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पर्यावरण की रक्षा के लिए भारतीय प्रस्ताव

राज्यों के पर्यावरण एवं वन मंत्रियों का दो दिवसीय सम्मेलन 6 अप्रैल, 2015 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में शुरू हुआ था। जिसका समापन 7 अप्रैल 2015 को हुआ। इस दो दिवसीय सम्मेलन में अलग-अलग राज्यों के 30 मंत्रियों ने भाग लिया था, जिसमें विभिन्न मुद्दों जैसे- कचरे से संपदा, कारोबार को आसान बनाना, टीएसआर सुब्रह्मण्यम समिति की सिफारिशों, वन, वन्य जीवन, प्रदूषण से संबंधित मुद्दों, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन की एक विस्तृत श्रृंखला पर चर्चा की गयी।
Dec 23, 2015 17:37 IST
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राज्यों के पर्यावरण एवं वन मंत्रियों का दो दिवसीय सम्मेलन 6 अप्रैल, 2015 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में शुरू हुआ था। जिसका समापन 7 अप्रैल 2015 को हुआ। इस दो दिवसीय सम्मेलन में अलग-अलग राज्यों के 30 मंत्रियों ने भाग लिया, जिसमें विभिन्न मुद्दों जैसे- कचरे से संपदा, कारोबार को आसान बनाना, टीएसआर सुब्रह्मण्यम समिति की सिफारिशों, वन, वन्य जीवन, प्रदूषण से संबंधित मुद्दों, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन की एक विस्तृत श्रृंखला पर चर्चा की गयी।

सम्मेलन एक संकल्प के प्रस्ताव के साथ संपन्न हुआ जो पर्यावरण की रक्षा करते हुए व्यापार में सुधार करने के लिए नियमों में संशोधन कर नये उपायों का प्रस्ताव रखता है।

प्रस्ताव के मुख्य आकर्षक तथ्य:

अपशिष्ट प्रबंधन:

  • जनरेटर के अपशिष्ट की निकासी, और दो साल के भीतर सभी शहरी क्षेत्रों में अलग-अलग ठोस अपशिष्ट की डोर-टू-डोर संग्रहण की व्यवस्था, और अपशिष्ट प्रसंस्करण के लिए जगह अधिकृत कर कचरे की रीसाइक्लिंग की व्यवस्था करना।
  • औद्योगिक क्षेत्र / जोन / क्लस्टरों में कचरे की रीसाइक्लिंग इकाइयों की अनिवार्य योजना बनाना सुनिश्चित करना।
  • खतरनाक कचरे के लिए अन्य राज्यों के साथ सार्वजनिक उपचार भंडारण और निपटान की सुविधा प्रदान करना।
  • कचरा प्रबंधन की मंजूरी के लिए एक वेब आधारित मंच की व्यवस्था करना, ताकि विभिन्न योजनाओं को तुरंत स्वीकृति प्रदान की जा सके।
  • प्लास्टिक कचरा प्रबंधन और ई-कचरा प्रबंधन को सख्ती से लागू करने के लिए उत्पादकों की जिम्मेदारी को अच्छे तरीके से परिभाषित करना ।

वन्यजीव:

  • भारतीय वन अधिनियम,1927 के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए कानून में व्यापक संशोधन की आवश्यकता है।
  • राज्य वन विभाग को निष्पक्षता से प्रजातियों की आबादी का आकलन करने और सावधानी से जनसंख्या प्रबंधन के विकल्पों पर विचार करना होगा।
  • जिन राज्यों में बाघ पाए जाते है उनको प्रदेश स्तरीय संचालन समितियों का गठन करना होगा और बाघों के संरक्षण के लिए वैकल्पिक स्थानों पर बाघ संरक्षण स्थल बनाने होंगे ।

भारत के ग्रीन क्षेत्र की बहाली:

भारत के हरित आवरण (ग्रीन कवर) की रक्षा, सुरक्षा और विस्तार करने के लिए निम्न कदम उठाए जा रहे हैं:-

  • ग्रीन इंडिया मिशन (जीआईएम) के दिशा-निर्देशों के अनुसार तीन महीने के भीतर राज्य, जिला और क्लस्टर स्तर पर समितियों का गठन करना होगा।
  • जैव भूभौतिकीय और सामाजिक-आर्थिक मापदंडों के आधार पर परिदृश्य की पहचान करना।
  • देशी प्रजातियों की पहचान और प्रसार कर उनके स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल रखना।

प्रदूषण संबंधित मुद्दे:

  • शीघ्र मंजूरी के एकीकरण और निर्धारित सुरक्षा उपायों को लागू करने के लिए एक राष्ट्रीय पर्यावरण और वन डेटाबेस विकसित करने की दिशा में कार्य।
  • उल्लंघन के प्रावधानों को तर्कसंगत बनाना और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा प्रदूषण संबंधित अधिनियमों को नागरिक दंड प्रावधानों में शामिल करना।
  • स्थायी रेत खनन के दिशा निर्देशों का पालन करने और टिकाऊ तथा पर्यावरणीय अनुकूल मानदंडों को शीघ्र लागू करना।
  • उद्योगों की लाल, नारंगी और हरी श्रेणियों (रेड, ऑरेंज एंड ग्रीन कैटगरी) के वर्गीकरण के लिए प्रदूषण मानदंड अपनाना और इसके लिए राज्य के प्रतिनिधियों के साथ एक कमेटी को गठित करना।
  • लाल श्रेणी के संबंध में पांच वर्ष की वैधता अवधि, ऑरेंज श्रेणियों के लिए 10 वर्ष और हरी श्रेणी के लिए एक बार सहमति देने के साथ संचालन करने के लिए सहमति।

सीवेज का उपचार:

  • जल अधिनियम 1974 (प्रदूषण के निवारण और नियंत्रण) अधिनियम के तहत नगर प्राधिकरणों को सीवेज का उपचार करना वाध्यकारी।
  • प्रदूषण नियंत्रण कंट्रोल बोर्ड, द्वारा प्रस्तावित सीवेज के मानक उपचार फिर से करना और माध्यमिक उपचारित सीवेज को रिसाईकिल कर गैर-पीने योग्य उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त करना।

जैव विविधता:

  • जैव विविधता अधिनियम 2002 की धारा 63 के तहत अभी तक राज्यों ने विशिष्ट नियमों को अधिसूचित नहीं किया है जो दिसंबर 2015 में लागू होंगे और वो राज्य जिनके नियम अधिनियम के अनुरूप नहीं हैं उनके नियमों में दिसबंर 2015 में संशोधन होगा।
  • राज्यों को 2015-16 में कम से कम एक जैव विविधता विरासत स्थल घोषित करने पर विचार करना होगा।
  • जून 2015 में जारी किए गये पहुँच और लाभ शेयरिंग (एबीएस) और धारा 7 के तहत परिकल्पित दिशा-निर्देशों के अनुसार राज्यों को अपने अधिकार क्षेत्र में जैविक संसाधनों का उपयोग करने के लिए एक स्थान में पारदर्शी और प्रभावी तंत्र की स्थापना करनी होगी।

जलवायु परिवर्तन:

  • राज्य परियोजनाओं की एक शेल्फ शीघ्र तैयार करेंगे और राष्ट्रीय अनुकूलन कोष/राष्ट्रीय स्वच्छ पर्यावरण कोष के लिए 10 करोड़ रुपये तक की लागत वाली 1 परियोजना प्रस्तुत करेंगे और अनुकूलन कोष बोर्ड (एएफबी) के लिए एक परियोजना की अवधि 30 दिनों की होगी जिसकी अनुमानित लागत 30 करोड़ रूपए तक की होगी।
  • वित्तीय वर्ष 2015-16 के दौरान जलवायु परिवर्तन कार्रवाई कार्यक्रम (सीसीएपी) के तहत राज्यों को परियोजनाओं का प्रर्दशन तैयार करना होगा और हरित जलवायु कोष में जमा करने के लिए 10-25 मिलियन अमरीकी डॉलर तक की लागत वाली कम से कम 1 परियोजना प्रस्तुत करनी होगी।

केंद्र सरकार प्रदूषण क्षमता के आधार पर उद्योगों को एक तीन रंगीय योजना में फिर से वर्गीकृत करेगी:

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 7 अप्रैल 2015 को प्रदूषण क्षमता के आधार पर उद्योगों को फिर से वर्गीकृत करने लिए एक कलर-कोडेड प्रणाली का प्रस्ताव रखा है। प्रस्ताव के मुताबिक उद्योगों को तीन रंगों की योजना, अर्थात लाल, नारंगी और हरे रंग के तहत फिर से वर्गीकृत किया जाएगा।

यह प्रस्ताव दो दिवसीय राज्य पर्यावरण एवं वन मंत्रियों के सम्मेलन में पारित उस प्रस्ताव का हिस्सा था जिसमें पर्यावरण की रक्षा करते हुए व्यापार में सुधार के लिए नियमों में संशोधन करने के उपायों पर चर्चा की गयी थी।

प्रस्तावित कलर-कोडेड योजना

  • लाल (रेड) श्रेणी: 60 या उससे अधिक अंको के साथ औद्योगिक क्षेत्र
  • नारंगी (ऑरेंज) श्रेणी: 30 से 59 के बीच के अंकों के साथ औद्योगिक क्षेत्र
  • हरित (ग्रीन) श्रेणी: 15-29 के बीच के अंकों के साथ वाले औद्योगिक क्षेत्र

15 अंक से नीचे अंक वाले औद्योगिक क्षेत्रों को सफेद (व्हाइट) के रूप में पर्यावरण के अनुकूल माना जाएगा।

उद्योगों के लिए नई नवीकरण प्रणाली:

इसके अलावा, इसमें उद्योगों के प्रमाणीकरण की वार्षिक नवीकरण की वर्तमान प्रणाली को समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया है और इसे एक ऐसी  योजना के साथ बदलने करने का प्रस्ताव है जो कलर-कोडेड श्रेणियों पर आधारित हो है। नई नवीकरण प्रणाली इस प्रकार है:

  1. रेड श्रेणी के अंतर्गत आने वाले औद्योगिक क्षेत्रों को पांच वर्ष की वैधता अवधि के साथ संचालित करने की अनुमति दी जाएगी।
  2. ऑरेंज श्रेणी के अंतर्गत आने वाले औद्योगिक क्षेत्रों में दस साल के लिए काम करने के लिए अनुमति दी जाएगी।
  3. ग्रीन श्रेणी के अंतर्गत आने वाले औद्योगिक क्षेत्रों को एक-मुश्त अनुमति दी जाएगी। इसके अलावा, विभिन्न क्षेत्रों में इस कलर-कोडेड योजना के तहत अलग-अलग संचालित इकाइयां पर्यावरणीय मानदंडों के अनुपालन के लिए स्टार अर्जित करेंगी।

इस दो-दिवसीय सम्मेलन में विभिन्न राज्यों के 30 मंत्रियों ने भाग लिया था जिसमें कचरे से संपदा, व्यापार करने की सरलता, टीएसआर सुब्रह्मण्यम समिति की सिफारिशों, वन, वन्य जीवन, प्रदूषण से संबंधित मुद्दों, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों की एक विस्तृत श्रृंखला पर चर्चा की गयी।