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प्रतिपूरक वनीकरण कोष विधेयक, 2015

29 अप्रैल 2015 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संसद में प्रतिपूरक वनीकरण कोष (सीएएफ) विधेयक, 2015 को प्रस्तुत कर अपनी मंजूरी दे दी है। कानून का उद्देश्य गैर वन प्रयोजन के लिए आवंटित वन भूमि के एवज में जारी की गयी राशि का शीघ्र उपयोग सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्य दोनों तथा प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेशों को संस्थागत व्यवस्था प्रदान करना है। सीएएफ विधेयक, 2015, वनों के लिए सुरक्षा, जागरूकता और पारदर्शिता प्रदान करने के लिए संस्थागत व्यवस्था प्रदान करता है।
Dec 23, 2015 14:41 IST
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अप्रैल 29, 2015 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संसद में प्रतिपूरक वनीकरण कोष (सीएएफ) विधेयक, 2015 की प्रस्तुत कर अपनी मंजूरी दे दी है। कानून का उद्देश्य गैर वन प्रयोजन के लिए आवंटित वन भूमि के एवज में जारी की गयी राशि का शीघ्र उपयोग सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्य दोनों तथा प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेशों को संस्थागत व्यवस्था प्रदान करना है। प्रतिपूरक वनीकरण का अर्थ है, कि ऐसी जंगली जमीन जो कि अधिक उपयोग के कारण खाली हो चुकी है उसकी पूर्ति के लिए वहां पर वनीकरण करना  तथा कंपनियों को उत्पादन कार्यों के लिए किसी अन्य जगह पर भूमि  दे देना है ।

इसके लिए उन कंपनियों से पैसा एकत्र किया जाता है जिनकी वन भूमि परिवर्तित हो रही है।

केंद्र द्वारा प्रस्तावित सीएएफ विधेयक, 2015, जिसके निम्नलिखित उद्देश्य हैं:

  1. केंद्र और राज्य दोनों तथा प्रत्येक केंद्र शासित राज्यों को एक उपयुक्त संस्थागत व्यवस्था प्रदान करना।
  2. गैर वन प्रयोजन के लिए आवंटित वन भूमि के एवज में जारी की गयी मात्रा के उपयोग में सुरक्षा, जागरूकता और पारदर्शिता प्रदान करना।
  3. तदर्थ प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा) के साथ उपलब्ध संचित राशि जो खर्च नहीं की गई, का शीघ्र उपयोग सुनिश्चित करना।

लेकिन मौजूदा सीएएफ विधेयक में कई खामियां है जिस पर पर्यावरणविदों पर प्रकाश डाला गया है:

  1. बिल, VISTRIT वन भूमि को छोटे भागों में टूटने को बढ़ावा देता है जो भूदृश्य निर्माण को बाधित करता है, जानवरों के फैलाव को प्रभावित करता है और नयी सीमा का निर्माण करता है जिससे जंगलों में भारी गिरावट और दोहन DEKHNE KO MILTA है।
  2. प्रजातियां गैर मूल निवास से उन क्षेत्रों में बढ़ जाती है जहां उन्हें स्थापित किया जाता है। यह स्वदेशी या देशी प्रजातियों की गिरावट का कारण बनता है। उदाहरण के लिए केआईओसीएल (कुद्रेमुख आयरन ओर कंपनी लिमिटेड) ने भद्रा नदी बेसिन में पेड़ लगाए जहां पर उसने वहां के प्राकृतिक चरागाह को नष्ट कर दिया।
  3. प्रतिपूरक वनीकरण ने केवल वहां पर वृक्षों के आवरण को बढ़ाया जहां वीडीएफ (बहुत घने जंगल) थे और एमडीएफ (मामूली घने जंगल) में यह घट गया। इस पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी संसदीय स्थायी समिति द्वारा डाला गया है।
  4. विधेयक न्यूनतम वनों की प्राकृतिक बहाली और उत्थान प्रदान नहीं करता है।

समय की मांग यह है कि न्यूनतम पारिस्थितिकी बहाल करने के ओजीएफ के समेकन में वृद्धि हो और केवल विशिष्ट मामलों में जब वन में देशी प्रजातियां विलुप्त होने के साथ बेहद कम हों तो तब गैर देशी वृक्षारोपण के लिए धन का उपयोग होना चाहिए।

विधेयक का महत्व:

  1. प्रस्तावित कानून सीएएफ को भारत सरकार और प्रत्येक राज्य की लोक लेखा के तहत बनाए जाने वाले खर्चरहित ब्याज को उन्हें स्थानांतरित करके, संसद और राज्य विधानमंडल दोनों के व्यापक परिदृश्य के तहत अधिक से अधिक सार्वजनिक राय में लाना होगा।
  2. तदर्थ प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा) के साथ यह उपलब्ध संचित राशि जो खर्च नहीं की गई है, का भी शीघ्र उपयोग सुनिश्चित करेगा, जो वर्तमान में 38,000 करोड़ रुपये की है।
  3. इसके अलावा, यह एक कुशल और पारदर्शी तरीके से संग्रहित हालिया प्रतिकर शुल्क संग्रहण और जमा संचित बकाये पर ब्याज को भी सुनिश्चत करेगा जो प्रतिवर्ष लगभग 6000 करोड़ रुपये का होता है।
  4. वन भूमि के परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए इन राशियों का प्रयोग समय पर करने की सुविधा होगी जिसके लिए इन राशियों को जारी किया गया है।
  5. इसके अलावा वन भूमि के परिवर्तन के प्रभाव को कम करने से, इन राशियों के उपयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक परिसंपत्तियों का सृजन होगा और बड़ी मात्रा में रोजगार के अवसर (विशेष रूप से पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में) पैदा होंगे।