Search

चोल राज्य : प्रशासन, कला और वास्तु-कला

चोल वंश प्रमुख रूप से तमिल वंश था जिन्होने मुख्यतः भारत के दक्षिण में 13वीं सदी तक शासन किया | सभी शासकों में ,करिकला चोल आरंभिक चोल राजाओं में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध थे | चोल वंश के पास पीतल के कुछ बेहतरीन नमूने तथा अन्य मूर्तियाँ हैं जैसे नाचते हुए नटराज की मूर्ति और तंजावुर ( तमिलनाडु) का बृहदीस्वरर मंदिर इन्हीं के कुछ बेहतरीन उदाहरण हैं |
Aug 19, 2015 18:42 IST
facebook Iconfacebook Iconfacebook Icon

चोल प्रशासन

चोल की राजधानी तंजोर (तंजावुर ) थी | चोल साम्राज्य तीन प्रशासनिक इकाइयों में बंटा था जिसे केंद्र सरकार, अस्थायी सरकार तथा स्थानीय सरकार कहा गया | उत्तरामेरुर अभिलेख चोल के प्रशसन पर रोशनी डालते हैं |

प्रशासन का नेतृत्व राजा करता था | चोल शासन स्वरूप में  वंशानुगत था | चोल के शाही पारिवारिक परंपरा के अनुसार, चोल राजा की गद्दी का अनुगामी हकदार सबसे बड़ा बेटा होगा | स्पष्ट रूप से उत्तराधिकारी को युवराज कहा जाता था | चोल राजाओं का शाही चिन्ह शेर था | राजा की उसके काम में मदद उसके मंत्रियों की सभा करती थी | निम्न अधिकारियों को सिरुंतरम कहा जाता था जबकि उच्च अधिकारियों को पेरुंतरम कहा जाता था |

पूर्ण साम्राज्य नौ प्रान्तों में विभाजित था जिसे मंडलम कहा गया | हर एक प्रांत का नेतृत्व  राजपाल करता था जोकि राजा से आदेश प्राप्त करता था | हर मंडलों को कोट्टम्स या वलनदुस में विभाजित किया जाता था जिसे आगे नाडु में प्रविभाजित किया था | प्रत्येक नाडु आगे गाँव में विभाजित था जिसे  उर्स कहा गया |

चोल सरकार पूरी तरह से भूमि कर पर जोकि उनकी आय का मुख्य स्त्रोत था निर्भर थी | भूमि उपज का 1/6 भाग कर के रूप में इकट्ठा किया जाता था | भूमि राजस्व के अलावा आयात कर व पथ कर भी साम्राज्य के आय के स्त्रोत थे | इसके अलावा बंदरगाहों, वनों तथा खदानों के ऊपर  कर भी राजा के संपत्ति में  इकट्ठा किया जाता था |

चोलाओं के पास सक्षम सेना तथा जल सेना थी | सेना 70 रेजिमेंटों से बनी थी |  चोल राजा उच्च कोटी के अरबी घोड़ों का आयात ऊंची कीमत पर करते थे |

चोल राजा मुख्य न्यायाधीश का भी काम करते थे क्यूंकि बड़े मुकदमों की पैरवी वह अपने आप करते थे | ग्राम स्तर के छोटे विवाद ग्राम सभा में सुलझा लिए जाते थे |

चोलाओं की एक प्रमुख प्रशासनिक इकाई नाडु थी | प्रत्येक नाडु का नेतृत्व  नात्तर के द्वारा किया जाता था जबकि नाडु की सभा को नत्तवई कहा जाता था | ग्राम प्रशासन की पूरी ज़िम्मेदारी चोल प्रशासन की निम्न इकाई  जिसे ग्राम सभा के नाम से जाना गया  पर थी | यह सड़कों , तालाबों, मंदिरों तथा सार्वजनिक तालाबों का रख-रखाव करती थीं | ग्राम सभा गावों से बकाया कर अदा करने की प्रभारी थी जो राजा की संपत्ति में जाता था |

ग्राम प्रशासन को वरियंस के द्वारा प्रभावशाली तरीके से चलाया जाता था जिसमे समाज के पुरुष सदस्य थे | वारियंस दो प्रकार के होते थे | उदहारण  के लिए न्याय प्रशासन न्याय वरियम के द्वारा किया जाता था जबकि मंदिरों का  धर्म वारीयन द्वारा देख रेख किया जाता था | वित्त व्यवस्था की देखरेख की ज़िम्मेदारी पोण वरियम को दी गई थी |

चोल वास्तुकला

चोल साम्राज्य में वास्तुकला फलीफूली तथा इसका अंत  850 A D के बाद हुआ |  सबसे बड़ी इमारतें मंदिरों के रूप में इस युग के दौरान बनीं |

चोल वास्तुकला की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं :-

  • तंजौर / तंजावुर का शिव मंदिर, सभी भारतीय मंदिरों में सबसे बड़ा व लंबा मंदिर चोल युग में बना |
  • चोल मंदिरों में मंडप के प्रवेश द्वारों पर द्वारपाल या रक्षकों की आकृतियाँ बनी होती थीं  |
  • मंदिरों में पूरी तरह से द्रविड़ शैली विकसित थी |
  • मंदिरों में बनाए गए गणों के आकृतियाँ सबसे यादगार होती थीं |

विजयालया चोलीस्वरा मंदिर के दौरान बनाए गए कुछ  प्रसिद्ध मंदिर निम्न हैं :-

विजयालया चोल के शासन के दौरान नरथमलाई मे विजयालया चोलीस्वरा मंदिर पूरी तरह भगवान शिव को समर्पित है |

कावेरी नदी के किनारे पर कोरंगनाथ मंदिर,श्रीनिवासनल्लुर परांतका चोल – 1 के द्वारा बनाया गया | यह श्रीनिवासनल्लुर में स्थित है | चोल वास्तुकला के अनूठे व आवर्ती काल्पनिक पशु यजही को मंदिर के स्तंभों पर उकेरा जाता था | बृहदीस्वरर मंदिर या पेरुवुदाइयर कोविल या राजराजेश्वरम मंदिर पूरी तरह चट्टानों से बने हैं | राजराज चोल-1 के द्वारा बनाया गया यह विश्व का पहला मंदिर है साथ ही साथ यह यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह तंजावुर में  स्थित है |

गंगाईकोण्डाचोलापुरम राजाराज के बेटे राजेंद्र 1 के द्वारा बनाया गया | गंगाईकोण्डाचोलापुरम चौलक्य, गंगा , पाल तथा कलिंग पर राजेंद्र 1 के विजय प्राप्त करने पर एक नई राजधानी बनी |