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कृषि विपणन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार के कदम

कृषि विपणन के अंतर्गत वनीय, बागानी और अन्य कृषि उत्पादों के भंडारण,प्रसंस्करण व विपणन के साथ-साथ कृषिगत मशीनरी का वितरण और अंतर-राज्यीय स्तर पर कृषि वस्तुओं का आवागमन भी शामिल है | इनके अलावा कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु तकनीकी सहायता प्रदान करना और भारत में सहकारी विपणन को प्रोत्साहित करना भी कृषि विपणन गतिविधियों के अंतर्गत आता है |
Mar 2, 2016 15:30 IST
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कृषि विपणन के अंतर्गत वनीय, बागानी और अन्य कृषि उत्पादों के भंडारण,प्रसंस्करण व विपणन के साथ-साथ कृषिगत मशीनरी का वितरण और अंतर-राज्यीय स्तर पर कृषि वस्तुओं का आवागमन भी शामिल है | इनके अलावा कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु तकनीकी सहायता प्रदान करना और भारत में सहकारी विपणन को प्रोत्साहित करना भी कृषि विपणन गतिविधियों के अंतर्गत आता है |

कृषि विपणन में परिवहन, प्रसंस्करण, भंडारण, ग्रेडिंग आदि जैसे गतिविधियाँ  शामिल हैं। ये गतिविधियाँ हर देश की अर्थव्यवस्था में बहुत अहम् भूमिका निभाती हैं|

वर्तमान में, कृषि उत्पाद बाजार समिति (APMC) अधिनियम विभिन्न राज्यों को किसानों द्वारा काटी गई फसल को पहली बिक्री को लिए विनियमित बाजार या मंडियों में स्थान दिलाने की सुविधा देता हैं |

सरकार ने किसानों और व्यापारियों को देश में कहीं भी खरीदारों को अपनी उपज बेचने के लिए एक आम इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म के निर्माण को मंजूरी दे दी है।

लंबी अवधि के लिए भारतीय कृषि ज्यादातर 'निर्वाह खेती' की अवधारणा पर आधारित था। किसान केवल अपनी उपज का एक छोटा हिस्सा अपने किराए, कर्ज के भुगतान के लिए और अपनी अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते थे | इस तरह की बिक्री आमतौर पर फसलों की कटाई के तुरंत बाद की जाती थी क्योंकि उस समय भंडारण की सुविधाएं नहीं थीं | कुल उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा किसानों द्वारा बाजार की कीमतों की तुलना में काफी कम कीमत पर अक्सर गांव के व्यापारियों और साहूकारों को बेच दिया करते थे |  वे किसान जो अपनी उपज को बेचने के लिए मंडी ले जाते थे उन्हें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता था क्योंकि वहां वे शक्तिशाली और संगठित व्यापारियों का सामना करते थे | मंडियों में बाजार को थोक व्यापारियों  द्वारा या दलालों की सहायता से चलाया जाता है | वास्तव में, कृषि विपणन प्रणालियों में बिचौलियों की बड़ी श्रृंखला थी जैसे गांव के व्यापारी, कच्चे आढ़तियों, पक्के आढ़तियों ,दलाल, थोक व्यापारी, खुदरा विक्रेता, साहूकार, आदि | परिणाम स्वरूप कृषि उपज की कीमतों में किसानों का हिस्सा काफी हद तक कम हो गया |

भारत में कृषि विपणन में उपरोक्त कमियों और मंडियों में बड़ी संख्या में उपस्थित दलालों और बड़ी संख्या में फैले हुए कदाचारों के अलावा – कई और समस्याएं भी थीं | 

परिवहन सुविधाएं भी अत्यधिक अपर्याप्त थीं और केवल थोड़े से ही गाँव रेलवे और पक्की सडकों द्वारा मंडियों से जुड़े हुए थे | अधिकाँश सड़कें कच्ची सड़कें थीं जो मोटर वाहनों के लिए ठीक नहीं थीं और उपज धीमी गति से चलने वाले परिवहन जैसे बैल गाड़ियों से  ढोए जाते थे | 

सरकार के कृषि विपणन की प्रणाली को उन्नत करने के उपाय

आजादी के बाद भारत सरकार ने कृषि विपणन की प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए कई तरह के उपायों को अपनाया है, विनियमित बाज़ारों की स्थापना करना, गोदामों का निर्माण करना, उपज श्रेणी निर्धारण व मानकीकरण का प्रावधान, बाट और माप का मानकीकरण,ऑल इंडिया रेडियो पर कृषि फसलों की बाज़ार में कीमतों का दैनिक प्रसारण, परिवहन सुविधाओं में सुधार आदि महत्वपूर्ण उपायों में से एक हैं |

1. नियमित बाजार के संगठन: विनियमित बाजारों को विक्रेताओं और दलालों के शोषण से किसानों को बचाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया | ऐसे बाजार का प्रबंधन एक मार्केट कमेटी दवारा किया जाता है जिसमें राज्य सरकार , स्थानीय निकायों, आर्हतिया, दलालों और किसानों  के प्रत्याशी होते हैं | इस प्रकार, सभी के हितों पर समिति का प्रतिनिधित्व होता है | ये समितियां सरकार द्वारा एक निश्चित अवधि के लिए नियुक्त की जाती हैं |

अधिकाँश राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों ने कृषि उपज बाजारों(कृषि उत्पादन विपणन समिति अधिनियम) के नियमन के लिए अधिनियम प्रदान किये हैं | 31मार्च, 2010 तक  देश में 7,157 विनियमित बाज़ार थे | 

2. ग्रेडिंग और मानकीकरण: कृषि विपणन प्रणाली में सुधार की उम्मीद तब तक नहीं की जा सकती जब तक कृषि उत्पादों के ग्रेडिंग और मानकीकरण पर विशेष प्रयास ना किये जाएँ । सरकार ने यह काफी जल्दी पहचान लिया और कृषि उत्पाद (श्रेणीकरण एवं विपणन) अधिनियम को 1937 में पारित किया गया था | शुरुआत में, ग्रेडिंग को  भांग और तंबाकू के लिए शुरू  किया गया था।

सरकार ने नागपुर में एक केंद्रीय गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला और कई क्षेत्रीय सहायक गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला स्थापित की है। महत्वपूर्ण उत्पादों के नमूने बाजार से प्राप्त कर लिए जाते हैं और उनके भौतिक और रासायनिक गुणों का इन प्रयोगशालाओं में विश्लेषण किया जाता है । इस आधार पर, ग्रेड तैयार किये जाते हैं और अधिकृत पैकर एगमार्क प्रमाणों को जारी करते हैं | (एगमार्क केवल कृषि विपणन के लिए एक संक्षिप्त नाम है)।

3. मानक वज़नों का प्रयोग:

इसके अंतर्गत सही माप तौल के माध्यम से उत्पादों को तुला जाता है ताकि किसानों को उनके उत्पादों का सही मूल्य दिया जा सके /

4. गोदाम और भंडारण की सुविध: इसके अंतर्गत सरकार किसानों को अपने उत्पादों को इकठ्ठा करने की सुविधा दी जाती है ताकि जिंसो की  मूल्य बृद्धि का फायदा उठाया जा सके /

5. बाजार सूचना का प्रसार: इस सुविधा में किसानों को हाल के बाजार मूल्यों की जानकारी उपलब्ध करायी जाती है

6. सरकार खरीद और कीमत तैयार करती है: सरकार हर साल खाद्यानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है ताकि किसानों को ज्यादा उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके और अधिक उत्पादन की स्तिथि में भी किसानों को उत्पादों का सही मूल्य दिया जा सके /

कृषि विपणन की कमियाँ

11 वीं पंचवर्षीय योजना के अनुमानों के अनुसार, विनियमित बाजारों में कई स्थानों पर भी आधारभूत संरचना की कमी है। जब कृषि उत्पादन विपणन (विनियमन) अधिनियमों की शुरुआत की गई थी,तब बाजार के बुनियादी ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण लाभ हुआ । हालांकि, ये बुनियादी सुविधाएं अब पुरानी हो चुकी हैं (विशेष रूप से विविध कृषि की जरूरतों को देखते हुए) | शीत भंडारण इकाइयों की  बाजारों में ज़रूरत है जहां खराब होने वाली वस्तुओं को बिक्री के लिए लाया जाता है । हालांकि, वर्तमान में ये बाज़ारों के 9 प्रतिशत हिस्से में ही मौजूद हैं और ग्रेडिंग सुविधाएं कम से कम बाज़ार के एक-तिहाई हिस्से में ही मौजूद हैं। बुनियादी सुविधाओं, अर्थात, आंतरिक सड़कें, चारदीवारी, बिजली की रोशनी, लदान और उतराई सुविधाएं और तौल उपकरण बाजार के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से में मौजूद हैं |

ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना ने कृषि विपणन से सम्बंधित निम्नलिखित मुद्दों के समाधान का प्रस्ताव रखा है - विपणन प्रणाली में सुधार और पर्यावरण अनुकूल नीति, विपणन बुनियादी ढांचा और निवेश की जरूरत को मजबूत बनाना, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के उपयोग के साथ बाज़ार सूचना प्रणाली में सुधार करना, कृषि विपणन के लिए मानव संसाधन विकास तथा निर्यात / विदेशी व्यापार को बढ़ावा देना |