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दहसाला व्यावस्था

अकबर के वित्त मंत्री के रूप मे राजा टोडरमल ने राजस्व एकत्र करने की नयी व्यावस्था शुरू की जोकि ज़ब्ती व्यवस्था या दहसाला व्यवस्था के नाम से जानी गयी।
Aug 26, 2014 13:04 IST
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अकबर के वित्त मंत्री के रूप मे राजा टोडरमल ने राजस्व एकत्र करने की नयी व्यावस्था शुरू की जोकि ज़ब्ती व्यवस्था या दहसाला व्यवस्था के नाम से जानी गयी। इस व्यवस्था मे दस वर्ष मे हुई फसल की पैदावार तथा उत्पादन लागत का सावधानी पूर्वक सर्वेक्षण किया जाता था। यह व्यवस्था अकबर के द्वारा लागू की गई थी। इसमें पिछले दस साल मे उत्पादित विभिन्न फसलों तथा उनके औसत मूल्य की गणना करके औसत पैदावार का एक तिहाई भाग राज्य को दे दिया जाता था । वास्तव मे इतिहासकारो का विश्वास है कि यह मूल्यांकन की विधि सबसे महत्वपूर्ण थी । इस व्यवस्था की शुरूआत शेरशाह सूरी के दौर मे हुई थी। अकबर के शासनकाल मे इस व्यावस्था को लागू करने से पहले इसमे अनेक सुधार किये गये थे। यह व्यावस्था अकबर के साम्राज्य के केवल मुलतान, दिल्ली , इलाहबाद , अवध, आगरा और लाहौर जैसे प्रमुख राज्यो मे ही लागू थी।

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि दस साल मे हुई पैदावार औऱ उत्पादन लागत का बहुत ही सर्तकता और व्यापकता के साथ सर्वेक्षण किया जाता था। इसी व्यापक सर्वे के आधार पर हर फसल का कर नकदी मे तय किया जाता था। हर राज्य को राजस्व खंडो या दस्तूर  मे बाटां गया था जिन्मे हर राज्य के कर की अलग-अलग दरें थी। सभी के पास दस्तूर-ए-अमल यानि अपने राज्य की फसलों की सूची होती थी। यह व्यावस्था केवल उन ही राज्यो मे लागू किया गया था जिन राज्यो मे मुगल प्रशासन सर्वेक्षण कर सकता था और उनका रिकार्ड रख सकता था। इसी कारण गुजरात औऱ बंगाल मे यह व्यावस्था लागू नही की गई थी।

आईन-ए-दहसाला की व्यावस्था राजा टोडरमल द्वारा विकसित की गई थी। ज़मीन की सही नाप के  लिए बीघा (60 x 60 यार्ड) को क्षैत्रफल की मानक इकाई माना गया। एक नया गज़ गज़-ए-इलाही का इस्तेमाल शुरू हुआ जोकि 33 इंच लम्बा था और उस पर 41 अंक थे। ज़मीन पर कर का निर्धारण करते समय नियमित और फसल की पैदावार का ध्यान रखा जाता था। जिन जमीनो पर लगातार पैदावार होती थी उन्हे पोलज कहा जाता था। जो ज़मीन पिछले एक साल से खाली पड़ी है यानि परौति, से भी पूरा कर लिया जाता था ताकि उस पर जल्दी दोबारा खेती शुरू हो सके। जो ज़मीन तीन औऱ चार साल से खाली पड़ी होती थी उसे छाछर के रूप मे दर्ज किया जाता था। यह जमीन ज़्यादा कर लिया जाता था और तीसरे साल मे पूरा कर लगाया जाता था। ज़मीन की एक और केटेगरी थी बंजर यानि खाली पड़ी कृर्षि योग्य भूमि। इस जमीन को उत्पादन योग्य बनाने के लिए इस ज़मीन पर पूरा कर तब लगाया जाता था जब इस पर खेती शुरू हुए पांच वर्ष बीत जाएं।

ज़मीन के राजस्व निर्धारण करने के बाद उसे दस्तूर-ए-अमल( मूल्य सूची) के आधार पर नकदी मे बदल दिया जाता था । दस्तूर-ए-अमल को क्षैत्रीय और दस्तूर (ग्रामीण ईकाई) के स्तर पर तैयार किया गया था ताकि खाद्य फसलो का ध्यान रखा जा सके । इस प्रशासनिक व्यावस्था को सुचारू रूप से  लागू करने के लिए पूरे साम्राज्य को अनेक खडों (दस्तूरों) व परगना (उप-जिला)  मे उनकी समान उत्पादकता के आधार पर बांट दिया गया जाता था। तहसील स्तर तक दस्तूर-ए-अमल (फसलो की सूची) उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी प्रशासन की थी ताकि वहां भूमि राजस्व भूगतान की इस सूची को लगाया जा सके । इसके बाद हर किसान को एक पटटा औऱ कबूलियत ( कर भुगतान का समझौता) प्राप्त करता था।

प्रमुख इतिहासकारो द्वारा वर्णित ज़ब्ती औऱ दहसाला व्यावस्था की प्रमुख विशेषतांए –

• इस व्यावस्था के अंर्तगत ज़मीन की माप आवश्यक थी।
• हर फसल के लिए निश्चित नकद राजस्व दर दस्तूर कहलती थी।
• संपूर्ण राजस्व नकदी के रूप मे ही एकत्र किया जाता था।

इतिहासकारों के मुताबिक प्रशासनिक स्तर पर इस व्यावस्था में निम्नलिखित विशेषतांए थी-

• निश्चित औऱ स्थायी दस्तूर व्यावस्था के कारण अनिश्चितता और राजस्व की माग मे कमी व  ज़्यादती लगभग खत्म हो गयी।
• माप के द्वारा हमेशा ज़मीनो की दोबारा जांच की जाती थी व पता लगाया जाता था।
• निश्चित दस्तूर के कारण लोकल अधिकारियो को मनमानी करने के कोई मौका नही मिलता था।

इतिहासकारों ने ज़ब्ती व्यावस्था के कई सीमाएं भी बतायीं हैं जोकि निम्न है –

• प्रति बीघा का कर ज़ाबीताना कहलाता था जोकि माप की रखरखाव पर खर्च होता था जिससे यह व्यावस्था काफी खर्चीली हो जाती थी।
• इसमे अधिकरियो के ज़रिये अपनी शक्ति का दुरूपयोग होता था और वह जमीन की माप मे धोकाधड़ी करते थे।
• यह उस समय प्रयोग मे नही आता था जब ज़मीन की उत्पादक क्षमता कम हो जाए।
• यदि फसल उम्मीद के मुताबकि नही होती थी तो उसका सारा नुकसान किसान को उठाना पड़ता था।
• अबुल फज़ल के मुताबिक यदि किसान ज़ब्ती नही दे पाता था तो उसकी फसल का एक-तिहाई भाग राजस्व के तौर पर ले लिया जाता था।

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