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मौर्य साम्राज्य: महत्वपूर्ण शासक

चंद्रगुप्त मौर्य, मौर्य वंश का प्रथम राजा और संस्थापक माना जाता है।. उसकी माता का नाम मूर था जिसका संस्कृत में अर्थ मौर्य होता है। इसलिए इस वंश का नाम मौर्य वंश पड़ा।
May 22, 2014 12:52 IST
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चौथी शताब्दी ई.पू. में, मगध पर नन्द राजवंश के राजाओं ने शासन किया था। यह वंश उत्तर का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था। कौटिल्य को चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है। वह एक ब्राह्मण  मंत्री था जिसने मौर्य परिवार के एक नवयुवक चंद्रगुप्त को प्रशिक्षित किया था। चंद्रगुप्त ने कौटिल्य के नेतृत्व में अपनी संगठित सेना से नंद राजा को उखाड़ फेंका।

चंद्रगुप्त मौर्य, मौर्य वंश का प्रथम राजा और संस्थापक माना जाता है।. उसकी माता का नाम मूर था जिसका संस्कृत में अर्थ मौर्य होता है। इसलिए इस वंश का नाम मौर्या वंश पड़ा।

मगध राजवंश पर शासन करने वाले कुछ महत्वपूर्ण शासक:

चंद्रगुप्त मौर्य ( 322-298 ईसा पूर्व )

चंद्रगुप्त मौर्य को मौर्य साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है। विद्वानों के द्वारा यह विश्वास किया जाता है की जब वह केवल २५ साल का था तभी उसने नन्द राज धननंद से पाटलिपुत्र को छीन लिया था। जैसा की उल्लेख किया जाता है की इस कार्य में उसकी सहायता कौटिल्य जिसका एक नाम विष्णुगुप्त भी था ने किया था। सबसे पहले उसने गंगा के मैदानी इलाकों में अपनी सत्ता स्थापित की और बाद में उत्तर पश्चिम की ओर कुछ किया। चंद्रगुप्त मौर्य ने शीघ्र ही पंजाब के पूरे क्षेत्र पर विजय प्राप्त कर लिया। सेल्यूकस निकेटर जोकि  एक ग्रीक जनरल(सिकंदर का जनरल) था ने पुरे उत्तर में अपना अधिकार स्थापित किया था। इसलिए चंद्रगुप्त मौर्य ने उसके खिलाफ एक लंबी लड़ाई लड़ी और 305 ई.पू. के आस-पास उसे पराजित किया।दोनों के मध्य  एक संधि पर हस्ताक्षर किया गया। इस संधि के अनुसार, सेल्यूकस निकेटर ने सिंधुपार के प्रदेशों अर्थात् एरिया(हेरात),अरकेशिया(कंधार), जेद्रोसिया(बलूचिस्तान),पेरोपेरिन्स्दायी(काबुल) चंद्रगुप्त मौर्य को सौंप दिया और बदले में चन्द्रगुप्त मौर्य ने उसे 500 हाथियों का एक उपहार दिया। सेल्यूकस निकेटर ने मौर्य राजकुमार से अपनी बेटी का विवाह कर दिया  ऐसा कि माना जाता है की चन्द्रगुप्त मौर्या ने इस गठबंधन को और मजबूत करने के लिए मकदूनिय की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस तरह वह सिंधु क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया, वर्तमान में  इसका कुछ हिस्सा आधुनिक अफगानिस्तान में है। बाद में वह मध्य भारत की ओर कुछ किया नर्मदा के उत्तरी भागो तक अपना साम्राज्य स्थापित किया।

इस संधि के द्वारा सेल्यूकस द्वारा मेगस्थनीज एक  ग्रीक राजदूत के रूप में चंद्रगुप्तके के दरबार में भेजा गया और देइमकोस को बिन्दुसार के दरबार में एक ग्रीक राजदूत के रूप में भेजा गया था। चंद्रगुप्त अपने जीवन के अंतिम समय में जैन धर्म को अपना लिया और अंत तक जैन बना रहा। बाद में उसने अपने पुत्र बिन्दुसार के पक्ष में अपना सिंहसान त्याग दिया। चंद्रगुप्त बाद में जैन साधु भद्रबाहु के नेतृत्व में भिक्षुओं के साथ मैसूर के नजदीक श्रवण बेलगोला चला गया  और जैन धर्मं में प्रचलित मृत्यु(सल्लेखना) के तरीके से मृत्यु को प्राप्त हुआ।

उसके काल में व्यापार, कृषि प्रणाली व्यवस्थित बनी रही साथ ही बाट और माप आदि का मानकीकरण भी किया गया साथ ही मुद्रा का भी प्रचलन रहा. कराधान, स्वच्छता और अकाल राहत आदि कार्य राज्य की प्राथमिकता के बिंदु थे।

बिन्दुसार ( 297-272 ईसा पूर्व )

चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 25 वर्षों तक शासन किया और उसके बाद वह अपने पुत्र बिन्दुसार के लिए अपना सिंहासन छोड़ दिया। बिन्दुसार यूनानियों के द्वारा 'अमित्रघात ‘ जिसका अर्थ दुश्मनों का हत्यारा है,के रूप में जाना जाता था। कुछ विद्वानों के अनुसार बिन्दुसार ने दक्कन से लेकर मैसूर तक विजय प्राप्त की थी। तरणथा जोकि एक तिब्बती भिक्षु था ने बिन्दुसार के बारे में इस बात की पुष्टि की थी  की उसने 'दो समुद्र के बीच भूमि' की भूमि, जिसमें 16 राज्य अवस्थित थे, पर विजय प्राप्त की थी। संगम साहित्य के अनुसार मौर्यों ने दक्षिण में भी आक्रमण किया था। बिन्दुसार के शासन के दौरान, मौर्य वंश का विस्तार सुदूर मैसूर तक था। लेकिन वनों से परिपूर्ण भूमि कलिंग(उड़ीसा) के पास का क्षेत्र और सुदूर दक्षिण के राज्य इसके अधिकार क्षेत्र से बाहार थे।

बिन्दुसार सीरिया के राजा अन्तियोकस प्रथम के संपर्क में भी था जिसने बिन्दुसार के दरबार में दमिस्क को राजदूत के रूप में भेजा था। बिन्दुसार ने सीरिया के राजा से मिठाई शराब, सूखा अंजीर और एक दार्शनिक की मांग की थी लेकिन सीरियाई राजा ने सीरिया के कानों का हवाला देते हुए दार्शनिक भेजने से मन कर दिया था। बिन्दुसार आजीवक संप्रदाय में विश्वास रखता था.।  बिन्दुसार ने अशोक को उज्जैन का राज्यपाल नियुक्त किया जिसे बाद में तक्षशिला में हुए एक विद्रोह को दबाने के लिए भेजा गया।

अशोक महान ( 268-232 ईसा पूर्व )

अशोक के काल में, मौर्य साम्राज्य विस्तार के सन्दर्भ में अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। पहली बार पूरे उपमहाद्वीप पर दक्षिण भारत को छोड़कर सभी क्षेत्र उसके प्रत्यक्ष नियंत्रण में थे।

सिहासन के खाली होने( 273 ई.पू.) और उसके वास्तविक राज्याभिषेक( 269 ई.पू.) के बीच करीब चार वर्ष का अन्तराल था। उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार बिन्दुसार की मृत्यु के बाद सिंहासन प्राप्त करने के लिए राजकुमारों के मध्य संघर्ष हुआ था।

हालांकि, अशोक का उत्तराधिकार एक विवादित मुद्दा है। अशोक के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना 261 ईसा पूर्व में कलिंग के साथ विजयी युद्ध था। युद्ध के वास्तविक कारण के बारे में कोई साक्ष्य नहीं मिलता है , लेकिन दोनों पक्षों अर्थात अशोक और कलिंग को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। अशोक इस युद्ध में हुए रक्तपात से काफी दुखी था। इसका वर्णन वह खुद तेरहवें शिलालेख में करता है। युद्ध समाप्त होने के बाद अशोक ने कलिंग पर कब्जा कर लिया और आगे से किसी भी प्रकार के युद्धों को न करने का फैसला किया। अशोक के ऊपर कलिंग युद्ध का प्रभाव इस कदर पड़ा की वह बौद्ध भिक्षु उपगुप्त  के प्रभाव में बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया।

उसने शांति और अपने अधिकार को बनाए रखने के लिए एक वृहद् और शक्तिशाली सेना को बनाए रखा। अशोक ने एशिया और यूरोप के करीब सभी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का विस्तार किया  और बौद्ध मिशनो को इन देशो में प्रायोजित भी किया। अशोक के द्वारा चोल, पांड्य और यूनानी राजाओं द्वारा शासित पांच राज्यों के लिए बौद्ध मिशनरियों को भेजा गया था। उसने सीलोन(श्रीलंका) और सुवर्णभूमि(बर्मा) एवं दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी बौद्ध धर्मं के प्रचार-प्रसार  के लिए मिशनरियों को भेजा।

महेंद्र, तीवर  (केवल शिलालेखों में उल्लिखित), कुनाल और तालुका अशोक के प्रमुख पुत्र थे। संघमित्रा और चारुमति उसकी दो पुत्रिया थीं।

मौर्योंत्तर शासक  ( 232-184 ईसा पूर्व )

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य 232 ई.पू. में दो भागों में विभाजित हो गया था। ये दो भाग, पूर्वी और पश्चिमी थे। कुनाल पश्चिमी भाग के राजा के रूप के रूप में और दशरथ पूर्वी भाग के राजा में शासन करते रहे। उसके बाद  समृति , सलिसुक ,देववर्मन, सताधन्वन और अंत में बृहद्रथ ने शासन किया। बृहद्रथ इस वंश का अंतिम शासक था जिसकी हत्या 184 ई.पू. में उसके मंत्री पुष्यमित्र शुंग ने कर दी। पुष्यमित्र शुंग ने बाद में शुंग वंश की स्थापना की।