क्षुद्रग्रह, धूमकेतु, एवं एवं उल्का पिंड

क्षुद्रग्रह, जिन्हे अप्रधान ग्रह या ऐस्टरौएड भी कहा जाता है, सौरमंडल मे विचरण करने वाले ऐसे खगोलिय पिंड है जो आपने आकार मे ग्रहो से छोटे और उल्का पिंडो से बडे होते हैं.
Created On: Jul 25, 2014 13:42 IST

क्षुद्रग्रह

क्षुद्रग्रह, जिन्हे अप्रधान ग्रह या ऐस्टरौएड भी कहा जाता है, सौरमंडल मे विचरण करने वाले ऐसे खगोलिय पिंड है जो आपने आकार मे ग्रहो से छोटे और उल्का पिंडो से बडे होते हैं. ये सौर प्रणाली के निर्माण के समय बने चट्टानी पिंड हैं. इनकी स्थिति अधिकांशतः मंगल और बृहस्पति के बीच पाई जाती है. वज्ञानिकों के अनुसार यें क्षुद्रग्रह बड़े पैमाने पर सैकड़ों किलोमीटर विस्तृत क्षेत्र में सूर्य की परिक्रमा करते हैं. वज्ञानिकों का एक वर्ग यह विश्वास करता हैं की ये क्षुद्रग्रह गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण ही इन ग्रहों के बीच आज भी चक्कर लगा रहे हैं. उनका यह भी मानना है की अतीत में इन क्षुद्रग्रहों के लम्बे काल तक पृथ्वी से टक्कर के कारण पृथ्वी के निर्माण में मदद मिली है. उल्लेखनीय है की यह टक्कर आज भी हो रहे हैं जैसा कि अभी हाल ही में रूस में इस तरह की घटना हुई है जिसमे काफी मात्रा में नुकसान भी हुआ है.

धूमकेतु

धूमकेतु अपेक्षाकृत छोटे  एवं अनिश्चित आकार के पिंड होते हैं. ये सौर प्रणाली के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान ही निर्मित हुए थे और आज भी विद्यमान हैं. ये वे सौर मंडलीय निकाय हैं जो पत्थर, घूल, बर्फ और गैस के बने हुए छोटे-छोटे खंड होते हैं. धूमकेतु की नाभि का विस्तार १०० मीटर से लेकर ४० किलोमीटर से अधिक तक माना जाता है. धुमकेतू में विभिन्न प्रकार के कार्बनिक यौगिक भी होते है. इनमे मिथेनोल, हाइड्रोजन साइनाइड, फोर्मेलड़ेहाइड, इथेनोल और इथेन जैसे कार्बनिक यौगिकों के साथ कुछ अम्ल भी पाए जाते हैं. जब धूमकेतु सूर्य के नजदीक आता है तो सौर-विकिरण के प्रभाव से इसके उपरी सतह की गैसों का वाष्पीकरण हो जाता है. धूमकेतू के तीन मुख्य भाग होते हैं अर्थात नाभि,कोमा और पूंछ. इनकी यह विशेषता होती है की जब ये सूर्य से दूर होते हैं तो ठन्डे होते हैं लेकिन जैसे ही सूर्य के नजदीक  आते है वाष्पीकृत हो जाते हैं. जिसके परिणामस्वरूप बहुत बड़ी मात्रा में निकलने वाली धूल और गैस की यह धारा धुमकेतू के चारों ओर अत्यंत कमजोर वातावरण बनाती है जिसे कोमा कहा जाता है.

कुछ धूमकेतू का पथ परबलयाकार होता है और वो मात्र एक बार ही दिखाई देते है। लम्बे पथ वाले धूमकेतू एक परिक्रमा करने में हजारों वर्ष लगाते है अधिकतर धूमकेतुओ का कक्षीय पथ दीर्घवृत्ताकार होता है और गति करने के दौरान ये ग्रहों की कक्षा का अतिक्रमण करते है और दूसरो ग्रहों की कक्षाओं में प्रवेश कर जाते हैं. धूमकेतु अपनी एक कक्षा पूरा करने के लिए अधिक से अधिक 30 लाख साल का समय लेते हैं. वैज्ञानिको का यह मानना है कि लाखो साल पूर्व पृथ्वी से इनकी बार-बार टक्कर ने पृथ्वी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

उल्का और उल्कापिंड

आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में 'टूटते हुए तारे' अथवा 'लूका' कहते हैं. अंतरिक्ष में भ्रमण करते समय  क्षुद्रग्रह अक्सर एक दुसरे से टक्कर करते रहते हैं और टक्कर के दौरान ही छोटे-छोटे अवशेषों में टूट जाते हैं. ये इस रूप में भ्रमण करते हैं जैसे की सौर प्रणाली के अंग हों. उल्लेखनीय है की उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड कहते हैं अधिकांश उल्कापिंड चट्टानी संरचना के बने होते हैं और आकर में अत्यंत छोटे होते हैं. अधिकांशत: लोहे, निकल या मिश्रधातुओं से बने होते हैं और कुछ सिलिकेट खनिजों से बने पत्थर सदृश होते हैं. कभी-कभी इनका आकार एक बास्केटबॉल से भी बड़ा होता है. इनकी संरचना में विविधता पाई जाती है जिसकी वजह से उल्कापिंडों का  वर्गीकरण उनके संगठन के आधार पर किया जाता है. कुछ पिंड धात्विक और कुछ आश्मिक उल्कापिंड कहे जाते हैं. इसके अतिरिक्त कुछ पिंडों में धात्विक और आश्मिक पदार्थ प्रायः सामान मात्र में पाए जाते हैं उन्हें धात्वाश्मिक उल्कापिंड कहते हैं.

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