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न्यायिक समीक्षा और न्यायिक सक्रियता

न्यायिक समीक्षा का अर्थ है- एक कानून या आदेश की समीक्षा और वैधता निर्धारित करने के लिए न्यायपालिका की शक्ति को प्रर्दशित करना। दूसरी ओर, न्यायिक सक्रियता इस बात को संदर्भित करती है कि न्यायिक शक्ति का उपयोग मुखर और लागू होने से क्या इसका लाभ बडे पैमाने पर सामान्य लोगों और समाज को मिला पा रहा है कि नहीं। विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों के व्यापक अधिकार क्षेत्र के साथ भारत की एक स्वतंत्र न्यायपालिका है।
Dec 16, 2015 17:01 IST
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न्यायिक समीक्षा का अर्थ है- एक कानून या आदेश की समीक्षा और वैधता निर्धारित करने के लिए न्यायपालिका की शक्ति को प्रर्दशित करना। दूसरी ओर, न्यायिक सक्रियता इस बात को संदर्भित करती है कि न्यायिक शक्ति का उपयोग मुखर और लागू होने से क्या इसका लाभ बडे पैमाने पर सामान्य लोगों और समाज को मिला पा रहा है कि नहीं। विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों के व्यापक अधिकार क्षेत्र के साथ भारत की एक स्वतंत्र न्यायपालिका है।

न्यायिक समीक्षा: विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों के व्यापक अधिकार क्षेत्र के साथ भारत की एक स्वतंत्र न्यायपालिका है। न्यायिक समीक्षा को सिद्धांत के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसके तहत न्यायपालिका द्वारा विधायी और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा की जाती है। इसे आम तौर पर स्वतंत्र न्यायपालिका की बुनियादी संरचना के रूप में जाना जाता है (इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण मामला)।

हालांकि, न्यायिक समीक्षा को विधायी कार्यों की समीक्षा, न्यायिक फैसलों की समीक्षा, और प्रशासनिक कार्रवाई की समीक्षा के रूप में तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इसलिए शक्तियों के संतुलन को बनाए रखना, मानव अधिकारों, मौलिक अधिकारों और नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा को सुनिश्चत करना भी जजों (न्यायधीशों) का कर्तव्य है।

विधायी कार्यों की न्यायिक समीक्षा का अर्थ वह शक्ति है जो विधायिका द्वारा पारित कानून को संविधान में निहित प्रावधानों और विशेषकर संविधान के भाग 3 (पढ़ने का सिद्धांत) के अनुसार सुनिश्चित करती है। निर्णयों की न्यायिक समीक्षा के मामले में, उदाहरण के लिए जब एक क़ानून को इस आधार पर चुनौती दी गयी है कि इसे बगैर किसी प्राधिकरण या अधिकार से विधायिका द्वारा पारित किया गया है, विधायिका द्वारा पारित किया गया कानून वैध है या नहीं, इसके बारे में फैसला लेने का अधिकार अदालत के पास होता है। इसके अलावा हमारे देश में किसी भी विधायिका के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं है कि वे अदालतों द्वारा दिए गए निर्णय की अवज्ञा या उपेक्षा कर सकें।

प्रशासनिक कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा, अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्रशासनिक एजेंसियों पर संवैधानिक अनुशासन लागू करने का एक तंत्र है। न्यायिक कार्यों की न्यायिक समीक्षा गोलकनाथ मामले, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के मामले, मिनर्वा मिल्स आदि जैसे मामलों में देखे जा सकते हैं।

अदालतों के पास न्यायिक समीक्षा की व्यापक शक्तियां हैं, इन शक्तियों का बड़ी सावधानी और नियंत्रण के साथ प्रयोग किया जाता है। इन शक्तियों की निम्न सीमाएं हैं:

• इसके पास केवल निर्णय तक पहुँचने में प्रक्रिया का सही ढंग से पालन किया गया है कि नहीं,  तक ही अनुमति होती है लेकिन स्वयं निर्णय लेने की अनुमति नहीं होती है।

• इसे केवल हमारे सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय जैसी अदालतों को सौंपा जाता है

• जब तक बिल्कुल जरूरी ना हो तब तक नीतिगत मामलों और राजनीतिक सवालों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

• एक बार कानून के पारित होने पर यह स्थिति बदलने के साथ असंवैधानिक हो सकता है, यह शायद कानून प्रणाली में खालीपन पैदा कर सकती है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि अदालत द्वारा दिए गये निर्देश तभी बाध्यकारी होगें जब तक कानून अधिनियमित नहीं हो जाते हैं अर्थात् यह प्राकृतिक रूप से अस्थायी है।

• एक कानून की व्याख्या और उसे अमान्य कर सकता है लेकिन खुद कानून नहीं बना सकता है।

हालांकि, भारत में ऐसे मामले भी रहे हैं जब कार्यपालिका ने नीतियों की समीक्षा करने के लिए न्यायपालिका को आदेश दिया है। उदाहरण के लिए,  स्वास्थ्य मंत्रालय बनाम उपचार कार्य अभियान, जिसमें सरकार ने स्वयं एंटीरेट्रोवाइरल दवाओं की अपनी नीति के बारे में वितरण की समीक्षा करने और मां से बच्चे में एचआईवी के फैलने को रोकने के लिए एक प्रभावी और व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम की योजना को दिशा प्रदान की थी।

न्यायिक सक्रियता

इसे न्यायिक निर्णय लेने के एक ऐसे दर्शन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जहां न्यायाधीश संविधानवाद की बजाय सार्वजनिक नीति के बारे में अपने व्यक्तिगत विचार प्रकट करते हैं। भारत में सक्रियता से कुछ मामलों इस प्रकार हैं:

• गोलकनाथ मामले में जहां सुप्रीम कोर्ट ने यह घोषणा की थी कि भाग 3 में निहित मौलिक अधिकार अपरिवर्तनीय हैं और उन्हें सुधारा नहीं जा सकता है।

• केशवानंद भारती मामले में जहां सुप्रीम कोर्ट ने बुनियादी संरचना का सिद्धांत पेश किया, यानी संसद के पास संविधान के मूल ढांचे में फेरबदल किए बिना संशोधन करने की शक्ति है।

• सुप्रीम कोर्ट ने 2 जी घोटाले की सीबीआई जांच में एक पर्यवेक्षी भूमिका निभायी है।

• हसन अली खान के खिलाफ आतंकी कानूनों को लागू करने में।

इसके अलावा, न्यायिक सक्रियता की अवधारणा को भी कुछ आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा था। सबसे पहले, अक्सर यह कहा जाता है कि सक्रियता के नाम पर न्यायपालिका अक्सर व्यक्तिगत राय का पुनर्लेखन करती है। दूसरा, शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पराभूत होना है। हालांकि, इसके महत्व को इस प्रकार समझा जा सकता है कि यह पीड़ित व्यक्तियों के लिए आशा की एक जगह वाली संस्था है।

समीक्षा और सक्रियता के बीच केवल अलगाव की एक पतली रेखा है। न्यायिक समीक्षा का अर्थ कानून/अधिनियम के संविधान के अनुरूप होने के बारे में निर्णय करना है। वहीं दूसरी ओर न्यायिक सक्रियता का संबंध न्यायाधीश की एक व्यवहारिक अवधारणा से है। यह मुख्य रूप से सार्वजनिक हित, मामलों के शीघ्र निपटान आदि पर आधारित है।

न्यायिक समीक्षा की शक्ति के साथ, अदालतें मौलिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में कार्य करती हैं। इस प्रकार, न्यायिक समीक्षा की शक्ति को भारत के बुनियादी संविधान के भाग के रूप में मान्यता प्राप्त है।

न्यायिक सक्रियता, लोकतंत्र को और भी मजबूत बनाने में मदद करती है। इसकी अनुपस्थिति में लोकतंत्र सच्चे मायने में लोकतंत्र नहीं होता है। इसके अलावा, न्यायिक सक्रियता लोकतंत्र के आदर्शों पर ध्यान में रखती है असल में मुखर और प्रभावशाली आवाजों से अनसुनी आवाजों को दफन होने से बचाना सुनिश्चित करना वास्तव में आवश्यक है।