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भारतीय गिद्ध विलुप्त क्यों हो रहे हैं– एक संपूर्ण विश्लेषण

1980 के दशक में भारत में सफेद पूंछ वाले गिद्धों की संख्या करीब 80 मिलियन (800 लाख) थी। आज (2016) इनकी संख्या 40 हजार से भी कम हो चुकी है। यह दुनिया में किसी भी पक्षी प्रजाति की सबसे तेजी से हुई कमी है। गिद्धों की संख्या में हुई कमी की वजह से वर्ष 2015 तक पर्यावरण स्वच्छता के लिए करीब 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च हुआ है।
Jul 15, 2016 09:32 IST
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1980 के दशक में भारत में सफेद पूंछ वाले गिद्धों की संख्या करीब 80 मिलियन (800 लाख) थी। आज (2016) इनकी संख्या 40 हजार से भी कम हो चुकी है। डोडो समेत यह दुनिया में किसी भी पक्षी प्रजाति की सबसे तेजी से हुई कमी है। जैसा कि हम जानते हैं कि गिद्ध स्वच्छता के काम में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। गिद्धों के विलुप्त होने से नतीजा यह हुआ कि चूहों की संख्या में अचानक बहुत बढ़ोतरी हो गई है। ऐसे ही कई और परिणाम देखे गए हैं। गिद्धों की संख्या में हुई कमी की वजह से वर्ष 2015 तक पर्यावरण स्वच्छता के लिए करीब 25 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च हुआ है।

भारतीय गिद्ध–

Jagranjosh

छवि स्रोत: ibc.lynxeds.com

भारतीय गिद्ध का परिचयः

गिद्ध मुर्दाखोर पक्षी होते हैं जो बड़े पशुओं के शवों को खाते हैं और इसलिए पर्यावरण को साफ करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गिद्ध का वर्णन भारत के पौराणिक महाकाव्य रामायण में किया गया है जहां रावण की चंगुल से सीता को बचाने के दौरान गिद्धों के राजा जटायु ने अपनी जान गंवा दी थी।

भारतीय गिद्ध से संबंधित तथ्यः

आज भारत में गिद्धों की तेजी से कम होती आबादी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। देश में गिद्धों की आबादी 60 मिलियन (1990 में) से कम होकर 40 हजार (2016) से भी कम रह गई है। 22 मार्च  2012 को यह घोषणा की गई थी कि आंध्र प्रदेश राज्य से गिद्ध समाप्त हो चुके हैं और हैदराबाद के नेहरू जैविक उद्यान में इस प्रजाति के सिर्फ पांच पक्षी जीवित है।

गिद्ध अलग– अलग प्रजातियों के होते हैं और औसतन भारत में इनके सबसे देशी प्रतिनिधियों का वजन 3.5 - 7.5 किलोग्राम के बीच होता है, लंबाई 75 – 93 सेमी और पंखों का फैलाव 6.3 - 8.5 फीट को होता है। गिद्ध 7,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ सकते हैं और एक बार में 100 किलोमीटर से भी अधिक की दूरी बहुत आसानी से कवर कर सकते हैं।

भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से चार विलुप्तप्राय की सूची में हैं।

तालिकाः भारत में पाए जाने वाले गिद्धों की प्रजातियां और उनके संरक्षण की स्थिति-

क्र.सं.

आम नाम

वैज्ञानिक नाम

संरक्षण की स्थिति

01.

बियर्डेड वल्चर  

जिपाइटस बारबाटस

कम चिंताजनक

02.

सिनसेरस वल्चर

एजिपियस मानाकुस

संकट के करीब

03.

इजिप्शियन वल्चर

नीयोफ्रोन प्रीक्नोपटेरस

विलुप्तप्राय

04.

ग्रिफ्फान वल्चर

जिप्स वुव्स

कम चिंताजनक

05.

हिमालयन वल्चर  

जिप्स हिमायियान

कम चिंताजनक

06.

इंडियन वल्चर  

जिप्स इंडिकस

गंभीर रूप से चिंताजनक

07.

बंगाल का गिद्ध

जीप्स बैंगालॉन्सिस

गंभीर रूप से चिंताजनक

08.

लाल– सिर वाला गिद्ध  

सारकोजिप्स कैलवस

गंभीर रूप से चिंताजनक

09.

लंबी– चोंच वाला गिद्ध  

जिप्स टेरनूईरोस्ट्रिस

गंभीर रूप से चिंताजनक

स्रोत: आईयूसीएन रेड डाटा किताब

गिद्धों से लाभः

1. गिद्ध पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी होते हैं। ये मृत और सड़ रहे पशुओं के शवों को भोजन के तौर पर खाते हैं और इस प्रकार मिट्टी में खनिजों की वापसी की प्रक्रिया को बढ़ाते बैं। इसके अलावा, मृत शवों को समाप्त कर वे संक्रामक बीमारियों को फैलने से भी रोकते हैं। गिद्धों की अनुपस्थिति में मूषक और आवारा कुत्तों जैसे पशुओं द्वारा रेबीज जैसी बीमारी के प्रसार को बढ़ाने की संभावना बढ़ जाएगी।

2. भारत में पारसी धर्म (पारसी समुदाय) के अनुयायी अपने मृत शवों के निराकरण के लिए परंपरागत रूप से गिद्धों पर निर्भर करते हैं। इसलिए, कई सदियों से भारत के गिद्ध पारसी धर्म के लोगों के लिए महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवा प्रदान कर रहे हैं।

भारतीय गिद्धों की मौत के कारण :

1. बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के विश्लेषण के अनुसार डिक्लोफेनाक (Diclofenac) का पशु-चिकित्सा में उपयोग भारत में गिद्धों के लिए मुख्य खतरा है। डिक्लोफेनाक एक गैर–स्टेरॉयडल सूजन–रोधी दवा (NSAID) है जो मांसपेशियों की दर्द के समय लगाए जाने वाले लगभग सभी प्रकार के जेलों, क्रीमों और स्प्रे का एक घटक है।

2. यह दवा पशुओं पर भी समान रूप से प्रभावी होती है और जब कामकाजी पशुओं को इसे दिया जाता है तो उनके जोड़ों का दर्द कम हो जाता है और उन्हें अधिक समय तक कामकाजी बनाए रखता है। इसलिए पशुओं में दर्द निवारक के तौर पर डिक्लोफेनाक का बड़े पैमाने पर प्रयोग भारत में गिद्धों की मौत की वजह है।

चूंकि गुर्दों को इस दवा को शरीर से बाहर करने में काफी समय लग जाता है इसलिए मृत्यु के बाद भी यह पशु के शरीर में मौजूद रहता है। चूंकि गिद्ध मुर्दाखोर होते हैं और इसलिए वे मृत पशुओं के शवों को भोजन के तौर पर ग्रहण करने लगते हैं। एक बार जब वे डिक्लोफेनाक संदूषित मांस का सेवन कर लेते हैं तो उनके गुर्दे काम करना बंद कर देते हैं और उनकी मौत हो जाती है।

3. भारत में गिद्धों के लिए कीटनाशक प्रदूषण भी एक खतरा है। क्लोरीनयुक्त हाइड्रोकार्बन डी.डी.टी (डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राईक्लोरोइथेन) का प्रयोग कीटनाशक के तौर पर किया जाता है। यह गिद्धों के शरीर में खाद्य श्रृंखला के माध्यम से प्रवेश करता है जहां यह एस्ट्रोजन हार्मोन की गतिविधि को प्रभावित करता है, परिणामस्वरूप अंड कोश कमजोर हो जाता है। इससे अंडों की असामयिक सोने की प्रक्रिया होती है जिससे भ्रूण की मौत हो जाती है।

4. शिकारी हाथी, बाघ, गैंडा, हिरण और भालू जैसे जंगली पशुओं के चमड़े, दांत, कस्तूरी, सींग, शाखायुक्त सींग और बाइल को निकालने के लिए जहरीले भोजन का सहारा लेते हैं। जब जहरीला भोजन खा कर मरने वाले पशुओं के शवों को गिद्ध खाते हैं तो वे भी मर जाते हैं।

भारत में गिद्धों का कैसे संरक्षित करें:

गिद्धों का समाप्त होता जाना गंभीर चिंता का विषय है और इन विलुप्तप्राय होते पक्षियों को बचाने के लिए तत्काल कार्रवाई की जाने की आवश्यकता है। भारत में गिद्धों को संरक्षित करने के लिए निम्नलिखित रणनीति के अपनाए जाने की जरूरत है।

1. डिक्लोफेनाक का कारगर विकल्प विकसित करने और उपलब्ध विकल्प मेलॉक्सिकैम पर सब्सिडी देने की जरूरत है।

2. जंगलों में गिद्धों की, खास कर गिद्ध के विलुप्तप्राय और संकटग्रस्त प्रजातियों की फिर से वापसी के उद्देश्य से Caxtive-breeding programme को बड़े पैमाने पर शुरु करने की आवश्यकता है।

3. गिद्धों के लिए विषमुक्त भोजन, स्वच्छ पानी, बोन चिप्स और सुरक्षा एवं स्वतंत्रता हेतु तार से घेरे हुए खुली छत वाले बसेरों के माध्यम से गिद्ध फीडिंग स्टेशन की स्थापना करने की जरूरत है।

4. सरकार को पारसी शवदाहगृहों के पास शवों के अपवहन हेतु गिद्ध अभयारण्य बनाने चाहिए। पर्याप्त भोजन की उपलब्धता से गिद्धों की आबादी को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

5. डी.डी.टी. जैसे क्लोरीनयुक्त हाइड्रोकार्बन्स के प्रयोग पर तत्काल प्रतिबंध लगाए जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

भारत में तेजी से कम होती गिद्धों की संख्या गंभीर चिंता का विषय है और सरकार को इन मुर्दाखोर पक्षियों के संरक्षण के लिए तत्काल ध्यान देने की जरूरत है ताकि पर्यावरण साफ– सुथरा बना रह सके और रेबीज और इसके जैसी अन्य घातक बीमारियों से होने वाली मौतों से बचा जा सके।

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