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मध्य एशियाई संपर्कों का प्रभाव (शक-कुषाण काल के दौरान)

शक और कुषाण अवधि के दौरान घुड़सवार सेना का बेहतरीन उपयोग देखने को मिला था। घोड़े  की लगाम और पीठ पर सीट के प्रयोग की शुरूआत शकों और कुषाणों द्वारा शुरू की गयी थी। इसके अलावा शक और कुषाणों ने अंगरखा,  पगड़ी और पतलून तथा भारी-भरकम लंबे कोट,  कैप और  हेलमेट की शुरूआत की थी तथा इस अवधि के दौरान जूतों की भी शुरूआत हुई थी जो युद्ध में जीत के लिए मददगार साबित हुए थे। समुद्र और घाटियों के मार्गों के माध्यम से व्यापार करने के लिए केंद्रीय क्षेत्रों को खोल दिया गया था। इन मार्गों में से एक पुराने रेशम मार्ग के लिए प्रसिद्ध हो गया था।
Aug 31, 2015 12:45 IST
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मिट्टी के बर्तन और संरचना

इस अवधि के दौरान (शक-कुषाण काल) मिट्टी के बर्तन लाल रंग के होते थे जो सादे और पॉलिश दोनों तरह से निर्मित होते थे। यह मध्य एशिया में कुषाण साम्राज्य के दौरान खोजे गये पतले कपड़ों और लाल मिट्टी के बर्तनों के समान थे।

इस काल को ईंट की दीवारों के निर्माण के लिए जाना जाता था। फर्श और छत दोनों के लिए टाइल्स के रूप में जलीं हुई ईंटों का उपयोग होता था।

शक और कुषाणों ने बेहतर घुड़सवार सेना की शुरुआत की

शक और कुषाण अवधि के दौरान घुड़सवार सेना का बेहतरीन उपयोग देखने को मिला था। घोड़े  की लगाम और पीठ पर सीट के प्रयोग की शुरूआत शकों और कुषाणों द्वारा शुरू की गयी थी। इसके अलावा, शक और कुषाणों ने अंगरखा,  पगड़ी और पतलून तथा भारी-भरकम लंबे कोट,  कैप,  हेलमेट की भी शुरूआत की गयी थी और इस अवधि के दौरान जूतों की भी शुरूआत हुई थी जो युद्ध में जीत के लिए मददगार साबित हुए थे।

कृषि और व्यापार

कुषाणों द्वारा कृषि को प्रोत्साहित किया गया था। अफगानिस्तान, पाकिस्तान और पश्चिमी मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में सिंचाई सुविधाओं के पुरातात्विक निशान प्राप्त हुए थे।

शक-कुषाण अवधि के दौरान भारत और मध्य एशिया के बीच सीधे संपर्क की शुरूआत हुई। कुषाणों द्वारा नियंत्रित रेशम मार्ग जिसकी शुरूआत चीन से हुई और यह मध्य एशिया एवं अफगानिस्तान के माध्यम से ईरान और पश्चिमी एशिया तक फैल गया था।

भारत ने मध्य एशिया में स्थित अल्ताई पहाड़ो के माध्यम से रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार कर अच्छी मात्रा में स्वर्ण प्राप्त किया था।

राजनीति पर प्रभाव

शकों और कुषाणों ने शासन के दिव्य मूल के विचार को प्रचारित किया। कुषाण राजाओं को ईश्वर का पुत्र कहा जाता था।

कुषाणों ने भारत में सरकार की तानाशाह प्रणाली शुरू की। पूरा साम्राज्य कई तानाशाही में विभाजित किया गया था और प्रत्येक तानाशाही को एक तानाशाह द्वारा नियंत्रित किया जाता था। वंशानुगत दोहरा शासन, जिसमें एक ही साम्राज्य में एक ही समय में दो राजाओं के शासन करना शामिल था की शुरूआत इसी काल के दौरान हुई थी।

सैन्य गवर्नर के पद की प्रथा भी यूनानियों द्वारा शुरू की गयी थी। यूनानियों द्वारा नियुक्त राज्यपालों को स्ट्राटेगोस कहा जाता था। ये नये विजय प्राप्त क्षेत्रों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होते थे।

धर्म पर प्रभाव

कुषाण राजा बुद्ध और शिव दोनों की पूजा करते थे। दोनों राजाओं द्वारा जारी किये गये सिक्कों में इन दो देवताओं के चित्र दिखाई देते थे। प्रसिद्ध यूनानी शासक महेंन्द्र ने बौद्ध धर्म अपना लिया था।

कला

शक और कुषाण राजकुमारों ने काफी हद तक भारतीय कला को प्रोत्साहित किया। इसी कारण गांधार, मथुरा और मध्य एशियाई जैसे कला के कई स्कूलों का निर्माण हुआ। जिसकी वजह भारतीय कारीगरों का यूनानी, रोमन और मध्य एशियाई कारीगरों के साथ संपर्क में आना था।

गांधार कला का प्रभाव मथुरा तक पहुंच गया था। ईसाई युग की प्रारंभिक सदी में मथुरा कला स्कूल को विकसित किया गया था और इसके उत्पाद लाल बलुआ पत्थर से बनते थे।

साहित्य

संस्कृत साहित्य को विदेशी शासकों का संरक्षण प्राप्त था। अश्वघोष जैस महान लेखकों को कुषाणों का संरक्षण प्राप्त था। अश्वघोष बुद्ध चरित और सौंदारनंद के लेखक थे।

यूनानियों द्वारा पर्दे का प्रयोग शुरू करने के बाद से भारतीय रंगमंच भी यूनानी प्रभाव के साथ समृद्ध हो गया था।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

भारतीय ज्योतिष विद्या ग्रीक विचारों से प्रभावित थी जिसने होरोस्कोप (जन्मकुण्डली) शब्द से होराशास्त्र शब्द की उत्तपत्ति की। पंच-चिह्नित सिक्कों की तुलना में यूनानी सिक्कों का आकार बेहतर और मुद्राकिंत था जो भारत में काफी प्रचलित हुए थे। ड्रामा शब्द की उत्तपत्ति भी यूनानी शब्द ड्राचेमा से हुई थी।

भारतीयों ने इस अवधि के दौरान चमड़े के जूते बनाने की कला सीखी थी जो इसी कारण से संभव हुयी थी।

इस प्रकार, आक्रमणों और मध्य एशियाई शासकों के संपर्क में आने से इसका असर भारत के कई क्षेत्रों जैसे- मिट्टी के बर्तन, घुड़सवार सेना, साहित्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, धर्म और राजनीति में पड़ा।