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भारतीय संसद

भारत संघ की सर्वोच्च विधायी अंग को संसद कहा जाता है। भारतीय संविधान हमें एक संसदीय लोकतंत्र प्रदान करता है, भारत की संसद देश के शासन में प्रमुख स्थान रखती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79– 122 में भारत के संसद की संरचना, शक्तियां और प्रक्रियाओं के बारे में उल्लेख किया गया है। राज्यसभा में सीटों का आवंटन चौथी अनुसूची में निहित प्रावधानों के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों द्वारा पूरा किया जाना है।
Dec 30, 2015 10:46 IST
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भारत संघ की सर्वोच्च विधायी अंग को संसद कहा जाता है। भारतीय संविधान हमें एक संसदीय लोकतंत्र प्रदान करता है, भारत की संसद देश के शासन में प्रमुख स्थान रखती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79– 122 में भारत के संसद की संरचना, शक्तियां और प्रक्रियाओं के बारे में उल्लेख किया गया है।

संरचना

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 79 कहता है कि संघ के लिए संसद होनी चाहिए जिसमें राष्ट्रपति और दो सदन– राज्य सभा (राज्यों के परिषद– काउंसिल ऑफ स्टेट्स) और लोकसभा (लोगों का सदन– हाउस ऑफ द पीपुल) हों।

संविधान का अनुच्छेद 80 राज्य सभा की संरचना निर्दिष्ट करता है जिसमें राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत 12 सदस्य और राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों के 238 प्रतिनिधि होते हैं।

राज्यसभा में सीटों का आवंटन चौथी अनुसूची में निहित प्रावधानों के अनुसार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों द्वारा पूरा किया जाना है।

राज्यों से प्रतिनिधित्व– इनका चुनाव एकल हस्तांतरणीय मत के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाएगा। इसलिए उपर दिए गए तथ्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक राज्य के सीटों की संख्या उस राज्य की जनसंख्या के अनुसार बदलती रहती है। इसलिए बड़े राज्यों के सीटों की संख्या छोटे राज्यों की तुलना में अधिक होती है।

केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधिः परंपरा के अनुसार, प्रतिनिधियों का चयन परोक्ष रुप से निर्वाचक मंडल के सदस्यों द्वारा किया जाता है और चुनाव एकल हस्तांतरणीय मत के जरिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार आयोजित किया जाता है। सभी केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ दिल्ली और पॉन्डिचेरी के ही प्रतिनिधि होते हैं क्योंकि बाकी सभी केंद्र शासित प्रदेशों की आबादी बहुत कम है।

मनोनीत सदस्य– वे व्यक्ति जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है, उन्हें राज्यसभा में बिना निर्वाचन प्रक्रिया में शामिल हुए, प्रवेश करने का अवसर प्रदान किया जाता है। हाल ही में यह बात सुर्खियों में रही जब सचिन तेंदुलकर को मनोनीत किया गया, क्योंकि इस धारा के अनुसार खिलाड़ियों को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत कर राज्य सभा में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है लेकिन बाद में इसे स्वीकार कर लिया गया था।

अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना बताता है जिसमें राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में हुए प्रत्यक्ष चुनाव से निर्वाचित 530 सदस्यों से अधिक नहीं हो सकते; 20 से अधिक लोग केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते; 2 एंग्लो– इंडियन।

राज्यों का प्रतिनिधित्व– इनका चुनाव जनता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रयोग कर करती है। लोक सभा में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या निर्धारित होती है। सीटों की संख्या का निर्धारण सभी राज्यों के लिए राज्यों की संख्या और वहां की जनसंख्या के अनुपात के बराबर होती है। इसमें अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए जनसंख्या अनुपात के आधार पर सीटों के आकर्षण का भी प्रावधान है।

केंद्र शासित प्रदेशों से प्रतिनिधित्व– संसद द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार लोकसभा में केंद्र शासित प्रदेशों का प्रत्यक्ष निर्वाचन अधिनियम 1965 पारित किया गया था और इसलिए वे भी जनता द्वारा चुने जाते हैं।

मनोनीत सदस्य– अगर राष्ट्रपति को यह लगे कि एंग्लो– इंडियन समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा है तो राष्ट्रपति के पास एंग्लो– इंडियन समुदाय के 2 सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार होता है।

संसद की सदस्यता की योग्यता–

अनुच्छेद 84 के अनुसार, संसद के सदस्यों की योग्यता इस प्रकार है। इसमें कहा गया है कि एक व्यक्ति सांसद बनने की योग्यता तभी रखता है जब वह

• भारत का नागरिक हो।

• राज्यसभा के मामले में सदस्य की उम्र 30 वर्ष और लोकसभा के मामले में 25 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।

• समय– समय पर संसद द्वार वर्णित इस प्रकार की अन्य योग्यता रखना। तदनुसार संसद ने रिप्रेजेंटेशन ऑफ पिपुल्स एक्ट, 1951 पारित किया। इस अधिनियम के अनुसार अतिरिक्त योग्यता इस प्रकार हैं।

• एक व्यक्ति जब तक कि भारत में संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता न तो तब तक वह लोकसभा में किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के प्रतिनिधि के तौर पर चुने जाने योग्य नहीं होगा।

• एक व्यक्ति लोकसभा के लिए चुने जाने के योग्य नहीं होगा जब तक कि वह किसी भी राज्य में अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीट पर, किसी भी राज्य या उस राज्य के लिए क्रमशः अनुसूचित जाति/ जनजाति का सदस्य हो और संसदयी निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता हो।

• अगर किसी व्यक्ति को दोषी करार देते हुए उस पर सिर्फ जुर्माना लगाया गया हो तो वह व्यक्ति दोषी करार दिए जाने की तारीख से 6 वर्षों की अवधि तक या सजा दिए जाने पर, सजा दिए जाने की तारीख से 6 वर्षों की अवधि तक और रिहा किए जाने की तरीख से और 6 वर्षों की अवधि तक वह अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

• अगर चुनाव आयोग इस बात से संतुष्ट है कि व्यक्ति चुनाव खर्च का लेखा– जोखा निर्धारित समय और अपेक्षित ढंग से करने में सफल रहा है।

• भ्रष्टाचार और देशद्रोह के आधार पर अयोग्य।

रिप्रेजेंटेशन ऑफ पिपुल्स एक्ट 1951 के तहत निम्नलिखित को भ्रष्ट आचरण के रूप में घोषित किया गया है:

• किसी भी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति, वंश, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट देना या उसे वोट देने से रोकना।

• धर्म, वंश, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर विभिन्न नागरिक समूहों के बीच नफरत की भावना को बढ़ावा देना।

• किसी भी उम्मीदवार के व्यक्तिगत चरित्र या आचरण के बारे में गलत तथ्य या कथन का प्रकाशन

• बूथ पर कब्जा करना

• निर्दिष्ट के उल्लंघन हेतु किया गया खर्च

• सरकारी नौकरी वाले किसी भी व्यक्ति से सहायता प्राप्त करना

• मतदाताओं को किसी भी मतदान केंद्र पर मुफ्त में आने– जाने के लिए वाहन किराए पर लेना या खरीदना

राज्य सभा की विशेष शक्तियां

• राज्य सूची में सूचीबद्ध किसी भी विषय पर कानून बनाने के लिए संसद को अधिकृत कर सकता है (अनुच्छेद 249)

• संसद को केंद्र और राज्य दोनों ही के लिए नई अखिल भारतीय सेवाएं / नौकरियां बनाने को अधिकृ कर सकता है।

स्पीकर और अध्यक्ष के बीच अंतर

• स्पीकर सदन (लोकसभा) का सदस्य होता है लेकिन अध्यक्ष सदन (राज्यसभा) का सदस्य नहीं होता।

• जब स्पीकर को हटाए जाने का प्रस्ताव विचाराधीन होता है तब स्पीकर भी वहां उपस्थित हो सकते हैं और मतदान प्रक्रिया में हिस्सा ले सकते हैं ( प्रथम उदाहरण), लेकिन अध्यक्ष सिर्फ बोल सकते हैं, मतदान में

हिस्सा नहीं ले सकते।

• स्पीकर यह फैसला करता है कि विधेयक धन विधेयक है या नहीं लेकिन अध्यक्ष के पास ऐसा फैसला करने का कोई अधिकार नहीं होता।

• स्पीकर संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करता है जबकि अध्यक्ष नहीं।

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष एवं स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के वेतन और भत्ते– इन्हें कानून द्वारा संसद द्वारा निर्धारित वेतन और भत्तों का भुगतान किया जाएगा और जब तक कि इस बारे में प्रावधान न किया जाए, इनके वेतन और भत्ते हमारे संविधान की दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट वेतन और भत्ते के समान होगी।

संसद की कार्यवाही

प्रत्येक सदन अपनी कार्यवाही का मालिक है और अपनी कार्यवाही और कामकाज के संचालन के लिए संविधान के प्रावधानों के अनुसार नियम बना सकता है। संसद में किसी भी कार्यवाही की वैधता पर प्रक्रिया में कथित अनियमितता के आधार पर अदालत में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। संविधान में कार्यवाही और कामकाज के कुछ मूल नियम दिए गए हैं। संसदीय बैठक की शुरुआत का प्रथम घंटा प्रश्न काल होता है। इस दौरान सदस्य ऐसे सवाल पूछते हैं जिसका जवाब मंत्री देंगे। तदनुसार प्रश्नों को तारांकित किया जा सकता है जिसके लिए मंत्री मौखिक जवाब देंगे और अन्य सदस्य मंत्री द्वारा दिए गए जवाब के आधार पर पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं। जिन प्रश्नों के जवाब मंत्री आमतौर पर लिखित में देते हैं उन्हें अतारांकित रखा जा सकता है। दूसरे प्रकार का प्रश्न अल्प सूचना प्रश्न होता है जिसके लिए प्रश्न पूछने से पहले 10 दिनों का नोटिस दिया जाता है। माना जाता है कि मंत्री द्वारा ऐसे प्रश्नो का भी जवाब मौखिक होगा।

प्रश्नकाल के बाद शून्य काल आता है जो दिन के एजेंडे तक चलता है। संसद सदस्य इसका उपयोग बिना किसी पूर्व नोटिस के प्रश्न पूछने के लिए करते हैं। संविधान में हिन्दी और अंग्रेजी को संसद की भाषा घोषित किया है। हालांकि पीठासीन अधिकारी किसी भी अन्य भाषा के प्रयोग की अनुमति दे सकते हैं। इसके अलावा प्रत्येक मंत्री और अटॉर्नी जरनल को किसी भी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने का अधिकार है। इन्हें सदन में बोलने का भी अधिकार है लेकिन इनके पास जिस सदन से ये संबंधित होते हैं, उसके अलावा किसी अन्य सदन में मतदान करने का अधिकार नहीं होता।

सदन की कार्यवाही– समय– समय पर राष्ट्रपति प्रत्येक सदन को समन देते हैं। एक सत्र को आयोजित करने का अधिकतम अवधि 6 माह की होती है यानि सदन की बैठक एक वर्ष में कम– से– कम दो बार होनी चाहिए। आम तौर पर सत्रों को इस प्रकार तीन सत्रों में वर्गीकृत किया जाता है–

• बजट सत्रः फरवरी– मार्च

• मानसून सत्रः जुलाई– सितंबर

• शीतकालीन सत्रः नवंबर– दिसंबर

संसद की भूमिका

इसके अधिकारों और कार्यों को निम्नलिखित तरीके से वर्गीकृत किया जा सकता है

1. विधायी शक्तियां

2. कार्यकारी शक्तियां

3. वित्तीय शक्तियां

4. संघटक शक्तियां

5. न्यायिक शक्तियां

6. निर्वाचन शक्तियां

7. अन्य शक्तियां

1) विधायी शक्तियां– हमारे संविधान में सभी विषय राज्य, संघ और समवर्ती सूची में विभाजित हैं। समवर्ती सूची में संसदीय कानून राज्य विधायी कानून से ऊपर है। संविधान के पास निम्नलिखित परिस्थितियों में राज्य विधानसभा के संबंध में कानून बनाने का अधिकार है–

• जब राज्यसभा इस आशय का प्रस्ताव पारित करे

• जब राष्ट्रीय आपातकाल चल रहा हो

• जब दो या अधिक राज्य संसद को ऐसा करने का अनुरोध करें

• जब अंतरराष्ट्रीय समझौतों, संधियों और समझौतों को लागू करने के लिए जरूरी हो

• जब राष्ट्रपति शासन लगा हो।

2) कार्यकारी शक्तियां– सरकार के संसदीय स्वरुप के अनुसार संसद के अधिनियमों और नीतियों के लिए उसके कार्यकारी जिम्मेदार हैं। इसलिए संसद समितियों, प्रश्नकाल, शून्य काल आदि जैसे विभिन्न उपायों द्वारा नियंत्रण रखती है। मंत्री समग्र रूप से संसद के लिए जिम्मेदार होते हैं।

3) वित्तीय शक्तियां– इसमें बजट के लागू होने, वित्तीय समितियों ( बजटीय नियंत्रण के बाद) के माध्यम से वित्तीय खर्च के संबंध में सरकार के प्रदर्शन की छानबीन शामिल है।

4) संघटक शक्तियां– यानि संविधान में संशोधन करना, जरूरी कानून पारित करना।

5) न्यायिक शक्तियां– इसमें शामिल हैं

• संविधान के उल्लंघन के लिए राष्ट्रपति पर महाभियोग

• सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाना

• उपराष्ट्रपति को हटाना

• जब सदस्य को पता हो कि वह सदन में बैठने का पात्र नहीं है फिर भी वह सदन में उपस्थित हो, शपथ लेने से पहले ही सदस्य के तौर पर काम करने आदि जैसे विशेषाधिकार का उल्लंघन करने पर सदस्यों को सजा देना।

6) निर्वाचन शक्तियां– राष्ट्रपति और उप–राष्ट्रपति के चुनाव में इसकी भागीदारी है। लोकसभा के सदस्य स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव अपने सदस्यों में से करते हैं। इसी प्रकार राज्यसभा के सदस्य उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं।

7) अन्य शक्तियां–

• राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करना

• आपातकाल लगाना

• क्षेत्र को बढ़ाना या कम करना, नाम बदलना, राज्यों की सीमा में बदलाव।

• राज्य विधानमंडल को बनाना या निरस्त करना आदि। समय– समय पर कोई भी शक्ति दी जा सकती है।

संविधान का अनुच्छेद 245 ने घोषित किया है कि संसद भारत वर्ष के लिए या इसके किसी भी हिस्से के लिए कानून बना सकता है औऱ राज्य विधान मंडल पूरे राज्य या राज्य के किसी भी हिस्से के लिए कानून बना सकता है। संविधान की सातवीं अनुसूची संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विषयों को डालकर केंद्र और राज्य के बीच विधायी शक्तियों का बंटवारा करती है। केंद्र सूची या समवर्ती सूची में शामिल किसी भी विषय पर केंद्र कानून बना सकता है। समवर्ती सूची में सूचीबद्ध विषय पर राज्य द्वारा बनाए गए कानून को संसद निरस्त कर सकती है। इन शक्तियों के अलावा, संसद को और भी शक्तियां प्रदान की गईं हैं। संविधान ने निम्नलिखित परिस्थितयों में राज्य के विषय पर कानून बनाने के लिए संसद को शक्तियां प्रदान की हैं–

(i) जब राज्य सभा कोई प्रस्ताव उपस्थित सदस्यों के दो– तिहाई समर्थन और वोट से पारित कर दे

(ii) जब आपातकाल चल रहा हो

(iii) जब दो या अधिक राज्य मिलकर संसद में अनुरोध करें

(iv) जब किसी अंतरराष्ट्रीय संधि, समझौते या सम्मेलन को लागू करने के लिए संसद के लिए जरूरी हो

(v) जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हो

कार्यकारी शक्तियां और कार्य

भारत में, राजनीतिक कार्यपालिका संसद का हिस्सा है। संसद प्रश्नकाल, शून्य काल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, आधे घंटे की चर्चा आदि जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से कार्यवाही पर नियंत्रण रखती है। संसदीय समितियों में विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य निर्वाचित/ मनोनीत किए जाते हैं। इन समितियों के माध्यम से संसद सरकार पर नियंत्रण रखती है। संसद द्वारा गठित मंत्रालय आश्वासन समिति मंत्री द्वारा संसद में दिए गए आश्वासन को पूरा किया जाना सुनिश्चित करती है।

संविधान के अनुच्छेद 75 में कहा गया है कि मंत्रियों की परिषद लोकसभा में विश्वासमत प्राप्त रहने तक बनी रहेगी। मंत्री, संसद के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं। लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित कर लोकसभा मंत्री परिषद को हटा सकता है। इसके अलावा, लोकसभा निम्नलिखित तरीकों से सरकार में विश्वास की कमी व्यक्त कर सकती है–

(i) राष्ट्रपति के उद्घाटन भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित न कर

(ii) धन विधेयक खारिज कर

(iii) निंदा प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव पारित कर

(iv) कटौती प्रस्ताव पारित कर

(v) महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार को हरा कर

संसद की ये शक्तियां सरकार को संवेदनशील और जिम्मेदार बनाने में मदद करती हैं।

वित्तीय शक्तियां और कार्य

वित्तीय मामलों में संसद को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त है। कार्यकारी संसद के अनुमोदन के बिना एक पैसा खर्च नहीं कर सकते। कानून के दायरे से बाहर जाकर कोई कर नहीं लगाया जा सकता। सरकार अनुमोदन के लिए बजट को संसद में पेश करती है। बजट के पारित होने का अर्थ है संसद ने सरकार की प्राप्तियों और खर्च को वैधता प्रदान कर दी। लोक लेखा समिति और प्राक्कलन समिति सरकार के खर्च पर नजर रखती है। ये समितियां खातों की जांच करती हैं और सार्वजनिक व्यय में अनियमितता, अवैध या अनुचित उपयोग के मामलों को उजागर करती है।

इस प्रकार, संसद सरकार पर बजट के साथ– साथ बजट– के बाद भी नियंत्रण रख रही है। अगर एक वित्त वर्ष में सरकार खर्च करने के लिए अनुमोदित बजट को खर्च करने में विफल रहती है तो बाकी बची धनराशि भारत की संचित निधि में वापस भेज दी जाती है। इसे 'चूक का नियम' कहते हैं। इसकी वजह से वित्त वर्ष के अंत तक व्यय में बढ़ोतरी हो जाती है।

न्यायिक शक्तियां और कार्य

नीचे संसद की न्यायिक शक्तियां और कार्य दिए जा रहे हैं–

(i) इसे राष्ट्रपति, उप–राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट औऱ उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर महाभियोग लगाने की शक्ति प्राप्त है।

(ii) यह अपने या बाहरी सदस्यों को विशेषाधिकार की अवमानना या उल्लंघन के लिए दंडित भी कर सकता है।

निर्वाचन शक्तियां और कार्य

नीचे संसद की निर्वाचन शक्तियां और कार्य दिए जा रहे हैं–

(i) संसद के निर्वाचित सदस्य ( राज्य विधानसभाओं के साथ) राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेंगे।

(ii) संसद के सभी सदस्य उप– राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेंगें।

(iii) लोकसभा अपना स्पीकर और डिप्टी स्पीकर खुद चुनता है।

(iv) राज्य सभा अपने उपाध्यक्ष का चुनाव।

(v) विभिन्न संसदीय समितियों के सदस्यों को भी चुने गए हैं।

संघटक शक्तियां और कार्य

सिर्फ संसद के पास संविधान में संशोधन के लिए किसी प्रस्ताव को आरंभ करने का अधिकार है। संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। हालांकि, राज्य विधानमंडल संसद से राज्य में विधानपरिषद के गठन या उसे निरस्त करने के लिए अनुरोध प्रस्ताव पारित कर सकता है। प्रस्ताव के आधार पर संसद उस उद्देश्य के लिए संविधान में संशोधन हेतु अधिनियम बना सकती है। संविधान संशोधन के लिए तीन प्रकार के विधेयक होते हैं, जिसके लिए जरूरी है–

(i) साधारण बहुमतः ये विधेयकों साधरण बहुमत द्वारा पारित किए जाते हैं यानि अधिकांश सदस्य उपस्थित होते हैं और प्रत्येक सदन में मतदान करते हैं।

(ii) विशेष बहुमतः इन विधेयकों को सदन के बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो– तिहाई सदस्यों औऱ प्रत्येक सदन में मतदान द्वारा पारित करने की जरुरत होती है।

(iii) विशेष बहुमत और सभी राज्य विधानसभाओं में से आधे की सहमतिः इस प्रकार के विधेयकों को प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत द्वारा पारित होने की जरूरत होती है। इसके अलावा, कम– से – कम राज्य विधानमंडलों के आधे विधानमंडलों को विधेयक पर अपनी सहमति देनी चाहिए।