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चोल साम्राज्य ( 9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) : बाद के चोल

बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |
Sep 2, 2015 15:06 IST
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बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |

चोल राज्य का पतन

चोल साम्राज्य मे संकट आने के साथ विराराजेन्द्र चोला का 1070 A D  में देहांत हो गया | आगे, विक्रमादित्य V I,उसके बेटे ने स्मरणीय प्रतिष्ठा हासिल की और जल्दी ही चोल समाज का उत्तरदायित्व संभालना  शुरू कर दिया | जब विराराजेन्द्र का स्वर्गवास हुआ था तब चोल साम्राज्य में एक विद्रोह (शायद धार्मिक ) था |  विक्रमादित्य V I गंगाईकोण्डा चोलपुरम में एक माह के लिए रहे और उसके बाद अपनी राजधानी में फिर दौरा किया |गंगाईकोण्डा चोलपुरम मे उन्होने अथिराजेन्द्र को नया राजा बना दिया | दूसरी तरफ, कुछ ही महीनों में अथिराजेन्द्र एक नए विद्रोह के झोंके में फंस गए | जब अथिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, तब राजेंद्र चोल ने चोल राजगद्दी को हथिया लिया | यह चोल राजाओं के आरंभ की एक नई लकीर थी जिसे बाद के चोलाओं के तौर पर जाना गया |

कुलोत्थुंगा चोल-I (1070-1120 A D )

राजेंद्र चोल-1 की पुत्री  अम्मानगा देवी का विवाह पूर्वी चालुक्यों के वेंगी राजा राजराजा नरेंद्र के साथ हुआ | इस एकीकरण की संतान थी राजेंद्र चोल जोकि बाद मे कुलोत्थुंगा-1 बना | कुलोत्थुंगा चोल-1 ने कलिंग में 2 सैनिक कार्यवाही करीं | कुलोत्थुंगा के नेतृत्व में श्रीलंका को निकालकर पूर्ण साम्राज्य में एकीकरण रहा | फिर भी पश्चिमी चालुक्यों और चोल के बीच तुंगभद्रा नदी एक बाह्य सतह की तरह थी | 1120 A D  में विक्रम चोल इसका उत्तराधिकारी बना | 

विक्रम चोल 1120- 1135 A D  

कुलोत्थुंगा चोल-1 ने विक्रम  चोल को वेंगी का राजपाल नियुक्त किया | इसका आहवान 1118 A D में हुआ और इसे राज्य प्रतिनिधि नियुक्त घोषित कर दिया गया | इसने अपने पिता कुल्लोत्थुंगा के साथ  शासन किया जब तक उसके पिता का देहांत 1122 A D  में नहीं हो गया | पश्चिमी चालुक्य बहुत ऊंची उड़ान भर रहे थे और उन्होने पूर्वी चालुक्य  पर आक्रमण कर वेंगी को जीत लिया | 1133 A D  में कुल्लोत्थुंगा चोल II, विक्रम चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल II 1133 A D -1150 A D

कुलोत्थुंगा चोल II विक्रम चोल का बेटा व उत्तराधिकारी था | इसके खाते में कोई भी ऐतिहासिक लड़ाई नहीं है | वह चिदम्बरम मंदिरों की धन आदि से सहायता  करता था | 1150 A D में राजराजा चोल II इसका उत्तराधिकारी बना |

राजराजा चोल II  1150 -1173 A D

कुल्लोथुंगा चोल III  ने राजराजा चोल को अपना वारिस 1146 A D मे बनाया | उसका पूरा नियंत्रण कलिंग, वेंगी, चेरा, पाण्ड्य आदि के क्षेत्रों  पर था और इसने श्रीलंका को भी हमला किया परंतु इसके प्रभुत्व के अंतिम सालों में इसके साम्राज्य, जो पहले पाण्ड्य का क्षेत्र था ने राजनैतिक अशांति देखी |उसके गुजर जाने से पहले, उसने राजाधिराज चोल II को 1163 A D में अपना वारिस बना दिया | इसका उत्तराधिकारी राजाधिराज चोल II बना | 

राजाधिराज चोल II 1166 A D – 1178 A D

राजाधिराज चोल II, राजराजा चोल II का उत्तराधिकारी बना | इसका शासन काल में चोल राज्य को आगे के दोषों के लिए जाना गया  जिसमें  पाण्ड्य  के बीच आम जागीरदारों का आधिपत्य था | पाण्ड्य के बीच राजनैतिक युद्ध हो गया जिसमे चोलाओं के दखलंदाज़ी व देखरेख की आवश्यकता पड़ी | परंतु पाण्ड्य को  प्रसिद्धि मिलने शुरू हो गई और केंद्र चोल राज्य धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगे | 1178 A D में कुलोथूङ्गा चोल II, राजराजा चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल III  1178 -1218 A D      

कुलोत्थुंगा चोल III वेनाद के चेराओं, मदुरै में पाण्ड्य, श्रीलंका के सिंहला राजाओं  और मैसूर के होयसलाओं को बंदी बनाने मे सक्षम हुआ  | सदी ने घुमाव लिया और चोल साम्राज्य के दस्ता युक्त राजा जतवर्मन कुलसेकरन I ने चोलाओं के विरूद्ध विद्रोह किया और साल 1290 में मदुरा राजगद्दी पर जीत हासिल की |  चोलाओं ने उस पर आक्रमण किया और मदुरै को हथिया लिया | जतवर्मन कुलसेकरन I ने अपनी पत्नी व बेटे के साथ चोल राजा कुलोत्थुंगा के सामने हथियार डाल दिये  और उसके आत्मसमर्पण  के बाद , वह अपनी राजधानी दोबारा गया | परंतु इसके दौरान, मदुरै में पहले  पाण्ड्य का राज्याभिषेक भवन नष्ट हो गया  और इसमें वे तमाम दस्तावेज भी नष्ट हो गए जिनमे पाण्ड्य की पहले की कुछ जानकारी थी | इस हमले का बदला लेने के लिए कुलसेकरन के छोटे भाई मारवर्मन सुंदरा पाण्ड्य, जो 1216 A D  में शासन में आया, ने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया | सुंदरा पाण्ड्य के राजाओं ने चोल राजाओं के थ्ंजौर और उरईयूर के शहरों पर कब्जा कर लिया और चोल राजाओं को देश से निकाल दिया |उसकी सेना ने चिदम्बरम तक की पद यात्रा की और उसकी विजय की याद मे चिदम्बरम मंदिर मे तुलाभारम  किया और उसके वज़न के बराबर धन का दान दिया | परंतु, चोलाओं के ऊपर सुंदर पाण्ड्य की विजय के लिए होयसला सेना ने सरी रंगापट्टम की ओर पदयात्रा की | होयसला राजा वीरा बाल्लला III के दाखल के बाद चोल राज्यों को लौटा दिया गया परंतु, अब चोलाओं ने सुंदर पाण्ड्य का आधिपत्य स्वीकार कर लिया | यह द्वितीय पाण्ड्य साम्राज्य का पुनः जागरण और शक्तिशाली चोल सत्ता का पतन था |

राजराजा चोल III 1216-1256 A D      

जुलाई 1216 में जब राजाराज चोल III की सत्ता आई , पूर्व चोलाओं की तुलना में चोल राज्य एक संक्षिप्त प्रांत था | पाण्ड्य का दक्षिण और वेंगी में अहम नियंत्रण था और दूसरे क्षेत्र होयसलाओं के अंदर थे | पाण्ड्य की सेना ने चोल राजधानी मे प्रवेश कर लिया और राजराजा चोल III भाग गए | उन्हें सेंदमंगलम में कैद कर लिया गया | होयसला के राजा नरसिंहा ने दखल डाला और तभी चोल राजा को रिहा किया गया | राजराजा चोल III ने अपने बेटे राजेन्द्र चोल को 1246 A D में वारिस बनाया |

राजेंद्र चोल III  1246- 1280 A D     

राजेंद्र चोल की प्रभुता 1246 A D मे आई | उसने चोल राज्यों के तेज़ी से हो रहे पतन को रोकना चाहा पर इस समय होयसला विरोधात्मक हो गए थे और पाण्ड्य प्रभावशाली बन गए थे | चोल राज्य का पतन राजेंद्र चोल के साथ हो गया |