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ओज़ोन परत अवक्षय (ह्रास)

समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है। सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है। क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।
Jan 4, 2016 15:57 IST
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समताप मण्डल मे ओज़ोन की मात्रा मे अवक्षय (कमी) ही ओज़ोन परत अवक्षय / ह्रास / रिक्तिकरण है। अवक्षय तब प्रारम्भ होता है जब सीएफ़एस गैसे समताप मण्डल मे प्रवेश करती है। सूर्य से निकलने वाले परबैगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणें (सीएफ़एस गैसों) ओज़ोन पर्त को खंडित करता है। खंडन की इस प्रक्रिया के द्वारा क्लोरिन परमाणु का उत्सर्जन होता है। क्लोरिन परमाणु ओज़ोन से क्रिया करती है जिससे एक रसायन चक्र प्रारम्भ होता है जो उस क्षेत्र मे ओज़ोन की अच्छी परत को नष्ट कर देता है।

Jagranjosh

1970 के दशक के बाद से यह माना जाता है की ओज़ोन ह्रास (अवक्षय) दो अलग लेकिन संबन्धित घटनाओं का वर्णन करता है। एक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी के समताप मण्डल (ओज़ोन परत) मे ओज़ोन की कुल मात्र मे प्रति दशक 4% की दर से लगातार गिरावट आ रही है। उत्तरार्द्ध घटना को ओज़ोन छिद्र के रूप मे जाना जाता है।

समतापमंडलीय ओजोन परत परबैगनी किरणों को अवशोषित कर लेती है जिससे पृथ्वी पर आने वाली परबैगनी किरणों की मात्र में कमी आ जाती है।  यह ओजोन परत मानव की मोतियाबिंद, त्वचा कैंसर, मेलेनोमा इत्यादि रोगों से रक्षा करती है।  इन परबैगनी किरणों के संपर्क में आने से मुनष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है ।  इन किरणों से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया भी प्रभावित होती है तथा जीवित प्राणी के न्युक्लियक अम्ल नष्ट हो जाते है।

सीएफ़सी और अन्य सायहक पदार्थों को ओज़ोन अवक्षय पदार्थ (ओडीएस) के रूप मे माना जाता है। चूँकि ओज़ोन परत परबैगनी किरणों (अल्ट्रावायलेट किरण) की सबसे हानिकारक यूवीबी तरंगधैर्य (280-315) को पृथ्वी के वातावरण मे प्रवेश करने से रोकती है, ओज़ोन परत मे प्रत्यक्ष (देखी गयी) और अनुमानित रूप से आयी कमी पूरे विश्व मे चिंता का विषय बना हुआ है जिसके परिणाम स्वरूप मोंट्रियल प्रोटोकॉल को अपनाया गया है जो सीएफ़सी, हैलोन, और अन्य ओज़ोन अवक्षय रसायनों जैसे कि कार्बन टेट्राक्लोराइड और ट्राइक्लोरो ईथेन के उत्पादन पर रोक लगती है

सीएफ़सी का आविष्कार थॉमस मिग्ले जूनियर के द्वारा 1920 मे किया गया था। 1970 से पहले इनका प्रयोग वातानुकूलन (एयर कंडीस्निंग) और प्रशीतलन इकाइयों मे एरोसाल स्प्रे प्रणोदको के रूप मे और संवेदनशील इलेक्ट्रोनिक उपकरणो की सफाई प्रक्रिया मे किया जाता था। ये कुछ रसायनिक क्रियाओं के गौड़ उत्पाद के रूप मे भी होते थे। इन यौगिको के लिए कभी किसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक श्रोतों की पहचान नहीं की गयी है – वातावरण मे इनकी उपस्थिती पूरी तरह से मानव विनिर्माण के कारण है। जैसा की ऊपर दिया गया है, जब इस तरह के ओज़ोन अवक्षय रसायन समताप मण्डल मे पहुचते है, वे क्लोरिन परमाणुओं को उत्सर्जित करने के लिए पराबैगनी किरणों के द्वारा पृथक कर दिये जाते है। क्लोरिन परमाणु एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और प्रत्येक परमाणु समताप मण्डल से हटा दिये जाने से पूर्व प्रति हजार मे से दस ओज़ोन अणुओ को कम सकता है। सीएफ़सी अणुओं की लंबी आयु को देखते हुये, सुधार (ओजोन क्षरण के) मे लगने वाले समय को दशकों मे मापा जाता है। ऐसी गणना की गयी है कि एक सीएफ़सी अणु जमीन कि सतह से वायुमंडल की ऊपरी सतह तक जाने के लिए लगभग पाँच से सात साल का औसत समय लेता है और ऐसा कह सकते है कि ये वहाँ पर लगभग एक शताब्दी तक रह सकते है और इस अवधि के दौरान एक सौ हजार ओज़ोन अणुओं कों नष्ट कर सकते है।

अंटार्कटिक ओज़ोन छिद्र अंटार्कटिक समताप मण्डल का क्षेत्र है जिसमे हाल ही के ओज़ोन स्तर, 1975 के पहले के परिमाण मे कम से कम 33 % तक गिर गए थे। सितंबर से लेकर दिसम्बर के प्रारम्भ तक अंटार्कटिक बसंत के दौरान ओज़ोन छिद्र बनते है, जैसे ही प्रबल पश्चिमी हवाये महाद्वीप के चरो ओर बहने लगती है और और एक वायुमंडलीय घेरे का निर्माण करती है। इस ध्रुवीय भँवर के भीतर निचली समताप मण्डलीय ओज़ोन का 50% से अधिक अंटार्कटिक बसंत के दौरान नष्ट हो जाता है।

जैसा कि ऊपर उल्लिखित है, ओज़ोन अवक्षय का प्रमुख कारण क्लोरिन युक्त गैसों (मुख्य रूप से सीएफ़सी और संबन्धित हैलोकार्बन) की उपस्थिती है। परबैगनी किरणों की उपस्थिती मे, ये गैसे अपघटित हो कर क्लोरिन अणुओ कों मुक्त करती है, जो ओज़ोन के विनाश के लिए उत्प्रेरित करती है। क्लोरिन, उत्प्रेरित ओज़ोन अवक्षय गैसीय अवस्था मे हो सकता है, लेकिन ध्रुवीय समताप मंडलीय बादलो की उपस्थिती मे इसमे नाटकीय रूप से वृद्धि होती है।

ये ध्रुवीय समताप मंडलीय बादल ( पीएससी ) भीषण ठंढ मे सर्दियों के दौरान बनते है। ध्रुवीय सर्दिया 3 महीने तक बिना सौर्य विकिरण (धूप) के अंधकारमय होती है। सूर्य के प्रकाश मे कमी की वजह से तापमान मे गिरावट और ध्रुवीय भंवर के जाल और हवा को ठंढा करती है। और जब बसंत आता है तब सूर्य का प्रकाश एक उत्प्रेरक के रूप मे कार्य करता है और रसायनिक प्रतिक्रिया मे सहायता करता है जिसके परिणाम स्वरूप ओज़ोन छिद्र का निर्माण होता है।

ओज़ोन परत अवक्षय के परिणाम:

• परबैगनी किरणों की पृथ्वी पर वृद्धि

• बेसल और पपड़ीदार कोशिका कैंसर – मानव मे कैंसर का एक सबसे सामान्य रूप।

• घातक मेलानोमा – अन्य प्रकार का त्वचा कैंसर।

• कोर्टिकल मोतियाबिंद।

• परबैगनी किरणों की वृद्धि से फसलों के प्रभावित होने की संभावना है। पौधो के आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण विभिन्न प्रजातियों मे जैसे कि चावल साइनोबैक्टीरिया पर निर्भर रहता है जो नाइट्रोजन के धारण के लिए इसकी जड़ो मे रहता है। साइनोबैक्टीरिया परबैगनी किरणों के प्रति संवेदनशील होते है और इसकी वृद्धि के परिणाम स्वरूप प्रभावित हो सकते है।