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दिल्ली सल्तनत: कला, शिक्षा और व्यापार

दिल्ली सल्तनत या सल्तनत-ए-हिन्द/सल्तनत-ए-दिल्ली 1210 से 1526 तक भारत पर शासन करने वाले पाँच वंश के सुल्तानों के शासनकाल को कहा जाता है। दिल्ली सल्तनत पर राज करने वाले पाँच वंशों में चार वंश मूल रूप से तुर्क थे जबकि अंतिम वंश के शासक अफगान थे। इस लेख में हम सल्तनतकालीन कला, शिक्षा और व्यापार से संबंधित जानकारी दे रहे हैं|
Sep 19, 2016 17:54 IST
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दिल्ली सल्तनत या सल्तनत-ए-हिन्द/सल्तनत-ए-दिल्ली 1210 से 1526 तक भारत पर शासन करने वाले पाँच वंश के सुल्तानों के शासनकाल को कहा जाता है। दिल्ली सल्तनत पर राज करने वाले पाँच वंशों में चार वंश मूल रूप से तुर्क थे जबकि अंतिम वंश के शासक अफगान थे। ये पाँच वंश गुलाम वंश (1206 - 1290), ख़िलजी वंश (1290- 1320), तुग़लक़ वंश (1320 - 1423), सैयद वंश (1424 - 1452), तथा लोधी वंश (1452 - 1526) हैं। इस लेख में हम सल्तनतकालीन कला, शिक्षा और व्यापार से संबंधित जानकारी दे रहे हैं|

दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत शिक्षा, कला और व्यापार शैली में एक अद्भुत हिंदू और इस्लामी शैली का मिश्रण दृष्टिगोचर होता है|

दिल्ली सल्तनत के दौरान स्थापत्य एवं वास्तुकला 

दिल्ली सल्तनत काल में भारतीय स्थापत्य कला के क्षेत्र में जिस शैली का विकास हुआ, वह भारतीय तथा इस्लामी शैलियों का सम्मिश्रिण थी। इसलिए स्थापत्य कला की इस शैली को इण्डो इस्लामिक शैली कहा गया। इण्डो-इस्लामिक स्थापत्य कला शैली की विशेषताएँ निम्न थीं:-

1. सल्तन काल के निर्माण कार्य जैसे- क़िला, मक़बरा, मस्जिद, महल एवं मीनारों में नुकीले मेहराबों, गुम्बदों तथा संकरी एवं ऊँची मीनारों का प्रयोग किया गया था|

2. इस काल में मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे पर बनी मस्जिद में एक नये ढंग से पूजा घर का निर्माण किया गया था।

3. सल्तनत काल में सुल्तानों, अमीरों एवं सूफी सन्तों के स्मरण में मक़बरों के निर्माण की परम्परा की शुरुआत हुई थी।

4. इस काल में ही इमारतों की मज़बूती हेतु पत्थर, कंक्रीट एवं अच्छे क़िस्म के चूने का प्रयोग किया गया था।

5. सल्तनत काल में इमारतों में पहली बार वैज्ञानिक ढंग से मेहराब एवं गुम्बद का प्रयोग किया गया था। तुर्क सुल्तानों ने गुम्बद और मेहराब के निर्माण में शिला एवं शहतीर दोनों प्रणालियों का उपयोग किया था|

6. सल्तनत काल में इमारतों की साज-सज्जा में जीवित वस्तुओं का चित्रिण निषिद्ध होने के कारण उन्हें सजाने में अनेक प्रकार के फूल-पत्तियाँ, ज्यामितीय एवं क़ुरान की आयतें खुदवायी जाती थीं। कालान्तर में तुर्क सुल्तानों द्वारा हिन्दू साज-सज्जा की वस्तुओं जैसे- कमलबेल के नमूने, स्वस्तिक, घंटियों के नमूने, कलश आदि का भी प्रयोग किया जाने लगा था|  

सल्तनत काल के दौरान छोटे राज्य

दिल्ली सल्तनत के ग़ुलाम तथा ख़िलजी वंशों के शासनकाल को स्थापत्य कला के विकास की प्रथम अवस्था माना जाता है। इस काल की इमारतें हिन्दू शैली के प्रत्यक्ष प्रभाव में बनी है, जिनकी दीवारें चिकनी एवं मज़बूत हैं। इस काल में बने स्तम्भ, मंदिरों के प्रतीक हैं। मुसलमानों द्वारा निर्मित मस्जिदों के चारों तरफ़ मीनारें उनके उच्च विचारों का प्रतीक हैं। ग़ुलाम वंश के शासनकाल में बनी इमारतों में क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद, कुतुबमीनार, अढ़ाई दिन का झोपड़ा मस्जिद, नासिरुद्दीन महमूद का मक़बरा या सुल्तानगढ़ी, इल्तुतमिश का मक़बरा, सुल्तान बलबन का मक़बरा, मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह प्रमुख है| ख़िलजी वंश के शासनकाल में बनी इमारतों में अलाई दरवाज़ा, जमात ख़ाँ मस्जिद, ‘ऊखा मस्जिद’ एवं ख़िज़्र ख़ाँ द्वारा निर्मित निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह विशेष उल्लेखनीय है। तुग़लक़ वंश के शासकों ने ख़िलजी कालीन इमारतों की भव्यता एवं सुन्दरता के स्थान पर इमारतों की सादगी एवं विशालता पर अधिक ज़ोर दिया। तुग़लक़ वंश के शासनकाल में बनी इमारतों में तुग़लक़ाबाद का दुर्ग जिसे छप्पन कोट के नाम से भी जाना जाता है, ग़यासुद्दीन का मक़बरा, आदिलाबाद का क़िला, बारह खम्भा, कोटला फ़िरोज़शाह दुर्ग, फ़िरोज़शाह का मक़बरा, ख़ान-ए-जहाँ तेलंगानी का मक़बरा, खिड़की मस्जिद, काली मस्जिद, बेगमपुरी मस्जिद, कलां मस्जिद, कबीरुद्दीन औलिया का मक़बरा प्रमुख हैं| सैय्यद वंश के शासनकाल के दौरान बने इमारतों में सुल्तान मुबारक शाह का मक़बरा एवं मुहम्मद शाह का मक़बरा प्रमुख हैं| लोदी वंश के शासनकाल के दौरान बने इमारतों में बहलोल लोदी का मक़बरा, सिकन्दर लोदी का मक़बरा, मोठ की मस्जिद, 'बड़ा ख़ाँ एवं छोटे ख़ाँ का मक़बरा', 'शीश गुम्बद', 'दादी का गुम्बद', 'पोली का गुम्बद' एवं 'ताज ख़ाँ का गुम्बद' आदि प्रमुख ईमारत हैं|

कुतुबमीनार की तस्वीर

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Image source: www.jagran.com

दिल्ली सल्तनत के दौरान संगीत

जब तुर्क भारत में आये तो वे ईरान एवं मध्य एशिया की समृद्ध अरबी संगीत परम्परा को भी अपने साथ भारत लाए। तुर्क अपने साथ 'सारंगी' और 'रबाब' जैसे वाद्य यंत्र लाए, परन्तु यहाँ आकर उन्होंने 'सितार' और 'तबला' जैसे वाद्यों को भी अपनाया। दिल्ली सल्तनत के कुछ शासक, जैसे- बलबन, जलालुद्दीन ख़िलजी, अलाउद्दीन ख़िलजी एवं मुहम्मद तुग़लक़ ने संगीत के प्रति रुचि होने के कारण राज दरबारों में संगीत सभाओं का आयोजन करवाया था| इस काल में सूफ़ी सन्तों ने भी संगीत के विकास में योगदान किया। बलबन का पौत्र कैकुबाद सर्वाधिक संगीत प्रेमी सुल्तान था। बरनी ने इसके बारे में लिखा है कि- ‘कैकूबाद ने संगीतकारों एवं गजल गायकों को इतनी अधिक संख्या में संरक्षण प्रदान किया कि, राजधानी की गलियाँ तथा सड़कें इनसें भरी हुई थीं। बरनी ने इस समय के मशहूर संगीतकारों 'शाहचंगी', 'नुसरत ख़ातून' एवं 'मेहर अफ़रोज का उल्लेख किया है। अलाउद्दीन ख़िलजी के दरबार में तत्कालीन महान कवि एवं संगीतज्ञ अमीर ख़ुसरो को संरक्षण प्राप्त था। अमीर ख़ुसरो ने भारतीय एवं इस्लामी संगीत शैली के समन्वय से यमन, उसाक, मुआफिक, धनय, मुंजिर, फ़रगना जैसे अनेक राग-रागनियों को जन्म दिया। अमीर ख़ुसरो को सितार और तबले के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है| सर्वप्रथम उन्होंने भारतीय संगीत में कव्वाली गायन को प्रचलित किया। अमीर ख़ुसरों को तूतिये हिन्दअर्थात् 'भारत का तोता' आदि नाम से भी जाना जाता था। सल्तनत काल में दक्षिण भारत में संगीत पर आधारित कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की रचना हुई, जैसे-संगीत रत्नाकर, संगीत समयसार, संगीत शिरोमणि, संगीत कौमुदी, संगीत नारायण आदि। अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिण के महान गायक 'गोपाल नायक' को अपने दरबार में आमंत्रित किया था। इस काल में प्रचलित 'ख्याल गायकी' के अविष्कार का श्रेय जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्की को दिया जाता है। संगीत के क्षेत्र में उपलब्धि के कारण इसे नायक की उपाधि प्राप्त हुई थी।

भारतीय शास्त्रीय संगीत

सारंगी की तस्वीर

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Image source: www.payer.de 

दिल्ली सल्तनत के दौरान चित्रकारी

मुस्लिम आक्रमण के पूर्व भारत में चित्रकारी का हिन्दूबौद्ध एवं जैन चित्रकला के अन्तर्गत काफ़ी विकास हुआ था, परन्तु अजन्ता चित्रकला के बाद भारतीय चित्रकला का विकास अवरुद्ध हो गया था| सामान्यतः सल्तनत काल को भारतीय चित्रकला के पतन का काल माना जाता है। क़ुरान की दी गई व्यवस्था के अनुसार- 'किसी मनुष्य, पशु, पक्षी या फिर जीवधारी का चित्र बनाना पूर्णतः प्रतिबन्धित था। सम्भवतः सल्तनत काल में चित्रकारी के विकास के अवरुद्ध होने का यही कारण बना। फिर भी इस काल में चित्रकारी के कुछ प्रमाण मिले हैं, जो सल्तनतकालीन कुर्सी, मेज, अस्त्र-शस्त्र, बर्तन, पताका, कढ़ाई के वस्त्रों आदि पर दिखाई पड़ते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि, सल्तनतकालीन शासकों के ह्रदय में चित्रकला के प्रति घृणा की भावना नहीं थी। फिर भी वे चित्रकारों को संरक्षण नहीं दे पाए।

दिल्ली सल्तनत के दौरान शिक्षा

1258 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत कला और संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था| चूँकि मंगोलों ने मध्य और पश्चिमी एशिया के सांस्कृतिक केंद्रों को नष्ट कर दिया था जिसके कारण उस इलाके के कलाकारों के लिए भारत एक महत्वपूर्ण केंद्र साबित हुआ| इस अवधि में बगदाद और कॉर्डोबा में किसी भी प्रकार की नई वैज्ञानिक खोजों या इससे सम्बंधित तथ्यों के ऊपर खोजबीन के कार्यो के बारे में पता नहीं चलता है और शायद यही कारण था कि मध्य एवं पश्चिमी एशिया के कलाकारों और विद्वान समुदायों नें भारत की तरफ आने का निर्णय किया और भारत का रुख किया| उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र से आने वाले सभी कलाकार और विद्वान किसी भी प्रकार का पुस्तकालय अपने साथ नहीं लाये थे नतीजतन, जो भी कविता, संगीत और लेखन के सन्दर्भ में कार्य किया गया वह रचना किसी अन्य ज्ञान के संग्रह से प्रभावित नहीं थी| यही कारण था कि सल्तनत काल में पुस्तकालयों की कमी के कारण, भारत में बड़े शिक्षण संस्थानों को विकसित नहीं किया जा सका था|

भारत में मुस्लिम शासन के दौरान, धार्मिक अनुदान का प्रमुख, सद्र--जहान, होता था| इस अधिकारी का प्रमुख कार्य इस्लामी विषयों में शिक्षा प्रदान करने के लिए विभिन्न धार्मिक समूहों को कर मुक्त भूमि का अनुदान देना था| इस काल में दो बड़े शैक्षिक संस्थान(मदरसा) मुइजिया और नासीरिया की स्थापना उन्नत अध्ययन के लिए की गयी थी| इन संस्थानों में तीन मुख्य विषय तफ्शिर (कुरान की व्याख्या), हदीस (परंपरा), और फिकह (संविधान) पढाये जाते थे|

दक्कन में, विज्ञान विषयों के ऊपर खासा ध्यान दिया जाता था| फ़िरोज़, एक बहमनी राजा था जो वनस्पति विज्ञान, ज्यामिति, और खगोल विज्ञान जैसे विषयों से संबंधित शिक्षा प्रणाली को प्रोत्साहित करता था| चिकित्सा विज्ञान पर भी इस काल में खासा ध्यान दिया गया था| 1329 ईस्वी में जिया मुहम्मद नें दवा के ऊपर एक पांडुलिपि (मजमुआ--जीई) का लेखन कार्य किया था| इस पुस्तक में भारत और अरब की चिकित्सा प्रणाली के बारे में वर्णन किया गया है| चिकित्सा विज्ञान पर इस पुस्तक के अलावा मियां भुवा के द्वारा 1512 ईस्वी में तिब्ब--सिकंदरी का लेखन किया गया था| उल्लेखनीय हैं कि यह पुस्तक आंतरिक चिकित्सा प्रणालियों के सन्दर्भ में एक मानक पाठ्यपुस्तक थी|

सल्तनतकाल के प्रारंभिक इतिहास में अमीर ख़ुसरो एक प्रख्यात फारसी कवि थे| उनका लेखन कार्य समसामयिक घटनाओं से संबंधित था| अमीर ख़ुसरो द्वारा लिखे गए प्रमुख ग्रन्थ हैं- किरान-उस-सादेन, मिफ्ता-उल-फुतूह, आशिका, और खजाइन-उल-फुतूह आदि|

भारत में आर्यों का भौतिक और सामाजिक जीवन

दिल्ली सल्तनत के दौरान व्यापार

दिल्ली सल्तनत के दौरान हिंदुओं द्वारा स्वदेशी व्यापार एवं मुसलमानों द्वारा विदेशों में व्यापार किया जाता था|  इस काल में निर्यात किये जाने वाले वस्तुओं में खाद्यान्न और कपड़े प्रमुख थे| खाद्यान्न के अंतर्गत गेहूं, चावल, दाल, तिलहन,शक्कर आदि आते थे| कपास आदि सामानों को दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी अफ्रीका, और यूरोप के देशों में निर्यात किया जाता था| अरब व्यापारी इन महत्वपूर्ण उत्पादों को लाल सागर के माध्यम से दमिश्क और सिकंदरिया ले जाते थे| जहां से इन उत्पादों को वे भूमध्यसागरीय देशों को निर्यात करते थे और अपनी व्यापारिक गतिविधियों को अंजाम देते थे|

इस काल के अन्य उद्योगों में कपड़ा, धातु का काम, नील और कागज उद्योंग प्रमुख थे| मुस्लिम समुदाय रेशम के बेहतरीन किस्मों के लिए बंगाल पर निर्भर रहते थे| इसके अलावा धातु से जुड़े उद्योगों में तलवारें, बंदूकें, और अन्य घरेलू वस्तुओं का निर्माण प्रमुख था| इस काल में बंगाल में चीनी का विनिर्माण बड़े पैमाने पर किया जाता था और उसका निर्यात किया जाता था| दिल्ली कागज निर्माण का एक प्रमुख केंद्र था|

इन सभी उद्योगों को निजी स्वामित्व के अंतर्गत चलाया जाता था| लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि बड़े स्तर पर जितने भी उद्योग थे उन्हें सरकारी स्तर पर समर्थन मिला हुआ था| सिर्फ दिल्ली में ही शाही कारखानों में, रेशम के लिए चार हजार से अधिक बुनकर कार्यरत थे|

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