार्य भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा नियंत्रित किये जाते है, जोकि एक केंद्रीय बैंक है तथा भारत में सर्वोच्च वित्तीय नियोग है |

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