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गुप्त काल के बाद आर्थिक, सामाजिक जीवन और मंदिर वास्तुकला

गुप्ताओं के पतन के बाद, उनके गृह प्रांतों में शासकों की एक लंबी लाइन लग गयी थी। एक को छोडकर इन सभी के नामों के अंत में गुप्त आता था। इसलिए यह परिवार इतिहास में “मगध के शासन के बाद  गुप्त”  के नाम से जाना जाता है। यह तय कर लेना कि वे किसी भी तरह से शाही गुप्त के साथ जुड़े हुए थे, संभव नहीं था। गुप्त काल के बाद उत्तरी भारत में कुछ महत्वपूर्ण राजवंश उत्पन्न हुए। जैसे-कन्नौज के मौखरी, कामरूप के वर्मन, थानेश्वर के पुष्यभूति आदि।
Aug 31, 2015 12:23 IST
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समाज का अवलोकन:  गुप्त काल के बाद भारतीय समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। पांचवीं सदी ईस्वी के बाद से भारत में भूमि अनुदान ने सामंती विकास में मदद की। किसान सामंती अधिपतियों के लिए दी गई भूमि में रुके ठहरे रहे थे। इनमें जिन गांवो को स्थानांतरित कर दिया गया था उन्हें ‘स्थान-जन-सहिता’ और ‘समरिद्धा’ के नाम से जाना जाता था। गुप्त काल के बाद की अवधि में व्यापार और वाणिज्य में गिरावट के कारण वहां की अर्थव्यस्था एक बंद अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुकी थी।

सामंती समाज के विकास ने राजा की स्थिति कमजोर कर दी थी जिस कारण राजा को सामंती प्रमुखों पर ज्यादा अधिक निर्भर रहना पडता था। सामंती प्रमुखों का वर्चस्व बढ़ने लगा था जिसके परिणामस्वरूप गांव का स्वशासन कमजोर हो गया था।

ह्वेनसांग के लेखन में उल्लेखित चार वर्ण समाज में मौजूद थे। उस कई उप जातियां भी मौजूद थी जो उस समय और प्रबल हो गयीं थी। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति बहुत बिगड़ गयी थी। सतीप्रथा और दहेजप्रथा आम हो गयी थी।

लड़कियों की शादी छह से आठ साल की उम्र के बीच होने लगी थी। सामान्य महिला पर विश्वास नहीं किया जाता था। उन्हे पृथक (अलग) रखा जाता था। आम तौर पर महिलाओं के जीवन को उनके पुरूष रिश्तेदारों जैसे- बेटे, पिता, और भाई द्वारा नियंत्रित किया जाता था।

अर्थव्यवस्था

हर्ष शासन की अवधि के दौरान साहित्यिक और शिलालेखीय साक्ष्यों से पता चलता है कि राज्य कृषि, व्यापार और अर्थव्यवस्था में किस प्रकार उन्नत था। शुरूआती अरब लेखकों ने भी मिट्टी की उर्वरता और अमीर खेती का वर्णन किया है। साहित्यकार अभिधन रत्नमल ने उल्लेखित किया है मिट्टी को विभिन्न प्रकारों में जैसे उपजाऊ, बंजर, रेगिस्तान, उत्कृष्ट आदि के रूप में वर्गीकृत किया गया था। उन्होंने यह भी उल्लेखित किया है कि विभिन्न प्रकार के फसलों के लिए विभिन्न मैदानों का चयन किया जाता था। 

उद्योग के क्षेत्र में कपड़ा सबसे पुराने उदयोगों में से एक था।  समकालीन साहित्य में बुनकर, रंगरेज, दर्जी आदि के पेशे का वर्णन किया गया है। इस अवधि के दौरान धातु का काम भी बेहद लोकप्रिय था। धातु उद्योग के कुछ केन्द्र प्रसिद्ध थे। सौराष्ट्र अपने घंटी (बेल) धातु उद्योग के लिए प्रसिद्ध था जबकि वंगा (बंगाल) अपने टिन उद्योग के लिए जाना जाता था।

गुप्त काल के बाद दक्षिण पूर्व एशिया के साथ व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुयी थी। भारत के माध्यम से पूर्व और पश्चिम के बीच व्यापार के प्रवाह का उल्लेख अरब, चीनी और भारतीय स्त्रोतों में किया है। भारत, चंदन की लकड़ी, मोती, कपूर, कपास, धातु, कीमती और अर्द्ध कीमती पत्थरों का निर्यात करता था। आयातित वस्तुओं में किराए के घोड़े शामिल थे। घोड़ों को मध्य और पश्चिमी एशिया से आयात किया जाता था। गुप्त काल में श्राइन या निकाय महत्वपूर्ण होते थे।

कला और वास्तुकला

गुप्त काल के बाद मंदिरों को दो वर्गों में विभाजित किया गया था जैसे- उत्तर भारतीय शैली (नगारा) और दक्षिण भारतीय शैली (द्रविड़)। उड़ीसा के प्रसिद्ध मंदिर उत्तर भारतीय शैली (नगारा) के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये मंदिर मुख्यत: दो भागों में हैं,  छत पर वक्रीय शिखर के साथ सेला या गर्भगृह और एक द्वारमंडप या पिरामिडीय छत आवरण। भुवनेश्वर का महान लिंगराज मंदिर और कोणार्क का सूर्य मंदिर इस प्रकार का सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं।

चंदेल शासकों द्वारा निर्मित खजुराहो के मंदिर, मंदिर वास्तुकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान  दिया।

ममल्लापुरम में चट्टानों को काटकर बनाये गये मंदिर को रथ कहा जाता है और कांची के मंदिरों को कैलाशनाथ कहा जाता है तथा वैकुंठ पेरूमल दक्षिण भारतीय या द्रविड़ शैली का सबसे पहला उदाहरण हैं।

दक्षिण भारतीय या द्रविड़ शैली का सबसे पहला उदाहरण ममल्लापुरम में चट्टानों को काटकर बनाया गया मंदिर रथ के रूप में जाना जाता है, और कांची में संरचनात्मक मंदिरों को कैलाशनाथ और वैकुंठनाथ पेरूमल के रूप में जाना जाता है। ये सभी मंदिर पल्लव द्वारा निर्मित किये गये थे। तंजौर और गंगेईकोंडाचोलपुरम में दो भव्य मंदिर चोलों द्वारा बनाये गये थे।

दक्षिण भारतीय मंदिरों में शिखरों  या टावरों को पिरामिडीय टावर के रूप में चिह्नित किया गया था जो सीधे खड़े थे। गुप्तकाल के दौरान मूर्तिकला में तेजी से गिरावट आई। हालांकि,  पाल अवधि के दौरान पूर्वी भारत की मूर्तिकला में एक बेहतरीन उत्कृष्टता देखने को मिली। उड़ीसा की मूर्तिकला ने मानकता के उच्च मानदंड हासिल किये थे।