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प्राचीन भारत के 5 खोये हुए खजाने

यदि भारत को प्राचीन समय में सोने कि चिड़िया बोला जाता था तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि यहाँ पर मंदिरों, गुफाओं और राजाओं के पास बहुत बड़ी मात्रा में सोना चांदी, हीरे जवाहरात इत्यादि मौजूद थे | इसी अपार संपत्ति ने ही कई विदेशी आक्रमणकारियों को भारत पर चढ़ाई करने के लिए आकर्षित किया था |
Oct 3, 2016 18:30 IST
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यदि भारत को प्राचीन समय में सोने कि चिड़िया बोला जाता था तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि यहाँ पर मंदिरों, गुफाओं और राजाओं के पास बहुत बड़ी मात्रा में सोना चांदी, हीरे जवाहरात इत्यादि मौजूद थे | इसी अपार संपत्ति ने ही कई विदेशी आक्रमणकारियों को भारत पर चढ़ाई करने के लिए आकर्षित किया था |

1. पद्मनाभ मंदिर का खजाना:

भारत के केरल राज्य के तिरुवनंतपुरम में स्थित भगवान विष्णु का प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है। मान्यता है कि सबसे पहले इस स्थान से विष्णु भगवान की प्रतिमा प्राप्त हुई थी जिसके बाद उसी स्थान पर इस मंदिर का निर्माण किया गया है।
भगवान विष्णु को समर्पित पद्मनाम मंदिर को त्रावणकोर के राजाओं ने बनाया था। इसका जिक्र 9 शताब्दी के ग्रंथों मंख भी आता है। लेकिन मंदिर के मौजूदा स्वरूप को 18वीं शताब्दी में बनवाया गया था। मान्यता है कि तिरुअनंतपुरम नाम भगवान के 'अनंत' नामक नाग के नाम पर ही रखा गया है। यहां पर भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को 'पद्मनाभ' कहा जाता है।

1750 में महाराज मार्तंड वर्मा ने खुद को पद्मनाभ दास बताया। इसके बाद शाही परिवार ने खुद को भगवान पद्मनाभ को समर्पित कर दिया। माना जाता है कि इसी वजह से त्रावणकोर के राजाओं ने अपनी दौलत पद्मनाभ मंदिर को सौंप दी। त्रावणकोर के राजाओं ने 1947 तक राज किया। आजादी के बाद इसे भारत में विलय कर दिया गया। लेकिन पद्मनाभ स्वामी मंदिर को सरकार ने अपने कब्जे में नहीं लिया। इसे त्रावणकोर के शाही परिवार के पास ही रहने दिया गया। जानकारों का ये भी कहना है कि जब भारत सरकार हैदराबाद के निजाम जैसे देश के शाही परिवारों की दौलत को अपने कब्जे में ले रही थी तब हो सकता है कि त्रावणकोर के तत्कालीन राजा ने अपनी दौलत मंदिर में छुपा दी हो। यह मंदिर विदेशी आक्रमणकारियों से हमेशा ही बचा रहा है | 1790 में टीपू सुल्तान ने इस मंदिर को जीतने की कोशिश की थी लेकिन सफल नही हो सका था |

1991 में त्रावणकोर के अंतिम राजा बलराम वर्मा की मौत हो गयी | तब से पद्मनाभ स्वामी मंदिर का कामकाज शाही परिवार के अधीन एक प्राइवेट ट्रस्ट चलाता आ रहा है।
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Image source:anandkumarworld.blogspot.com

2007 में एक आईपीएस अधिकारी ने याचिका दायर कर इस खजाने पर राजपरिवार के अधिकार को चुनौती दी | 27 जून 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मंदिर के तहखाने खोलकर पूरी संपत्ति का ब्यौरा तैयार करने को कहा | इस मंदिर के 5 तहखानों से एक लाख करोड़ का खजाना मिला परन्तु 6 वें तहखाने को नही खोला जा सका क्योंकि राज परिवार इस तहखाने को खोलने की अनुमति नही दे रहा है| इस राज परिवार को डर है कि यदि इस मंदिर का छठा तहखाना खुल गया तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जाएगा। कहा जाता है कि आज से 140 साल पहले छठे तहखाने को खोलने की कोशिश की गई थी। तब तहखाना खोलते वक्त कई तरह की अंजान आवाजें और भय ने ऐसा होने नहीं दिया।

मान्यता है कि तब दरवाजा खोलते वक्त पानी की तेज धार जैसी और कई आवाजें जोर-जोर से सुनाई दी थी। ऐसा लगा मानों दरवाजें के पीछे समंदर उफान मार रहा हो। इस भयानक ध्वनि और दृश्य को देखकर वहाँ के पुजारी और अन्य लोग बुरी तरह से डर गए। यहाँ पुरानी मान्यता है कि यदि इस तहखाने को खोला गया तो दुनिया का सर्वनाश करीब आ जाएगा। यह तहखाना आज भी बंद है क्योंकि मंदिर के पुजारी और राज परिवार के लोग यह मानते है कि छठे तहखाने में एक गुप्त सुरंग है। इस सुरंग का रास्ता सीधे समुद्र में जाकर खुलती है। कहा जाता है कि इस सुरंग में एक विशालकाय कई सिर वाला काला नाग और अन्य नागों का झुण्ड है जो इस खज़ाने की हिफाज़त करते हैं शहर के लोगों का मानना है कि मंदिर का ये छठा तहखाना सीधे अरब सागर से जु़डा है जो इस पूरे राज्य को पश्चिमी दुनिया से जो़डता है।

माना जाता है कि त्रावणकोर शाही घराने ने अपने वक्त के ब़डे कारीगरों से एक तिलिस्म बनवाया है जिसमें समंदर का पानी भी शामिल है। वजह ये कि अगर उस वक्त कोई खजाने को हासिल करने के लिए छठा दरवाजा तो़डता तो अंदर मौजूद समंदर का पानी बाकी खजाने को बहा ले जाता और किसी के हाथ कुछ नहीं लगता।

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2. जयगढ़ किले का खजाना :

जयगढ़ का किला राजस्थान में स्थित है | मानसिंह प्रथम अकबर का सेनापति था | मान सिंह ने 1580 में अफगानिस्तान को जीत लिया था और मुहम्मद गजनी के खजाने को भारत लाया था |  वह टनों सोना-चांदी भी लूटकर अपने साथ लाया| कहा जाता है कि यह संपत्ति उन्होंने मुगल सल्तनत के हवाले न करके जयगढ़ के किले में छिपा दी थी | अरबी भाषा की एक पुरानी किताब हफ्त तिलिस्मत-ए-अंबेरी (अंबेर के सात खजाने) में भी इस बात का जिक्र है कि किले में अकूत सोना-चांदी छिपा हुआ है| जयगढ़ किले के नीचे पानी की सात विशालकाय टंकियां बनी हैं, माना जाता है कि खजाना इन्हीं में था|

कुछ लोग तो यह भी कहते है कि मानसिंह ने इस खजाने का बारे में जोधा को बता दिया था और उन्होंने यह खजाना फतेहपुर सीखरी में एक मंदिर में रखवा दिया था बाद में यह मंदिर नष्ट होने के साथ ही यह खजाना भी नष्ट हो गया |
कहा तो यह भी जाता है कि 1976 में देश में आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने इस खजाने की खोज में 6 महीने तक किले के अन्दर खुदाई करायी और सेना को भी इस काम में लगाया और अधिकारिक रूप से घोषणा की गयी कि सरकार को इस खुदाई में कुछ भी नही मिला | परन्तु सूत्रों के मुताबिक यह सही नही है बल्कि सच यह है कि ...

जब सेना ने अपना अभियान समाप्त किया तो उसके बाद एक दिन के लिए दिल्ली-जयपुर हाईवे आम लोगों के बंद कर दिया गया| कहा जाता है कि इस दौरान जयगढ़ किले के खजाने को सेना के ट्रकों में भरकर दिल्ली लाया गया था और सरकार इसे जनता की नजरों से छिपाकर रखना चाहती थी| हाईवे बंद होने की पुष्टि कई विश्वसनीय स्रोतों से होती है लेकिन सरकार ने कभी इसका स्पष्टीकरण RTI में भी ठीक-ठीक नहीं दिया है |

अगस्त, 1976 में भारत सरकार को पड़ोसी देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का एक पत्र मिला, इसमें उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी को लिखा था, ‘आपके यहां खजाने की खोज का काम आगे बढ़ रहा है और मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि आप इस दौरान मिली संपत्ति के वाजिब हिस्से पर पाकिस्तान के दावे का खयाल रखेंगी.’

जुल्फिकार अली भुट्टो के पत्र के जवाब में इंदिरा ने लिखा था कि, ‘हमने अपने कानूनी सलाहकारों से कहा था कि वे आपके द्वारा पाकिस्तान की तरफ से किए गए दावे का ध्यान से अध्ययन करें. उनका साफ-साफ कहना है कि इस दावे का कोई कानूनी आधार नहीं है. वैसे यहां खजाने जैसा कुछ नहीं मिला’|
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Image source:khabar.ibnlive.com

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3. सोन गुफा का खजाना :

बिहार के राजगीर में इस गुफा में बहुत सा धन होने का दावा किया जाता है | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग  के अनुसार ये गुफाएं तीसरी या चौथी शताब्दी की हैं | यह माना जाता है कि अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार को गिरफ्तार करके इसी गुफा में रखा था | बिंबिसार ने अपने धन को अजातशत्रु के हाथों से बचाने के लिए उसे इसी गुफा के तहखानों में छिपाया था | इस पूरी गुफा को चट्टानों को काटकर दो बड़े कमरे बनवाए गए थे। गुफा के पहले कमरे में जहां सिपाहियों के रुकने की व्यवस्था थी। वहीं, दूसरे कमरे में खजाना छुपा था। दूसरे कमरे को पत्थर की एक बड़ी चट्टान से ढंका गया है। इस गुफा की एक चट्टान पर शंख लिपि में कुछ लिखा है। इसके संबंध में यह मान्यता प्रचलित है कि इसी शंख लिपि में इस खजाने के कमरे को खोलने का राज लिखा है। जिसे आजतक कोई पढ़ नहीं पाया है।
अंग्रेजों ने भी इस गुफा में छिपे खानाजे को पाने के लिए तोपों से इस गुफा पर हमला किया था जिसके निशान आज भी इसके ऊपर देखे जा सकते हैं | पत्थरों से बनी यह गुफा इतनी मजबूत थी कि अंग्रेजों को खाली हाथ लौटना पड़ा था |
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4. हिमाचल प्रदेश की कमरूनाग झील का रहस्य: मंडी से करीब 60 किमी. की दूरी पर स्थित इस झील को लोग बहुत पवित्र मानते हैं | इसी आस्था के कारण लोग दूर-दूर से आकर कीमती गहनों और रुपयों को इस झील को अर्पित कर देते हैं | यह भी कहा जाता है कि इस झील में सोना चांदी चढ़ाने से मन्नत पूरी होती है। लोग अपने शरीर का कोई भी गहना यहाँ चढ़ा देते हैं। झील पैसों से भरी रहती है, ये सोना – चांदी कभी भी झील से निकाला नहीं जाता क्योंकि ये देवताओं का होता है। ये भी मान्यता है कि ये झील सीधे पाताल तक जाती है। इसमें देवताओं का खजाना छिपा है।
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5. चारमीनार की सुरंग का खजाना :

ऐतिहासिक गोलकुंडा का किला और चारमीनार के बीच 15 फीट चौड़ी और 30 फीट ऊंची भूमिगत सुरंग है | इस सुरंग को सुल्तान कुली कुतुबशाह ने बनवाया था | माना जाता है कि इस सुरंग में शाही परिवार ने अपना शाही खजाना रखवाया था|  वैसे तो इस सुरंग को बनवाने का उद्येश्य मुश्किल समय में किले से चारमीनार तक पहुंचना था, परन्तु बाद में यहाँ गुप्त तहखाने बनवाए गए और सोना चांदी के सिक्कों सहित बहुमूल्य रत्न जमा किये गए | निजाम मीर ओसमान अली ने 1936 में यह खजाना निकालने के लिए नक्शा बनाया था लेकिन खुदाई नहीं की गई|

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