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केवलादेव घाना राष्ट्रीय पार्क : प्रवासी साईबेरियन सारसों का घर

केवलादेव घाना राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित राष्ट्रीय पार्क है,जिसे पहले 'भरतपुर पक्षी अभयारण्य' कहा जाता था| यह पार्क शीतकाल में साईबेरिया से आने वाले सारसों के प्रवास स्थल के रूप में प्रसिद्ध है | केवलादेव घाना को 1982 ई. में 'राष्ट्रीय पार्क' का दर्जा प्रदान किया गया और 1985 ई. में यूनेस्को ने इसे अपनी 'विश्व विरासत स्थल' की सूची में शामिल कर लिया |
Mar 2, 2016 17:47 IST
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केवलादेव घाना राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित राष्ट्रीय पार्क है,जिसे पहले ‘भरतपुर पक्षी अभयारण्य’ कहा जाता था| केवलादेव घाना को 1982 ई. में राष्ट्रीय पार्क का दर्जा प्रदान किया गया और 1985 ई. में यूनेस्को ने इसे अपनी विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल कर लिया | यह पार्क शीतकाल में साईबेरिया से आने वाले सारसों के प्रवास स्थल के रूप में प्रसिद्ध है | 

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केवलदेव राष्ट्रीय पार्क में जैव-विविधता

इस पार्क में  पक्षियों, पुष्पों, मछलियों, साँपों,छिपकलियों ,उभयचरों और कछुओं की अनेक प्रजातियाँ पायी जाती हैं लेकिन पक्षियों की प्रजातियों की संख्या यहाँ सर्वाधिक है, इसीलिए इसे ‘पक्षी अभयारण्य’ भी कहा जाता है | यह पार्क पक्षियों की लगभग 370 प्रजातियों के अलावा बास्किंग पायथन, पैंटेड स्टोर्क, हिरणों, नीलगायों व अन्य अनेक जंतुओं का भी आवास है|  यहाँ की निवासी प्रजातियों के अलावा भी अनेक प्रवासी प्रजातियों यहाँ प्रजनन और शीतकाल गुजारने के लिए आती हैं |  केवलादेव घाना में आने वाले प्रवासी पक्षियों में सारसों, पेलिकन, हंस, बत्तख, ईगल्स, हाक, शैंक्स आदि की अनेक प्रजातियाँ शामिल हैं |    

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साइबेरियन सारस

 साइबेरियन सारस या साइबेरियन व्हाइट क्रेन (Grus leucogeranus) सारसों की गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों में से एक है |एक वयस्क साइबेरियन सारस की ऊँचाई 5 फीट और वजन 6 किग्रा. होता है | ये तीन समूहों में मिलते हैं:

  • पूर्वी समूह, जो पूर्वी साइबेरिया से चीन की ओर प्रवास करते हैं
  • केंद्रीय समूह, जो पश्चिमी साइबेरिया से भारत की ओर प्रवास करते हैं
  • पश्चिमी समूह, जो पश्चिमी रूस से ईरान की ओर प्रवास करते हैं  

केवलादेव घाना से संबन्धित अन्य जानकारी :

I. यह पार्क लगभग 30 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में फैला हुआ है |

II. केवलादेव राष्ट्रीय पार्क 27°10' उत्तरी अक्षांश और  77°31' पूर्वी देशांतर पर अवस्थित है |

III. यह उद्यान भरतपुर के महाराजाओं की पसंदीदा शिकारगाह था, जिसकी परम्परा 1850 ई. से भी पहले से थी। यहाँ पर ब्रिटिश वायसराय के सम्मान में पक्षियों के सालाना शिकार का आयोजन भी होता था। भारत की स्वतंत्रता के बाद भी 1972 ई. तक भरतपुर के पूर्व राजा को उनके क्षेत्र में शिकार करने की अनुमति थी, लेकिन 1982 ई. से उद्यान में चारा लेने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया |

IV. इस पार्क को राष्ट्रीय पार्क दर्जा दिलाने में प्रसिद्ध पक्षीविज्ञानी और पर्यावरणविद सलीम अली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी |

V. शुष्क घासभूमि,दलदल और आर्द्रभूमियों से युक्त इस पार्क को स्थानीय स्तर पर घाना नाम से जाना जाता है |

VI. यहाँ स्थित केवलादेव (शिव) मंदिर के नाम पर इसक नाम ‘केवलादेव’ रखा गया है |

VII. केवलादेव घाना राजस्थान वन अधिनियम, 1953 के तहत आरक्षित वन क्षेत्र है, अतः यह राजस्थान और भारत संघ की संयुक्त संपत्ति है |

Image Courtesy: cleartrip.com