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एल निनो का सिद्धांत

पूर्वी प्रशांत महासागर में पेरू तट से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर सामान्य दिनों में पेरू की ठंडी जलधारा बहती है। कालांतर में इसमें बदलाव हो जाता है।ठंडी के बदले उष्ण जलधारा का आविर्भाव हो जाता है जिसके कारण जलवायु में प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है जिसको एलनिनो कहा जाता है। इसमें समुद्री सतह का तापमान बहुत बड़ी भूमिका निभाता है जिसका प्रभाव पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है।
Jul 15, 2016 09:49 IST
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पूर्वी प्रशांत महासागर में पेरू तट से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर सामान्य दिनों में पेरू की ठंडी जलधारा बहती है। कालांतर में इसमें बदलाव हो जाता है। ठंडी के बदले उष्ण जलधारा का आविर्भाव हो जाता है जिसके कारण जलवायु में प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है जिसको एल निनो (El Nino) कहा जाता है। इसमें समुद्री सतह का तापमान बहुत बड़ी भूमिका निभाता है जिसका प्रभाव पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है। यह एक समया अंतराल में चक्र के रूप में एल निनो (El Nino)  या दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) व ला निना (La Nina) के रूप में होता है। ये दोनों पूर्वी प्रशांत माहसागर पूर्वी क्षेत्र के उष्ण कटिबंधीय इलाके में समुद्री सतह पर बड़े परिवर्तन के लिए जिमेवार है। इसकी विसद् चर्चा के पहले यह जान लेना आवश्यक है कि अंतरा उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) व दक्षिणी दोलन क्या है।

उपरोक्त दोनों के कारण प्राकृतिक रूप से जलवायु के दो अलग चक्रों का निर्माण होता है। अंतरा उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र विषुवत रेखा पर निम्न दाब का निर्माण करता है। जहाँ व्यापारिक पवनें (Trade Wind) यहाँ मिलती है तथा संबहनिय धारा के रूप मे ऊपर उठती है। जुलाई के महीने में अंतरा उष्णकटिबंधीय क्षेत्र 20°-25° उत्तरी अक्षांश तक चली जाती है यानि कि पुरे गंगा मैदान को अपने आगोस में ले लेती है जिससे मानसून गर्त का निर्माण होता है। यह मानसून गर्त उत्तरी व उत्तरी-पूर्वी भारत में मानसून को आकृष्ट काने का काम करता है। दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने वाली व्यापारिक पवनें 40°-60° देशान्तर के पास विषुवत रेखा को पारकर कोरियालिस बल के कारण दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होने लगती है।उस स्थिति में दक्षिणी-पश्चमी मानसून का आगमन हो जाता है। शीत ऋतु में अंतरा उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र खिसक कर दक्षिण की ओर चला जाता है। इस स्थिति में पवन की दिशा भी बदल जाती है, उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुड़ जाती है जिसे उत्तरी-पूर्वी मानसून या लौटते मानसून भी कहा जाता है।

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दक्षिणी दोलन का सम्बंध जलवायु व समुद्र विज्ञान दोनों में है।समय विशेष में भारत-प्रशांत क्षेत्र में वार्षिक वायुदाब उतार-चढ़ाव जारी रहता है। पश्चिमी व पूर्वी प्रशांत महासागर के वातावरण में वायुदाब के उतार-चढाव को एलनिनो या दक्षिणी दोलन कहा जाता है। दक्षिणी दोलन के समय आस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया पर वायुमंडलीय दाब में तुलनात्मक अंतर देखा जाता है।यह अंतर 3 से 8 वर्ष के बीच होता है जिसका प्रभाव भारत तक स्पष्ट रुप से होता है।इस अवस्था में पूर्व से पश्चिम प्रवाहित होने वाली वायु कमजोर पड़ जाती है। गर्म जलधारा प्रति विषुवतीय जलधारा के साथ मिलकर बहने लगती है।जिसके कारण तापमान में वृद्धि होरी है।समुद्र का सतही जल का तापमान और समुद्रतल पश्चिम की ओर बढ़ने लगता है। इस परिघटना को ही एलनिनो कहा जाता है।कुल मिलाकर देखा जय तो इसका प्रभाव पूरे विश्व की जलवायु पर पड़ता है।

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एल निनो (El Nino) क्या है?

एलनिनो को 'इशु शिशु' कहा जाता है क्योंकि इस जलधारा का विकास क्रिसमस दिवस के आसपास होता है।दिसम्बर का महीना दक्षिण में ग्रीष्म का काल होता है।एलनिनो की घटना एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है जो 3 से 7 वर्षों में घटित होता है।जिसके कारण विश्व के कई हिस्सों में सुखा व बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो जाती है।इस प्रक्रिया में सागर व वायुमंडल का सम्मिलित भूमिका होती है जो की पेरू तट के पास उष्ण जलधारा के आविर्भाव के रूप में पूर्वी प्रशांत महासागर में घटित होता है।उष्ण विषुवतीय जलधारा के साथ मिलकर अपने जो विस्तार देता है जिसमे हम्बोल्ट की ठंडी जलधारा को विस्थापित कर देता है।जिसके कारण पेरू के तट के पास समुद्री जल के सतह के तापमान में 10℃ की वृद्धि हो जाती है,जिसके कारण निम्न परिणाम देखने को मलते है:

1-विषुवतीय वायुदाब व चक्रण में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है।

2-वाष्पोत्सर्जन की क्रिया में अनिमितता आ जाती है।

3-मछलियों के भोजन प्लेइंगटन में कमी आ जाती है जिससे से मछलियाँ मरने लगती है।

भारतीय मानसून पर एलनिनो का प्रभाव (Effects of El Nino on Indian Monsoon)

जिस वर्ष एल निनो प्रभावी हो जाता है उस समय दक्षिण गोलार्द्ध के सागरों पर वायुदाब में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलता है।सामान्य दिनों में दक्षिणी प्रशांत के विषुवतीय क्षेत्र के पूर्वी भाग पर उच्चदाब और हिन्द महासागर पर निम्नदाब देखने को मिलता है।लेकिन जिस वर्ष एलनिनो प्रभावी हो जाता है उस वर्ष इसमें विपरीत स्थिति उत्पन्न हो जाती है।पूर्वी प्रशांत में निम्नदाब तथा हिन्द महासागर में उच्चदाब उत्पन्न हो जाता है।वायुदाब में अंतर तहिती (18°S/149°W) तथा डार्विन (उत्तरी आस्ट्रेलिया) में मानसून की तीव्रता को आँका जाता है।यदि वायुदाब में नकारात्मक अंतर होता है तो मानसून औसत या देर से आएगा।